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जनता के साथ खड़े रहने को ही तो वे देशद्रोह कहते हैं!

December 24, 2017 9:05 pm by: Category: खबर खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

जनता के साथ खड़े रहने को ही तो वे देशद्रोह कहते हैं!

     (देशद्रोह के आरोप में साढ़े छह साल से कानपुर जेल में बंद रहे 73 वर्षीय शिवराज सिंह बगड़वाल अभी 23 अगस्त को जमानत पर छूटकर पर बाहर आये हैं। उन्हें यह रिहाई स्वास्थ्य कारणों से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हासिल हुई। कुछ दिन पूर्व जब मैं उनसे हल्द्वानी में मिलने पहुँचा तो वे करेला छील रहे थे। मेरे पहुँचने पर उन्होंने उठ कर तपाक से हाथ आगे बढ़ाया। यह बहुत बूढ़ा हाथ था, लेकिन उसमें बहुत आवेग था। थोड़ी देर में मैंने महसूस किया कि वे लंगड़ा कर चल रहे हैं। पता चला कि जेल की यातनाओं से यह सब हो गया। आँख से भी कम दिखाई देता है और कमर में भी दर्द है। बावजूद इस सबके उन्होंने झटपट मुझे चाय पिलाने का इंतजाम किया। यहीं मैंने उनसे उनके सामाजिक जीवन के विविध पहलुओं पर वार्ता की। यहाँ पेश हैं उस वार्ता के कुछ अंश।)

मृत्युंजय भास्कर


सवाल – शिवराज जी, जब आप कानपुर में अरेस्ट हुए तो तमाम लोगों की आपको जानने में बड़ी दिलचस्पी थी कि आखिर यह बुजुर्ग क्रांतिकारी कौन हैं। मगर मुख्यधारा के मीडिया में आपके बारे में कुछ आया नहीं। शायद संघर्षों में शामिल आपके साथी आपको जानते हों, मगर बहुत सारे लोग, खास कर नई पीढ़ी आपके बारे में जानना चाहती है

जवाब – मेरे अपने बारे में बताने का कुछ नहीं। मैं जो हूँ वह समाज के एक हिस्से के रूप में ही हूँ। मैंने व्यक्तिवादी होने का हमेशा विरोध किया, क्योंकि व्यक्तिवाद ही समाज की इस हालत के लिए जिम्मेदार है। हाँ मैं नकारवादी नहीं हूँ। कुछ बनाना चाहता हूँ। इस दुनिया को बेहतर होने की जरूरत है।

सवाल – आपके बारे में जानने से मतलब था, आपका बचपन, आपकी परवरिश और आपके यहाँ तक पहुँचने का सफर ?

जवाब – अल्मोड़ा के पास लमगड़ा में एक सामान्य किसान परिवार में पैदा हुआ। पिता प्रेम सिंह जी की धुँधली सी भी याद नहीं। लोगों से उनके बारे में सुनता था। द्वितीय विश्वयुद्ध में फ्रांस के मोर्चे पर वे घायल हो गए थे। तब वहाँ से बहुत सारा साहित्य लेकर वे घर वापस आए। बताते हैं तीन बक्सों में ये किताबें भरी हुई थीं। मैं जब दो-तीन वर्ष का था तो उनकी मृत्यु हो गयी। दो बड़े भाई थे। बड़े वाले गोपाल सिंह बीमार ही रहते थे। 20 साल तक कई तरह के इलाज हुए। गाँव में झाड़-फूँक से लेकर बाद में बरेली मेंटल हॉस्पिटल तक। 1975 के आसपास वे गुजर गए। दूसरे भाई बचपन में ही घर से भाग गए। फिर कई साल बाद वापस लौटे।

सामाजिक काम को लेकर जो पहली महत्वपूर्ण घटना मुझे याद है, वह है गाँव में स्कूल निर्माण के लिए चला आंदोलन। तब मैं अल्मोड़ा में हाईस्कूल करने के बाद इंटर में प्रवेश ले चुका था। मैं गाँव आ कर स्कूल के लिए चंदा जुटाने गाँव-गाँव घूमने लगा। गाँव का स्कूल तो खुल गया, लेकिन मेरी पढ़ाई छूट गयी।

