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वतन वापसी का रिवर्स गियर

December 18, 2017 6:25 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

18 दिसंबर, 2017 अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी दिवस पर विशेष 

अपनी उम्र के नाज़ुक पड़ाव पर पहुंचे तीन बुज़ुर्ग अपने घरों से दूर पार्क के एक बेंच पर बैठे जब ये गीत- “खुमारी चढ़ के उतर गई, ज़िन्दगी यूँ ही गुज़र गई” गाते हैं तो निश्चित रूप से इन प्रवासियों के जीवन का यथार्थ देखकर एक बार तो हर कोई भावुक हो उठता है और आँखों के आगे जीवंत हो उठती है “उमर” फिल्म की कहानी। ये मात्र कहानी नहीं, हकीकत है उन प्रवासियों की जो अपने वतन, अपनी सरज़मीं पर वापिस लौटना चाहते हैं। अपने देश से दूर दूसरे देशों में ये लोग भले ही अपने घरों में होते हों , पर सच तो यह है कि उन्हें ये पराए देश कभी अपने नहीं लगते। घरों के होते हुए भी ये बेघर लगते हैं। उस देश में बसने के बावजूद भी ये प्रवासी कभी उसे अपना देश नहीं कह पाते।

विदेशों की चकाचोंध, रंगीन बहारें, सहूलतों भरा जीवन, धन, पैसा, ऐश्वर्य, सुख- सुविधाओं की ख्वाहिशें इन लोगों को अपने देश से दूसरे देशों में खींच ले जाती हैं और उन्हें प्रवासी बना देती हैं। मगर ये ‘प्रवास’ अपने देश से निर्वासन होने जैसा ही तो है। अपने परिवारों, अपनी संतानों, अपने लोगों की खुशियों से दूर, अपने देश के पर्व, उत्सव, त्योहारों को छोड़कर, पराई रोशनी में इन्हें कहाँ शरण मिलती है। क्योंकि पराए देशों की केवल जलवायु ही नहीं, बल्कि संस्कृति, मूल्य, आचार- व्यहवार, रहन-सहन, रीति-रिवाज, भाषा, हवा, पानी, बसेरा यहाँ तक की सरहदें भी बदल जाती हैं।

वैश्वीकरण के दौर में भावनाओं से रहित इंसान वायुयानों से आकाश को नापते हुए पलभर में अपनी सरहदों को छोड़, दूसरे देशों की आबोहवा में खो जाना चाहता है। स्वतंत्रता की गलियों में विचरण करते हुए जीवन की उन्मुक्तता को जीना चाहता है। अपने देश की परंपराएं, मान्यताएं, मूल्य सब खोखले लगने लगतीं हैं। पर सच्चाई तब मालूम होती है, जब उम्र गुज़र जाती है, वक़्त निकल जाता है। जब पराए शहरों की अजनबीयत में कोई हमसफ़र नहीं मिलता। जब पराई सरहदों में  कोई हाथ नहीं थामता। जब महसूस होने लगता है कि ये पराई पगडंडियां कभी अपने वतन की डगर पर नहीं लौटेंगी।

पीईडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक देश से बाहर रहने वाले प्रवासियों में भारत टॉप पर है। भारत के करीबन 1 करोड़ 56 लाख लोग, मेक्सिको के 1 करोड़ 23 लाख, रूस के 1 करोड़ 6 लाख, चीन के 95 लाख और बांग्ला देश के 72 लाख लोग,  दुनिया के अलग-अलग देशों में रह रहे हैं।

यह सच है कि वैश्वीकरण के कारण एवं नए युग की चुनौतियों ने बड़े-बड़े देशों में विकास के अनेक अवसर प्रदान किए हैं। यहाँ तक कि विदेशों में जाकर बसने वाले लोग स्वयं के आर्थिक एवं सामाजिक स्तर को सामान्य लोगों से बेहतर भी आंकने हैं। इसी मानसिकता के चलते बहुत से लोग बाहर के देशों में बसने के सुनहरे ख़्वाब संजोते हुए नए अवसर तलाशने विदेशों में निकल पड़ते हैं।

पर, इन अजनबी देशों में लोगों की भीड़ में खुद को तन्हा पाते इन प्रवासियों को कभी नहीं भूलता अपना देश। इन प्रवासियों को नहीं भूलती अपनी मिट्टी से जुड़ी बातें, अपने संस्कार, अपनी परंपराएं, अपनी मान्यताएं। और हर मौके पर याद आने लगते हैं इन्हें अपने ही लोग। तब इन्हें लगता है कि इतने लोगों की भीड़ में रहते हुए भी ये कैसी तन्हाई है। उस दिन आदमी मशीन से वापस आदमी बनता है। और उसे लगता है कि काश! मेरी बीतती ज़िंदगी का, मेरी वतन वापसी का कोई रिवर्स गियर हो।

हर शाम इन प्रवासियों की स्थिति उन परिंदों की भांति होती है, जो शाम ढले हर रोज़ अपने नीड़ों में लौटने को बेताब होते हैं।

 

 

लेखिका डॉ. गीतू ‘गीत’ फतेहाबाद के मनोहर मैमोरियल स्नातकोत्तर महाविद्यालय में बतौर सहायक प्रोफेसर (हिंदी) अपनी सेवाएं दे रही हैं। वे दूरदर्शन, आकाशवाणी एवं दैनिक भास्कर में भी काम कर चुकी हैं। विभिन्न समाचारपत्र, पत्रिकाओं में समय-समय इनकी कविताएँ एवं लेख प्रकाशित होते रहे हैं, इंटरनेशनल एवं नेशनल रिसर्च जर्नल्स में अनेक शोध-पत्र भी छपे हैं। हिंदी ‘साहित्यिक पत्रकारिता का बदलता स्वरूप’ नाम से इनका शोध ग्रन्थ भी प्रकाशित हो चुका है। बीते स्वतंत्रता दिवस पर शैक्षणिक, सामाजिक, एवं साहित्यिक क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने हेतु फतेहाबाद ज़िला प्रशासन की ओर से उन्हें सम्मानित किया गया। इसके अलावा भी सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत भी वे कई सम्मान पा चुकीं हैं।

 

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