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नेहरू भी देखते थे समाजवाद का ख्वाब

प्रथम प्रधानमंत्री के अलावा भी बहुत कुछ थे नेहरु

May 28, 2016 7:59 am by: Category: खबर खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

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लेखक – एस.एस पंवार

“हिन्दुस्तान एक ख़ूबसूरत औरत नहीं है। नंगे किसान हिन्दुस्तान हैं। वे न तो ख़ूबसूरत हैं, न देखने में अच्छे हैं- क्योंकि ग़रीबी अच्छी चीज़ नहीं है, वह बुरी चीज़ है। इसलिए जब आप ‘भारतमाता’ की जय कहते हैं- तो याद रखिए कि भारत क्या है, और भारत के लोग निहायत बुरी हालत में हैं- चाहे वे किसान हों, मज़दूर हों, खुदरा माल बेचने वाले दूकानदार हों, और चाहे हमारे कुछ नौजवान हों।“ ये शब्द सिर्फ भारत के प्रथम प्रधानमंत्री रहे जवाहर लाल नेहरू के नहीं हैं बल्कि उस नेहरु के हैं जिसने भारत की असल में खोज की इस मायने में वे एक सामाजिक इतिहासकार, दार्शनिक, विचारक और लेखक नजर आते हैं।

 

समाजवाद के विचार से प्रभावित थे नेहरु

14 नवम्बर 1889 इलाहाबाद में जन्में नेहरू पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा असर था लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन जिस ऐशो आराम और ठाठ बाट से बीता उससे समाजवाद के बारे में सिर्फ सोचना ही उनके लिये बहुत बड़ी बात रही हो।

 

गुट-निरपेक्ष आंदोलन की शुरुआत

जवाहर लाल नेहरू ने जोसिप बरोज़ टिटो और अब्दुल गमाल नासिर के साथ मिलकर एशिया और अफ्रीका में उपनिवेशवाद के खात्मे के लिए एक गुट निरपेक्ष आंदोलन की रचना की।

नेहरू का जीवन

नेहरू का जन्म 14 नवम्बर 1889 को इलाहाबाद के एक धनी वकील परिवार में हुआ। पिता का नाम मोती लाल था और माता का नाम स्वरूप रानी था। नेहरू कश्मीरी वंश के सारस्वत ब्राह्मण थे। इनकी शिक्षा ट्रिनिटी कॉलेज, लंदन और कैम्ब्रिज जैसे विख्यात विश्वविद्यालयों में हुई।

सन् 1912 में ये भारत लौटे और वकालत शुरू की। 1916 में इनकी शादी कमला नेहरू से हो गई। महात्मा गांधी, उनके सविनय अवज्ञा आंदोलन ये काफी प्रभावित हुए। गांधी के उपदेशों के बाद इन्होनें पश्चिमी कपड़े त्यागकर खादी अपना ली। 1920-1922 में असहयोग आंदोलन में सक्रिय हिस्सेदारी के बाद नेहरू कुछ महिनें जेल में भी रहे।

पूर्ण स्वराज्य की मांग

1926 से 1928 तक इन्होनें अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के महासचिव के रूप में सेवा की। 1928-29 में, कांग्रेस के वार्षिक सत्र का आयोजन मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में किया गया। दिसम्बर 1929 में, कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में आयोजित किया गया जिसमें जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष चुने गए। इसी सत्र के दौरान एक प्रस्ताव भी पारित किया गया जिसमें ‘पूर्ण स्वराज्य’ की मांग की गई। 26 जनवरी 1930 को लाहौर में जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत का झंडा फहराया। गांधी जी ने भी 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया। आंदोलन खासा सफल रहा और इसने ब्रिटिश सरकार को प्रमुख राजनीतिक सुधारों की आवश्यकता को स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया.

