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इंकलाब इंकलाब इंकलाब

January 4, 2018 1:32 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

इंकलाब इंकलाब इंकलाब

इंकलाब इंकलाब इंकलाब
हम सर्वहारा की आवाज़, इंकलाब

सागर के तूफां को हमने वश में किया है
पहाड़ के चट्टानों को भी वश में लिया है
मालिकों की तानाशाही अब न सहेंगे
हर चीज पे है हक्क़ हमारा, ले के रहेंगे
हर मुल्क के हर जुल्म को यही जवाब
हम सर्वहारा की आवाज़, इंकलाब

यह रात हटेगी और सूरज भी निकलेगा
धर्म और कौम का परदा भी हटेगा
नहीं चलेगी ठेकेदारी कोई शख़्स की
हम एकता से पूर्ति कर देंगे लक्ष्य की
कोई न होगा हिटलर कोई नवाब
हम सर्वहारा की आवाज़, इंकलाब

हम बागियों ने दुश्मन पहचान लिया है
और सर पे कफ़न को भी बांध लिया है
जानको लगा दिया है हमने दांव पे
आ उतर पड़े हैं क्रांति के गांव पे
मज़दूर राज लायेंगे यही है ख्वाब
हम सर्वहारा की आवाज़, इंकलाब

इंकलाब इंकलाब इंकलाब
हम सर्वहारा की आवाज़, इंकलाब।।।

(नोट- इस गीत के रचयिता क्रांतिकारी लोकगायक काॅमरेड विलास घोघरे हैं।)

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