1962 या 63 में हल्द्वानी आ गया। आज की जैसी हल्द्वानी नहीं थी तब। पुरानी बाजार जरूर ऐसी ही थी, लेकिन रिहायशी इलाका बहुत सीमित था। हल्द्वानी में परिवार के और लोग तथा संबंधी विभिन्न व्यवसायों में लगे थेे। मैं भी उनके साथ लग गया। इसी दौरान साहित्य पढ़ने का शौक लगा, कई तरह के लोगों से मिला और मुझे लगने लगा कि मैं व्यापार का काम नहीं कर सकता। यहीं से तय हो गया कि आगे मुझे क्या काम करना है।

सवाल –  भाबर-तराई के जन संघर्षों पर थोड़ा प्रकाश डालेंगे आप ?

जवाब –  उत्तर प्रदेश के समय तराई का इलाका बड़ा था। तब यहाँ सी.पी.आई. के लोग भूमि आंदोलन संचालित कर रहे थे। मैं भी इनसे जुड़ गया। एक घटना स्मरण है। प्राग फार्म में चल रहे भूमिहीनों के आंदोलन में सालम के रहने वाले पूरन सिंह नाम के एक व्यक्ति को जेल हो गयी। उनका जेल जाना कुनबे के लिए अपमान माना गया। वे रिहा होकर घर आये तो घर वालों ने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। इस घटना से मेरे अन्दर आक्रोश पनपा। जिस काम के लिए यह व्यक्ति जेल गया, उसका तो सम्मान होना चाहिए था! मैंने घर के बाहर जाकर पूरन सिंह को शाबाशी दी।

उन दिनों हल्द्वानी में खाद्य सामग्री का बड़ा अभाव हो जाता था। तब मैंने कुछ साथियों के साथ मिल कर जमाखोरी के खिलाफ अभियान चलाया। करीब 35 हजार कुंतल राशन पकड़वाया गया। फिर तीनपानी (हल्द्वानी) में मजदूरों की आवासीय बस्ती आबाद की। यह खामलैंड यानी सरकारी जमीन थी, जिस पर बहेड़ी का एक शुगर मिल मालिक और खुरपिया फार्म का मालिक पटेल काबिज थे। कागजों में छेड़छाड़ कर यहाँ डेयरी फार्म दिखाया गया था। इस जमीन के लिए संघर्ष कर कब्जा किया गया। इस भूमि से 6 एकड़ लक्ष्मी देवी और 6 एकड़ उसके पति प्रताप सिंह को दिलाई गयी। ये परिवार यहाँ लंबे समय से चैकीदारी कर रहा था। शेष 6 एकड़ जमीन में गरीबों की बस्ती बसायी गयी। इसमें से 3 एकड़ सिंचाई विभाग ने जबरन छीनकर वहाँ वर्कशॉप स्थापित किया। अब बस्ती के पास 3 एकड़ जमीन है।

सी.पी.आई. में रहते हुए ही मैंने हल्द्वानी में रिक्शा चालक मजदूरों की यूनियन बनाई। उनको रिक्शा खरीदने के लिए बैंकों से लोन दिलवाए। कंट्रोल रेट पर टायर ट्यूब और पंक्चर की व्यवस्था करायी। विभिन्न चैराहों पर रिक्शा स्टैंड का निर्माण कराया। तराई-भाबर में तब कांग्रेस, कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट की ही यूनियनें थीं। आर.एस.एस. या जनसंघ की कोई यूनियन उस समय नहीं थी।

