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Exclusive: जगमति सांगवान माफी मांगती है तो सीपीएम कर सकती है पुनर्विचारः नीलोत्पल बसु

August 22, 2016 7:55 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

हाल ही में गुड़गांव में संपंन्न हुए एक सेमीनार में पश्चिम बंगाल के भूतपूर्व राज्यसभा सांसद और सीपीएम की केंद्रीय कमेटी के सदस्य नीलोत्पल बसु ने दौरा किया। बता दें कि ये सेमीनार पश्चिम बंगाल में टीएमसी की ओर वामपंथी कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमलों पर आधारित था। जिसमें नीलोत्पल बसु जी एवं हरियाणा की वामपंथ ईकाई के सदस्यों ने अपने विचार रखे। इसी दौरान हमारी वैबसाईट के मुख्य संपादक जगदीप सिंह का द्वारा लिया गया उनका साक्षात्कार…

nilotpal basu

जगदीप सिंहः बसु जी, क्या लगता है ये जो पूरा माहौल इस तरह का बना हुआ है और जिस तरह से वामपंथी कैडर पर हमले हो रहे हैं और दूसरी और देश के अन्य राज्यों में भी चाहे वो दलितों पर हमले हो रहे हों; गुड़गांव में भी कबड्डी के मैच के दौरान चक्रपुर में आपने देखा होगा जिस तरह दलितों पर हमला हुआ, वहां पर दलितों को पीटा गया, तो इस पूरे माहौल को आप कैसे देखते हैं

नीलोत्पल बसुः देखिए 2014 में हमारे देश में जो नई सरकार बनी है उस नई सरकार के बनते ही हमने एक आश्वाशन जारी किया था। 2014 के जो चुनाव का जो नतीजा आया था वो बीजेपी के प्रति एक सकारात्मक समर्थन के जरिए नहीं आया था बल्कि उसके पहले जो यूपीए सरकार चली… दस साल… और खासकर के वामपंथियों का समर्थन वापस लेने के बाद 2007 से 2014 तक… उसके चलते लोगों को बहुत निराशा हुई, और लोगों का बहुत ज्यादा जो आक्रोश तैयार हुआ… तो परिवर्तन का नारा देके मोदी जी आए थे और एक तरह से हमारे देश में जो संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली है उसके विपरित मोदी अपने आपको सभी चीजों का एक मुश्किल एहसान के तौर पे प्रस्तुत किया, उसी का नतीजा था और देश के जो बड़े कॉरपोरेट घराने थे, उन्होने पूरा समर्थन किया, जो वित्तिय साधन जुटाया उसके लिए… तो तभी सरकार आया… और उसका नतीजा अगर हम देखें तो हरियाणा जैसे प्रांत में जहां कोई बीजेपी बहुत बड़ा ताकत नहीं था वो भी… उसके बाद जो विधानसभा में चुनाव हुआ है, लेकिन सत्ता में आने के बाद जिस रूप से हरियाणा के लोग जिन समस्याओं से पीरीत थे उनका समाधान करने की बजाय उन्होनें सामाजिक आधार पर लोगों को बटवारा करने का कोशिश की…

जगदीप सिंह: अमूमन विपक्ष भी हरियाणा का ये मानता है कि इन्होनें जो है हरियाणा को बांटने की कोशिश की है, किस रूप में देख रहे हैं आप… और क्या किया जाना संभव है इसके लिए…

