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के ए अब्बास – फ्री फ्रैंक फियरलैस होकर लिखने वाला लेखक

7 जून 1914 को पानीपत में जन्म 1 जून 1987 को निधन

June 1, 2016 8:03 am by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

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हरियाणा की माटी ने एक से एक कलाकार पैदा किये हैं। जो लोग कहते हैं हरियाणा में एग्रीकल्चर ही कल्चर है दरअसल वे लोग हरियाणा से सही मायनों में परिचित नहीं हैं। हरियाणवी संस्कृति की महक तो आज हिंदी सिनेमा से आने लगी है। एक के बाद एक बड़े बैनर से हरियाणवी पृष्ठभूमि पर फिल्में बनने लगी हैं। लेकिन बॉलीवुड में हरियाणा की पहचान इतनी नई नहीं है बल्कि हरियाणा का हुनर तो बॉलीवुड को विश्व तक लेकर गया है। ऐसी ही एक शख्सियत, जिसने सिनेमा से लेकर पत्रकारिता और अपने जीवन में सामाजिक पक्षधरता को प्रतिबद्धता के साथ पेश किया और नये आयाम स्थापित किये वह थे ख्वाजा अहमद अब्बास साहब।

ख्वाज़ा अहमद अब्बास यानि के ए अब्बास फिल्मों के लिये तो जाने ही जाते हैं लेकिन पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी उनका नाम इज्ज़त से लिया जाता है। उर्दू साहित्य में जहां उनका उल्लेखनीय योगदान रहा वहीं सबसे लंबे समय तक प्रकाशित होने वाले स्तंभकार के रुप में भी वे जाने जाते हैं। बॉम्बे क्रॉनिकल में उनका कॉलम ‘द लास्ट पेज’ 1941 से 1986 यानि उनके अंतिम दिन तक प्रकाशित होता रहा।

 

जीवन का शुरुआती दौर

ख्वाज़ा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून 1914 को पानीपत में हुआ। वे मशहूर शायर हाली पानीपती के परपौत्र थे। उनकी आरंभिक शिक्षा भी हाली मुस्लिम हाई स्कूल में हुई। हालांकि रचनात्मकता, कलात्मकता खासकर लेखन की कला तो इन्हें आनुवांशिक गुणों के रूप में मिली ही थी लेकिन इस कला की पहचान और विकास का गवाह बना अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय। यहां पर उन्हें सज्जाद जहीर, सरदार जाफरी, कैफी आज़मी जैसे दोस्त मिले जिनसे रचनाकर्म पर बातचीत और बहसें होती रहती असल में विचारों की जुगाली ही तो उनकी खास पढ़ाई थी। अंग्रेजी में बीए और कानून की पढ़ाई की इसी दौरान पढ़ते पढते उनका रूझान पत्रकारिता की और हो गया। हिंदी, अंग्रेजी और ऊर्दू पर उनकी अच्छी पकड़ थी और तीनों ही भाषाओं में लिखने का महारत उन्हें हासिल था। इन्होंने छात्र जीवन में ही अलीगढ़ ऑपिनियन नामक पत्रिका का प्रकाशन करना शुरु किया। किसी भी छात्र द्वारा प्रकाशित की जाने वाली यह पहली पत्रिका थी इस प्रकार वह पत्रकारिता की दुनिया में पहले छात्र प्रकाशक कहे जा सकते हैं। इसके बाद इन्होंने नेशनल कॉल नाम के एक समाचार पत्र में भी काम किया। पढाई पूरी होने के बाद ये बॉम्बे क्रानिकल में शामिल हो गये यहां थोड़े समय पश्चात ही इन्होंने अपनी अच्छी जगह बना ली और इन्हें फिल्म संपादक बना दिया गया।

फिल्मों की और रूझान

कुछ लेखकीय गुण और परदादा अल्ताफ हुसैन हाली के साहित्य से विरासत में मिली मानवीयता और छात्र जीवन में मार्क्सवादी या कहें समाजवाद का सपना देखने वाले दोस्त इन सबका उनके जीवन पर गहरा प्रभाव था लिखते लिखते वे बंबई तक पहुंच गये थे। 1941 में इन्होंने अपनी पहली फिल्म नया संसार लिखी जिसकी पटकथा इन्होंने हिमांशु राय और देवीका रानी की प्रोडक्शन कंपनी को दी।