एक पुरानी घटना, शायद 1968 की होगी, की याद आ रही है। हल्द्वानी के रेलवे बाजार में सरदार हरी सिंह का प्रॉपर्टी डीलिंग का कार्यालय था। उनका संबंध कालाढुंगी स्थित बड्रामपुर फार्म के मालिक चैधरी विद्याभूषण, जो गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा के साढू भाई थे, से था। हरी सिंह के यहाँ पंजाब से लोग जमीन खरीदने आया करते थे। एक दिन मुझे खबर मिली कि हरी सिंह के यहाँ कुछ लोग एक लड़की लाये हैं। उसके साथ बलात्कार हुआ है। तब मैंने 20-30 लोगों के साथ हरी सिंह के कार्यालय को चारों ओर से घेर लिया। फिर सैकड़ों लोग वहाँ जमा हो गए। पुलिस भी आ गयी और लड़की को मुक्त करा कर मेडिकल के लिए भेजा गया। इस घटना ने बाद में विकराल आन्दोलन का रूप ले लिया। रामलीला ग्राउंड में तीन हजार से अधिक लोगों की सभा हुई। इसके बाद कालाढुंगी के फार्म हाउस में प्रदर्शन हुआ। हरी सिंह को अपना कारोबार छोड़कर भागना पड़ा। इस घटना के बाद लोगों में ऐसी घटनाओं के खिलाफ बोलने का मनोबल जागा।


सवाल – आप किशोरावस्था में ही पहाड़ से उतर कर भाबर आ गए थे। पहाड़ के आंदोलनों से कैसा जुड़ाव रहा ?

जवाब –  उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी द्वारा आयोजित ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन में मैंने डट कर काम किया। वाहिनी के संविधान निर्माण में भी भागीदारी रही, हालाँकि इस संविधान को अमल में नहीं लाया गया। करीब दो साल तक वाहिनी के पत्र ‘जंगल के दावेदार’ से भी जुड़ा रहा। वाहिनी द्वारा किये गये ‘हिमालयन कार रैली’ के विरोध में जेल गया। वाहिनी द्वारा ही तराई में चलाये गए कोटखर्रा भूमि आन्दोलन में भागीदारी की। ‘किसान संगठन अल्मोड़ा’ के संघर्षों के द्वारा हमने हवालबाग, ताकुला और भैसियाछाना ब्लॉकों की लगभग 150 ग्राम सभाओं की जनता के लिए ‘बिनसर अभयारण्य’ के विरोध में संघर्ष संचालित किया। इससे वहाँ की जनता को जंगली जानवरों से सुरक्षा पाने, इमारती और जलावन लकड़ी प्राप्त करने, पशु चुगान में लगी पाबंदी खत्म करने, घास-पत्तल हासिल करने आदि में सफलता हासिल हुई। अल्मोड़ा में छोटे व्यवसायियों को व्यावसायिक स्थल दिलवाया।

उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के समय हमने ‘उत्तराखंड जनवादी मोर्चा’ के माध्यम से जनचेतना का प्रयास किया। हम स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार चाहते थे। मुठ्ठी भर लोगों के विकास के लिए बन रहे राज्य को हमने नकारा था। लेकिन उस वक्त तो सभी पर ‘आज दो अभी दो उत्तराखंड राज्य दो’ का खुमार हावी था। उस समय जनपक्षीय सवालों को दरकिनार करने का परिणाम अब सामने आ चुका है।

सवाल – बिन्दुखत्ता में भूमिहीनों को भूमि दिलाने के आन्दोलन की शुरूआत कैसे हुई ?

जवाब –  बिन्दुखत्ता में पहाड़ से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गरीब किसानों, मजदूरों और भूतपूर्व सैनिकों को बसाने के लिये ‘किसान कमेटी’ के नाम से आंदोलन चला। बाद में इसी से ‘श्रमिक-भूमिहीन किसान एकता मंच उत्तर प्रदेश’ का गठन किया गया। 1982-83 में बने इस संगठन की 45 सदस्यीय केन्द्रीय कमिटी का संयोजक मुझे चुना गया। इस कमिटी में बहादुर सिंह जंगी, भुवन जोशी और मानसिंह पाल से लेकर प्रो. जावेद अली और कमला पन्त तक शामिल थे। इसी संगठन के संघर्षों के दम पर बिन्दुखत्ता आबाद हुआ। उस संघर्ष में वीरेन डंगवाल, पी.सी. तिवारी, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ आदि अनेक लोगों के साथ ‘नैनीताल समाचार’ का विशेष योगदान रहा।

सवाल – आपका सी.पी.आई. से मोहभंग हो गया बीच में ही ?