नीलोत्पल बसु: बिलकुल-बिलकुल, क्योंकि हरियाणा के अंदर मुसलमान आबादी बहुत कम संख्या में है तो पारम्परिक जो साम्प्रदायिक विभाजन वो करते हैं; वो तो संभव नहीं था तो इसीलिए वो तो जातिगत आधार पे जाट और गैर-जाट के बीच खाई पैदा करके… और इस प्रकार हम देखते हैं कि हरियाणा में जो  आर्थिक संकट है खासकरके खेती के जो बेतहाशा एक संकट से गुजरना पड़ रहा है, खुदकुशी हम देखें किसानों का, और मजदूरों का स्थिति भी… उसको लेकर लोगों में आक्रोश है, उथल-पुथल है और सरकार की जो नीजिकरण का जो प्रयास है बिजली क्षेत्र में, परिवहन क्षेत्र में… तो इन सबके खिलाफ लड़ाई भी शुरू हुआ है… और पूरे देश के पैमाने पर हम भी खरे हैं कि तीन जो विशेषताएं हैं एक तो जो नई उदारवादी नीति है कॉरपोरेट के पक्ष में, गरीब मेहनतकशों के खिलाफ और भी आक्रामकता के साथ सामने आ रहा है। दूसरा जो ये साम्प्रदायिक जो तनाव है, ये जो लव जिहाद वाला सवाल है, रोजगार, औधोगिक उत्पादन नहीं बढ़ रहा है, सेवा क्षेत्र में भी विकास नहीं हो रहा है, रोजगार भी नहीं बढ़े। सरकारी आंकड़ों से ये पता चल रहा है कि सामाजिक रूप से जो कमजोर तबके हैं चाहे मुसलमान हो या दलित जो है उन पर प्रभाव पड़ा है… और तीसरा जो पहलू है क्यूंकि वो लोगों को अपनी निति के तहत छूटा नहीं पा रहे उनका समर्थन जो निश्चित नहीं कर पा रहे है कि वे उनके कामकाज में सामने आए तो इसे त्रिमूर्ति आप कह सकते हैं या खतरा के हिसाब से एक त्रिसूल इसे कहा जा सकता है, तो इसके खिलाफ हम वामपंथी लड़ाई कर रहे हैं कि इन जो तीनो पहलू को एकजुट करके लड़ाई लड़ना है, इसका समझदारी सिर्फ वामपंथियों का है लेकिन अब तक वामपंथियों का जो सांगठनात्मक या शारीरिक मौजूदगी कम है, हमे जरूरत है कि इस आक्रामकता के शिकार लोगों को हम एकजुट कर सकें।

जगदीप सिंहः बसु जी… इसमे आप कैसे देखते हैं कि दिल्ली के सीएम केजरीवाल जैसा कि बहुत कम समय में आके और बिना किसी… आपका तो बहुत सांगठनिक आधार भी होता है और केडर भी होता है, लेकिन इनका तो ऐसा कुछ भी नहीं था और वो आके एकदम से छा जाते हैं और आप इतना संघर्ष भी करते हैं और लोग स्वीकार भी करते हैं कि ये तो लड़ने वाले हैं लेकिन उनको आप वोट में कनवर्ट नहीं कर पाते?

नीलोत्पल बसुः देखिए सवाल ये है कि ये कोई भी ताकत बुनियादी रूप से समाज में परिवर्तन नहीं करने वाली है, इसीलिए तात्कालिक रूप से जो आरएसएस बीजेपी के खिलाफ या कांग्रेस के खिलाफ जो माहौल है वो कुछ देर के लिए है लेकिन ये टिकाउ नहीं है क्योंकि आखिरकर जो सवाल है कि एक वैकल्पिक नीति के साथ लोगों को जुटाना था कि एक स्थाई परिवर्तन की ओर लोगों को ले लिया जाए इससे पहले बहुत सारे इस तरह का….

जगदीप सिंह: (बीच में ही काटते हुए) लेकिन वो स्थाई परिवर्तन के लिए बढ़ा तो इलेक्शन के जरिए ही जाएगा ना…

नीलोत्पल बसुः हां वही तो मैं बोल रहा हूं ना कि वो एक चुनाव में जो तात्कालीन परिस्थिति है उसके चलते तात्कालिक जो प्रदर्शऩ थोड़ा ठीक हो सकता है लेकिन उसको एक बुनियादी परिवर्तन की ओर ले जाना नामुमकिन है, लेकिन हम उसका इस तरह से विरोध करने के बजाय हम सकारात्मक रूप से लंबी समय के लिए एक सकारात्मक परिवर्तन हो; इसी दिशा में काम करेंगे और जहां तक उसमें बीजेपी को विरोध करना या कांग्रेस को विरोध करना, वो सिर्फ एक राजनीतिक तौर पे ना हों, वो एक वैकल्पिक नीति के आधार पे हो उसी के लिए उनको आगाह करेंगे।