 

जब संभाली कांग्रेस की कमान

जब ब्रिटिश सरकार ने भारत अधिनियम 1935 प्रख्यापित किया तब कांग्रेस पार्टी ने चुनाव लड़ने का फैसला किया। नेहरू चुनाव के बाहर रहे लेकिन ज़ोरों के साथ पार्टी के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। कांग्रेस ने लगभग हर प्रांत में सरकारों का गठन किया और केन्द्रीय असेंबली में सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की। नेहरू 1936 और 1937 में कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए चुने गए। उन्हें 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गिरफ्तार भी किया गया और 1945 में छोड दिया गया। 1947 में भारत और पाकिस्तान की आजादी के समय उन्होंने अंग्रेजी सरकार के साथ हुई वार्ताओं में महत्वपूर्ण भागीदारी की।

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प्रधानमंत्री के रुप में गांधी की पहली पसंद थे नेहरु

सन् 1947 में भारत को आजादी मिलने पर जब भावी प्रधानमंत्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो तो सरदार पटेल को सर्वाधिक मत मिले। उसके बाद सर्वाधिक मत आचार्य कृपलानी को मिले थे। किन्तु गांधीजी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया गया।

रियासतों में बंटे भारत को इकट्ठा करना था चुनौतिपूर्ण

1947 में वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। अंग्रेजों ने करीब 500 देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बड़ी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का समझदारी पूर्वक सामना किया।

आधुनिक भारत के निर्माम में नेहरू की भूमिका अहम

जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ।

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विदेश नीति का भी किया विकास

नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई। वह कोरियाई युद्ध का अंत करने, स्वेज नहर विवाद सुलझाने और कांगो समझौते को मूर्तरूप देने जैसे अन्य अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान में मध्यस्थ की भूमिका में भी रहे। पश्चिम बर्लिन, ऑस्ट्रिया और लाओस के जैसे कई अन्य विस्फोटक मुद्दों के समाधान में पर्दे के पीछे रह कर भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्हें वर्ष 1955 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया।

चीन का आक्रमण हो सकता है उनकी मौत का कारण

नेहरू ने अपने राजनीतिक जीवन में बहुत आयाम स्थापित किये, राजनीति के मायने भी बदले, नेहरू राजनेता के साथ-साथ एक संवेदनशील और मानवीय मूल्यों से प्यार करने वाले शख्स थे। इसका एक कारण यह भी था कि समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव उन पर था और पीड़ित, शोषित और गरीब, पिछड़े तबकों के प्रति उनकी सहानुभूति होती थी लेकिन राजनीतिक रुप से कश्मीर का मुद्दा और चीन के साथ सीमा विवाद न सुलझापाना उनकी असफलताओं के दो बड़े स्तंभ हैं। नेहरू अपनी जड़ें कश्मीर में महसूस करते थे और एक विशेष लगाव उन्हें कश्मीर के साथ था लेकिन चाहकर भी नेहरु कश्मीर की समस्या को हल नहीं कर पा रहे थे वहीं 1962 में चीन के आक्रमण से नेहरू भीतर तक हिल गये। दरअसल कम्यूनिष्ट विचारधारा का नेहरू पर बहुत अधिक प्रभाव था, सोवियत संघ के साथ उनके संबंध बेहतर थे। चीन भी कम्यूनिष्टों द्वारा शासित देश था वह भारत पर आक्रमण कर सकता है इस बारे में नेहरू ने कभी सोचा नहीं था वह मित्रता बनाने में विश्वास रखते थे लेकिन इस हमले से उन्हें गहरा सदमा लगा। कुछ लोग तो उनकी मृत्यु का कारण भी इसी घटना को मानते हैं। 27 मई 1964 को जवाहर लाल नेहरू को दिल का दौरा पड़ा और वे हमेशा के लिये शरीर का त्याग कर गये उनके पार्थिव शरीर की राख आज भी हिंदूस्तान के खेतों में खाद बन नए बीजों को अंकुरित करने में अपना योगदान दे रही है।

चाचा नेहरू

जवाहर लाल नेहरू का एक पक्ष यह भी है कि उन्हें बच्चों से बहुत लगाव था इसी कारण उनका जन्मदिन यानि 14 नवबंर बच्चों को समर्पित होता है और इसे बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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