जवाब –  मैं और बहादुर सिंह जंगी सी.पी.आई. छोड़कर ‘किसान संग्राम समिति उत्तर प्रदेश’ से जुड़ गए। 1982-83 में हम दोनों माले (लिबरेशन) से जुड़े। बाद में वैचारिक असहमति के चलते मैं माले से भी अलग हो गया। सी.पी.आई. छोड़ते हुए मैंने एक लेख लिखा था, ‘सी.पी.आई. अपने अंत की शुरुआत कर चुकी है।’ यह लेख ‘पिघलता हिमालय’ आदि पत्रों में छपा था। बिंदुखत्ता में कब्जों का कांग्रेस और बी.जे.पी. ने खुलकर विरोध किया। जबकि सी.पी.एम. न सिर्फ चुप रही, बल्कि पीठ पीछे आलोचना करती रही। सी.पी.आई. का जिला नेतृत्व नौकरशाहाना हो गया था। जब प्रशासन और वन विभाग कब्जे हटवा रहा था तब सी.पी.आई. नेतृत्व का दोगलापन उजागर हुआ। सांगठनिक रूप से उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी, सोशलिस्ट पार्टी और यू.के.डी. का भूमिहीनों को समर्थन था।

सवाल – सी.पी.आई. के बाद क्या आप सी.पी.एम. में चले गए ?

जवाब –  सी.पी.एम. की ओर से प्रस्ताव आया अवश्य था, लेकिन मैं गया नहीं। 78 तक मैं सी.पी.आई. में रहा और यह समझ गया था कि चुनावों के जरिये सत्ता परिवर्तन नहीं लाया जा सकता। भूमि सुधार कार्यक्रम इन पार्टियों के लिए प्राथमिकता नहीं था। जबकि तराई में उस समय 200 एकड़ से अधिक के करीब 400 फार्म थे। उस समय का कार्यकर्ता भूमि संघर्ष के लिए तैयार था।

सवाल – पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय में क्या हुआ था ?

जवाब –  13 अप्रैल 1978 को वैशाखी के दिन पंतनगर हत्याकांड, जिसे जलियांवाला कांड की पुनरावृत्ति माना गया, हुआ था। यह सारा मामला विश्वविद्यालय की करीब 16 हजार एकड़ जमीन को बड़े जमीदारों को सौंपने से संबंधित था, जिसमें प्रशासन और राजनीतिक दल भी मिलीभगत किये हुए थे। उधर विश्वविद्यालय के कृषि फार्म में काम कर रहे मजदूर बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे थे। मजदूरों को उस समय 6.50 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी मिलती थी, जिसमें से विश्वविद्यालय प्रशासन 50 पैसे प्रति मजदूर से उघाई कर लेता था। फिर उन से 30 रुपए प्रतिमाह झोपड़ी का किराया लिया जाने लगा। ऐसे तमाम अत्याचारों के खिलाफ, अप्रैल में जब फसल तैयार हो रही थी तो सात-आठ हजार मजदूर हड़ताल में चले गए। उस रोज झा कॉलोनी के धरनास्थल पर एकत्र करीब दो हजार मजदूरों को पी.ए.सी. ने चारों ओर से घेर लिया और अचानक गोलीबारी कर दी। करीब 200 मजदूरों के मारे जाने की खबर थी। हालाँकि विश्वविद्यालय के छात्रों, प्रोफेसरों और कर्मचारियों के मुताबिक यह संख्या अधिक थी। यह निर्मम हत्याकांड देखकर जब छात्र होस्टलों से कूदकर बाहर आए, तभी गोलीबारी रुकी। घरों में और पेड़ों में गोलियों के निशान पड़ गए। लाशों को हैरो चलाकर कुचल दिया गया। कुछ पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी और कुछ को ट्रैक्टरों में डालकर रामगंगा नदी में बहा दिया।