निर्देशक के रुप में इनके करियर की शुरुआत 1945 में उस समय हुई जब इन्होंने इप्टा (इंडियन पिपुल्स थियेटर ऐसोसिएशन) के लिये फिल्म धरती के लाल बनाई जोकि 1943 में बंगाल में पड़े अकाल पर आधारित थी। बस यहीं से इनका फिल्मी करियर ऊंचाईयों को छूता गया। 1951 में इन्होंने नया संसार नामक खुद की कंपनी शुरु की जिसमें अनहोनी जैसी सामाजिक फिल्मों का निर्माण हुआ। मजदूर गाहे-बगाहे उनकी फिल्मों में आते रहे। इससे पहले 1946 में आयी चेतन आनंद की नीचा नगर और वी शांताराम की डॉ. कोटनीस की अमर कहानी भी अब्बास साहब की कलम का कमाल था। अभी तक वे पूर्ण रुप से सामाजिक प्रासंगिकता वाली फिल्में लिख रहे थे और बना रहे थे। लेकिन राजकपूर के लिये जब उन्होनें आवारा(1951) लिखी तो फिर इनकी कलम और राजकपूर के निर्देशन ने कमाल कर दिया। इनकी कलम जहां गंभीरता के साथ सामाजिक पक्षधरता के साथ डटी रहती वहीं राजकपूर उसमें दर्शक को दिल थाम कर बैठे रहने का हुनर भर देते और फिल्म एक के बाद एक सुपर डूपर से भी ऊपर की हिट होती गई। आवारा को तो देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में देखा गया। सोवियत रूस तो राजकपूर का दिवाना हो गया था। इसके बाद उन्होंने राजकपूर के लिये श्री 420, जागते रहो, मेरा नाम जोकर, और बॉबी जैसी कई सफल फिल्में लिखी, 1991 में आई आर.के बैनर की फिल्म हिना जिसे रणधीर कपूर ने निर्देशित किया वह भी अब्बास जी की कहानी पर आधारित थी, राम तेरी गंगा मैली की भी शुरुआत और उसका अंत भी राजकपूर के लिये अब्बास ने लिखा था। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी सीमाओं को स्वीकारने में भी कभी हिचकिचाहट महसूस नहीं की राजकपूर के साथ फिल्मों पर एक बार उन्होंने कहा करते कि ‘राजकपूर के लिये लिखी हुई फिल्मों का वे खुद निर्देशन करते तो संभवत ने सभी फिल्में असफल रहती।’

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अमिताभ बच्चन को दिया मौका

कई साल तक वी. शांताराम, चेतन आनंद और राजकपूर जैसे महान फिल्मकारों के लिये बेहतरीन फिल्में लिखने के बाद अब्बास साहब खुद भी निर्देशन करने लगे। यह फिल्म थी सात हिंदुस्तानी कौन जानता था कि यह फिल्म अपने आप में इतिहास स्थापित करेगी और सदी का महानायक पैदा करेगी। जी हां यही वो फिल्म है जिसमें सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को मौका दिया। अमिताभ हमेशा अब्बास साहब के ऋणि रहे। उन दिनों अमिताभ अभिनय के क्षेत्र में संघर्ष कर रहे थे। यहां से उनका करियर चला तो एंग्री यंगमैन से होते हुए सदी के महानायक तक का सफर उन्होंने तय किया। सात हिंदुस्तानी के बाद उन्होंनें कई वृतचित्रों के अलावा एक फीचर फिल्म दो बूंद पानी भी बनाई।

पुरस्कार और सम्मान

सात हिंदुस्तानी और दो बूंद पानी इन दोनों फिल्मों के लिये अब्बास साहब को राष्ट्रीय एकता के लिये नरगिस दत्त पुरस्कार मिला। कान्स फिल्म फेस्टिवल में पाल्मे डी पुरस्कार भी उन्होंनें नीचा नगर के लिये जीता, उनकी फिल्म परदेसी भी इसके लिये नामित हुई। 1969 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से बी सम्मानित किया गया।

हरियाणा स्टेट रॉब ऑफ ऑनर

साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये 1969 में ही हरियाणा स्टेट रोब ऑफ ऑनर दिया गया, उर्दू साहित्य में योगदान के लिये 1983 में ग़ालिब पुरस्कार भी उन्हें मिला, 1984 में उर्दू अकादमी दिल्ली का विशेष पुरस्कार भी एवं महाराष्ट्र ने भी उर्दू अकादमी पुरस्कार 1985 में अब्बास साहब को दिया।

साहित्य लेखन

अपने पचास साल के लेखकीय जीवन में साहित्य के क्षेत्र में ख्वाजा अहमद अब्बास ने उल्लेखनीय योगदान दिया। अंग्रेजी, ऊर्दू और हिंदी में उन्होंने 73 से अधिक पुस्तकें लिखी। उनकी आत्मकथा आई एम नॉट एन आयलैंड 1977 में प्रकाशित हुई जो काफी चर्चित हुई लेकिन सबसे ज्यादा इंकलाब पसंद की गई। इंकलाब के साथ इनकी कई और पुस्तकों का भी अन्य देशी और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ।

 

अब्बास साहब ने जब से लिखना शुरु किया उनकी अंतिम सांस तक कलम नहीं रुकी अपनी लेखनी से पर्दे के जरिये वे बराबरी के समाज का सपना देखते रहे और दर्शकों के सामने यथार्थ का चित्र खींच कर सवाल भी छोड़ते रहे। 1 जून 1987 को कलम के पंख लगाकर विचारों की उड़ान भरने वाला शब्दों का चित्रकार अपने शब्दों में प्रेम की एक गहरी भावना और सद्भाव के बीज हमारे बीच बिखेर गया लेकिन लगता उनके साथ ही पर्दे पर यथार्थ का अंत सा हो गया। लेकिन फ्री, फ्रैंक और फीयरलैस होकर उन्हें जो लगा, वही लिखा।

अब्बास साहब के दांपत्य और राजनैतिक जीवन पर फिर कभी….. हरियाणा खास अपनी धरती के इस लाल को सलाम करता है।

के ए अब्बास – फ्री फ्रैंक फियरलैस होकर लिखने वाला लेखक Reviewed by on . हरियाणा की माटी ने एक से एक कलाकार पैदा किये हैं। जो लोग कहते हैं हरियाणा में एग्रीकल्चर ही कल्चर है दरअसल वे लोग हरियाणा से सही मायनों में परिचित नहीं हैं। हरि हरियाणा की माटी ने एक से एक कलाकार पैदा किये हैं। जो लोग कहते हैं हरियाणा में एग्रीकल्चर ही कल्चर है दरअसल वे लोग हरियाणा से सही मायनों में परिचित नहीं हैं। हरि Rating: 0

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