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कश्मीर – हर रोज लिखी जा रही हैं अत्याचारों की कहानी

जन्नत पर छा रहा जहन्नुम का साया

July 20, 2016 10:57 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

कश्मीर की जिस घाटी की तुलना जन्नत से की जाती है उसके हालात आज जहन्नुम से बदतर हैं। कश्मीर से आने वाले समाचारों से इस खौफनाक मंजर की तस्वीर और भी साफ हो जाती है। बीबीसी हिंदी लिये स्वतंत्र पत्रकार आराबू अहमद सुल्तान अपनी रिपोर्ट में कश्मीरी जिंदगियों के जीवन में छाने वाले इस अंधेरे के बारे में लिखा है।

kashmir eye

बीबीसी से साभार

सरकारी बलों पर मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के उल्लंघन का आरोप

एसओपी के नियमों के मुताबिक यदि स्थिति बहुत ही बेकाबू हो सरकारी बल पैरों को निशाना बना सकते हैं लेकिन कश्मीर के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हुए लोगों में से 90 फीसद से भी ज्यादा लोगों को कमर के ऊपर के हिस्से में चोटें आयी हैं। स्वतंत्र पत्रकार आराबू लिखते हैं कि एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर कहा है कि “सरकारी बल जानबूझकर छाती और सिर को निशाना बना रहे हैं उनका उद्देश्य मारने का है”

 

छर्रों से जा रही है आंखों की रोशनी

हिजबुल कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद हो रहे विरोध प्रदर्शनों में सेना बलों की कार्रवाई में करीब 47 लोगों की जान जा चुकी है तो वहीं पिछले दस दिनों में श्री नगर के अस्पतालों में चिकित्सकों ने 447 घायलों की सर्जरी की है। इनमें 143 मामले आंखों से संबंधित है। इनमें से भी सात लोगों के जीवन में बिल्कुल अंधेरा हो गया है वहीं अन्य में भी कई की हालत गंभीर है। चिकित्सकों का कहना है कि जिन्हें छर्रे लगे हैं उनकी आंखों की रोशनी पूरी तरह से लौट पायेगी ऐसा संभव नहीं लगता।

 

मानवाधिकार आयोग ने मांगी रिपोर्ट

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी बड़े स्तर पर मरने वालों और घायलों की संख्या को देखते हुए जम्मू-कश्मीर के युनियन होम सेक्रेटरी और चीफ सेक्रेटरी से मामले की रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

 

क्या राष्ट्रवादी होने के लिये हिंसक होना जरुरी है

देशभक्त, राष्ट्रवादी अचानक पाकिस्तान और कश्मीर की बात आते ही अचानक ये शब्द जहन में कौंध जाते हैं जेएनयू प्रकरण के बाद देशभक्ति का पाठ एक बार फिर से पढ़ा जाने लगा है हिजबुल कमांडर वानी के बहाने एक बार फिर से देशभक्ति ऊपर उठ गई है और कश्मीरियों की असल समस्या से फिर नजरें चुराई जा रही हैं। बुरहान वानी को मारना सेना की बड़ी उपलब्धि है इसमें कोई शक नहीं लेकिन कश्मीर के लोग सरकारी बलों की ज्यादतियों के किस्से भी गाहे बगाहे बताते रहते हैं इसकी एक तस्वीर एसओपी के उल्लंघन से भी उभरती है। सेना की असली उपलब्धि तब होगी जब कश्मीर के लोगों में वह अपने लिये थोड़ी इज्जत कमा पायेगी और आतंकियों के जनाज़ों में हजारों लाखों की भीड़ शामिल होनी बंद हो जायेगी। तब तक के लिये यह राजनेताओं के लिये पूरे भारत की भावनाओं को भड़काने का एक जरिया मात्र है।

 

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