मैं उन दिनों ‘उत्तर उजाला’ दैनिक में उप-संपादक था। उस दौर में इसे जनपक्षीय अखबार माना जाता था और यही इस क्षेत्र का सबसे बड़ा अखबार भी था। हमने पंतनगर हत्याकांड को प्रमुखता से प्रकाशित किया। हमारे अखबार में छपी खबरों के कारण ही दुनिया को इस घटना की जानकारी हुई थी।

सवाल – इसी घटना पर लिखने की वजह से आपको ‘उत्तर उजाला’ छोड़ना पड़ा ?

जवाब –  हाँ, अखबार के मालिक पर दबाव पड़ा कि वह इस घटना पर और सामग्री न दे और जो छापा गया था, उसका खंडन प्रकाशित करे। हम लोग इस दबाव को मानने के लिए राजी नहीं हुए। फलस्वरूप संपादक को और मुझे बर्खास्त कर दिया गया। इस घटना की पत्रकार यूनियनों ने भत्र्सना की। एक पत्रकार ने मालिक से समझौता कर लिया था, बाकी ने मुकदमा लड़ा। 38 साल से मैं न्याय के लिए लड़ रहा हूँ। हाई कोर्ट से एक बार हम जीत भी गए। अभी अंतिम फैसला होना बाकी है।

सवाल – तो आखिर में भारत सरकार ने आपको ‘देशद्रोही’ बता कर, माओवादी नेता के रूप में गिरफ्तार कर लिया ?

जवाब –  मैं कैसे देशद्रोही या देशप्रेमी हूँ, यह तो भारत सरकार साबित करे। मैं तो जन संघर्षों का सिपाही हूँ। मेरा सपना देश को और पूरी मानव बिरादरी को गैर-बराबरी, अत्याचार और शोषण से मुक्त करना है।

अलबत्ता गिरफ्तारी के घटनाक्रम के बारे में आप को बता सकता हूँ। अपने राजनीतिक कर्म के सिलसिले में मुझे 2004 में दिल्ली जाना पड़ा। वहाँ मैं प्रगतिशील साहित्य प्रकाशित करने वाले ‘न्यू विस्टास’ में काम कर रहा था। प्रवासी मजदूरों के बीच भी जाता था। प्रकाशन के काम से 2010 में मेरा कानपुर जाना हुआ। वहाँ ‘भोर प्रकाशन’ नाम से साहित्य के प्रचार-प्रसार की लंबी योजना थी। मैं किराये के घर में रहता था। 5 फरवरी 2010 को मुझे अचानक घर में नजरबंद कर लिया गया। वहाँ रखी करीब 20 लाख रुपये कीमत की पुस्तकें, कई साल के निजी दस्तावेज और प्रकाशन संबंधी 40 हजार की नगदी जब्त कर ली। निजी दस्तावेजों में 1920 से लेकर 2000 तक की अखबारी कतरनें, विभिन्न पत्रिकाएँ, खुद के लेख, दवाइयों के पर्चे आदि चीजें शामिल थीं। फिर 8 फरवरी को मेरे खिलाफ किदवई नगर थाने में मुकदमा दर्ज किया गया और 9 फरवरी को जेल डाल दिया गया। करीब साढ़े छह साल जेल में बिताने के बाद सुप्रीम कोर्ट से 23 अगस्त 2016 को जमानत मिली। मुकदमा अभी चल ही रहा है। संविधान में साहित्य का प्रचार-प्रसार तो कोई गैरकानूनी काम नहीं है! देशद्रोह तो कदापि नहीं। मैं तो मानता हूँ यह वास्तविक देशभक्ति का काम है…..गरीबों में चेतना लाना, उन्हें उनके हक के लिए लड़ने को प्रेरित करना और उनमें मनुष्य होने की गरिमा पैदा करना।

सवाल – सरकार ऐसे कामों के खिलाफ क्यों है ?