जगदीप सिंहः एक बात और बताईए कि पूरे देश में अगर बंगाल की बात छोड़ दी जाए क्योंकि बंगाल में तो कांग्रेस के साथ समर्थन वहां की केडर के हिसाब से ठीक किया, लोग सारे सहमत थे। लेकिन पश्चिम बंगाल से बाहर के जितने भी लोग हैं खासतौर से नतीजों के बाद जो, मतलब वो कह रहें हैं कि पार्टी का डिसीजन सही नहीं था, इस बारे में क्या कहोगे…

नीलोत्पल बसु: नहीं, नहीं, वो हम भी तो बोल रहें है कि जो पूरे देश की रणनीति है उसके साथ हमारा सामंजस्य नहीं था और ये घटना हुई है, इसलिए कि जो दवाब था उस दबाव के चलते तृणमूल और बीजेपी, और उनके बीच में जो एक अलिखित समझदारी थी, समझबूझ थी, उसके लिए लोगों को इकट्ठा करने के लिए था। लेकिन ये जरूर उस लिए नहीं था… तो चुनाव के बाद उसको संसोधन करके ये बात बोले हैं कि हम अलग हैं, अलग लड़ेंगे क्योंकि कांग्रेस के साथ तो बुनियादी तौर पर तो हमारा विचार अलग है लेकिन जहां तक लोकतंत्र के उपर हमला का सवाल है वहां पे हम एक व्यापक मंच के जरिए ही लड़ेंगे और उसपे कांग्रेस भी रहेगा, उसमें कोई दिक्कत नहीं है। तो हम ये समझते हैं के ये सबके चलते जरूरत है जैसे मैनें पहले भी बोला कि ये लड़ाई हम जीतेंगे ही जीतेंगे। वो जो ताकत का प्रदर्शन कर रहा है, आतंक फैलाने की कोशिश कर रहा है, वो उनकी कमजोरी का मतलब एक प्रकटीकरण है, वो उनकी कोई मजबूती का प्रदर्शऩ नहीं है…

जगदीप सिंहः जगमती सांगवान वाले एपीसोड को आप कैसे देखते हैं…

नीलोत्पल बसुः देखिए जगमती जी, उनका भूमिका था, हरियाणा में… महिला आंदोलन निर्माण में… लेकिन वो पार्टी की केंद्रीय टीम की सदस्य थी… और हम समझतें है कि उससे तमाम पार्टीयों के मुकाबले कॉम्यनिस्ट पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक माहोल होता है। हम सब लोग अपने अपने विचार पार्टी के अंदर रख सकते हैं, लेकिन उसके बाद जब सारे चर्चाएं हो जाती हैं और सामूहिक रूप से कोई फैसला होता है वो फैसला स्वीकार करना और सब साथियों को उसका प्रतिपालन करना उसकी जिम्मेदारी  होता है, क्योंकि आखिरकर हम नीजि तौर पर अपना बात रखें, इससे पार्टी मजबूत नहीं होता, लेकिन उनको भी बहुत अच्छी तरह से मालूम है। लेकिन उसके बाद भी उन्होनें जो विरोध किया तो उसके बाद पार्टी के पास कोई चारा नहीं बचा उनको निष्कासित करने की बजाय। तो जो हुआ है, आने वाले दिनों में देखते हैं वो क्या करते हैं ? वो अगर अपना जो गलती है वो महसूस करेंगे तो…

जगदीप सिंहः क्या पार्टी उनको ले लेगी वापस…

नीलोत्पल बसुः ( आंशिक मुस्कुराते हुए ) वो तो उनके उपर है ना… मतलब पार्टी तो…

जगदीप सिंहः मान लो अगर अफसोस जताती है उस बात पर तो क्या पार्टी उनको वापस वही जगह देंगी या फिर नई भूमिका से…

नीलोत्पल बसुः देखिए… हम किसी व्यक्ति के खिलाफ लड़ते नहीं हैं, हम कुछ रूझान के खिलाफ लड़ते हैं। तो जो गलत रूझान के चलते अगर पार्टी को मजबूर होना पड़ा… ये कदम उठाने के लिए… अगर वो खुद महसूस करते हैं कि वो ठीक नहीं रहा, तो जरूर परिवर्तन करेंगें।

जगदीप सिंहः जी, आपने हरियाणा खास के लिए अपना कीमती समय निकाला इसके लिए बहुत-बहुत आभार…

 

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