जवाब –  भले ही यह संविधान में मिले अभिव्यक्ति और विचारों की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का हनन हो, लेकिन शायद सरकारों को गरीबों में चेतना बढ़ने से डर लगता है। 1947 में हम जिस तरह से आजाद हुए, उसी में गड़बड़ी थी। औपनिवेशिक राज पूरी तरह विदा नहीं हुआ और उसके साथ दलाल पूँजीपतियों और सामंतों का गठजोड़ हो गया। 1991 में नई आर्थिक नीति के लागू हो जाने से तो साम्राज्यवाद की दुबारा वापसी हो गयी। सुरक्षा, रेलवे, दवा और खुदरा व्यापार जैसे क्षेत्रों में शत-प्रतिशत विदेशी निवेश की मंजूरी से यह साफ हो गया है। कॉर्पोरेट लूट को भारत का विकास बताया जा रहा है। दूसरी तरफ देश की 70 फीसद आबादी कंगाल है और अभावों में जीने को विवश है। शोषण, दमन, महंगाई, बेरोजगारी, नशाखोरी और अराजकता चरम पर है। हमारा आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक ढांचा मेहनतकश अवाम और देशहित के प्रतिकूल है। जो आम जनता के हक में बोलता ह,ै उसकी जबान बंद करने की कोशिश होती है। मुझे जेल में रखकर जो यातनाएँ दी गयीं, वे तो जेल से बाहर रह कर भी करोड़ों लोगों द्वारा रोजाना झेली जाने वाली यातनाओं के सामने कुछ नहीं हैं। मगर, कुछ लोगों को जान से मारकर या जेलों में ठूँसकर आवाज को दबाया नहीं जा सकता।

सवाल – आपको लगता है बदलाव आएगा कभी ?

जवाब –  बदलाव को सालों में नहीं देखा जा सकता। मैं अपने जीवन में इसकी कल्पना नहीं करता। यह लंबा संघर्ष है। सामंतवाद, पूंजीवाद और साम्राज्यवाद को जड़ें जमाने में भी समय लगा। वे जड़ें उखड़ने में भी समय लगेगा। ठहराव की शक्तियां जानती हैं कि वे अनैतिक ही नहीं, अल्पजीवी भी हैं, इसलिए वे खुद को टिकाये रखने के लिए सौ इंतजाम करती हैं। बाजार की संस्कृति के जरिये आम लोगों को भरमाया जाता है। प्रतिगामी शक्तियों के लिए सामन्ती संस्कृति मुफीद है। ऐसी शक्तियां शिक्षा और संस्कृति में आधार बनाती हैं। इसी से सत्ता पर नियंत्रण कायम किया जाता है। भारत में प्रगतिशील लोग अपने लिए वैसी जमीन तैयार नहीं कर सके। लेकिन, अब संघर्षों के बगैर इस कायम आधार को तोड़ा नहीं जा सकता। मेहनतकश जनता के पास अपनी मुक्ति का दूसरा उपाय नहीं है।
लेकिन दमन भी तो तीव्र है ?

जब मुक्ति की उत्कंठा तीव्र होती है, तभी दमन भी तीव्र होता है। मौजूदा समय में भीतर-भीतर तमाम संघर्ष और तमाम तरह के अंतर्विरोध चल रहे हैं। शायद वे सतह पर उभरते न भी दिखाई दें या उनको दूसरी तरह पेश किया जाता हो। इसीलिए शासक वर्ग ने भी भारी दमनचक्र चलाया हुआ है। दमन भी उतना नहीं, जितना सतह पर दिख रहा है। वह भी बहुत अधिक है। लेकिन जनता को इसी के बीच अपने लिए राह तलाशनी होती है। इस काम में बहुत कष्ट हैं। कई लोग दमन से थक-हार जाते हैं, कई लोग कमजोर भी पड़ जाते हैं। मगर ऐसे ही दौर में नए बीज भी तैयार होते हैं। क्रांतियों को दबाया और कुचला तो जरूर जा सकता है लेकिन मारा नहीं जा सकता।

-नैनीताल समाचार से साभार

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