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आखिरी कब तक मासूम बेटियां बलात्कार की बलि चढ़ती रहेगी।

December 11, 2017 7:25 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

आखिरी कब तक मासूम बेटियां बलात्कार की बलि चढ़ती रहेगी।

यौन कुंठाओ का शिकार आदमी को बनाया जा रहा है। इस सबके पिछे बाजार का बहुत बड़ा हाथ है। जिसने औरत को एक माल बना दिया है। औरत को हमेशा एक सैक्स डॉल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा। जहां अखबारों में मजदूर, किसान, छात्र व महिलाओं की समस्या पर कुछ भी नहीं लिखा जाता या एक कोने तक खबर को समेट दिया जाता है वहीं मर्दाना ताकत बढ़ाने के अनगिनत विज्ञापन भरे होते हैं जिन्हें युवा हों या बुजुर्ग सभी को बड़े ध्यान से पढ़ते देखा गया है। भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी का जो गुस्सा सत्ता के प्रति होना चाहिए था बाजार ने उसे विलासिता में बदल कर अपने कब्जे में कर लिया है। मनुष्य के सामूहिक गुण को व्यक्तिवादिता में बदल दिया है।

        दोस्तो कल रात हिसार जिले के उकलाना कस्बे में एक पांच साल की मासूम लड़की के साथ मानवता को शर्मसार करने वाली जघन्य घटना को अंजाम दिया गया।  दिहाड़ी मजदूरी कर अपना पेट भरने के लिए बाहर से आया यह परिवार यहां कई सालों से झुग्गी में रह रहा था।  रात को मां अपनी दोनों बेटियों के साथ झुग्गी में सोयी हुयी थी। रात को अचानक आंख खुलने पर  वह अपनी छोटी बेटी को झुग्गी में ना पाकर बाहर ढूंढने निकलती है और मात्र 250 मीटर की दूरी पर खून से लथपथ अपनी बेटी को देखकर सुन्न हो जाती है।  डॉक्टरी रिपोर्ट में आया है कि उसे जमीन पर पटक-पटक कर मारा गया है और लड़की के गुप्तांगों में लकड़ी ठुसी गयी है। बच्ची के साथ रेप हुआ या नहीं इसकी अधिकारिक तौर पर पुष्टि नहीं हुयी है।लेकिन सच्चाई यही है कि रेप के उद्देशय से ही लड़की को उठाया गया था और उससे दुश्मनी ही क्या थी।
आखिर हम कहां आ गये? एक इंसान जो सोच सकता है अपने हाथों से नये आविष्कार कर सकता है। वह इतना कुंठीत कैसे होता जा रहा है? वह नये आविष्कारों की अपेक्षा मानवता को शर्मसार करने में क्यों अपने जीवन को खत्म कर रहा है?

हमें जड़ो को तलाशना होगा। क्या शोक सभा, कैंडल मार्च से समस्या का हल हैं? कभी नहीं फौरी तौर पर यह हमारे जिंदा होने का सबूत भर है।
यौन कुंठाओ का शिकार आदमी को बनाया जा रहा है। इस सबके पिछे बाजार का बहुत बड़ा हाथ है। जिसने औरत को एक माल बना दिया है। औरत को हमेशा एक सैक्स डॉल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा। जहां अखबारों में मजदूर, किसान, छात्र व महिलाओं की समस्या पर कुछ भी नहीं लिखा जाता या एक कोने तक खबर को समेट दिया जाता है वहीं मर्दाना ताकत बढ़ाने के अनगिनत विज्ञापन भरे होते हैं जिन्हें युवा हों या बुजुर्ग सभी को बड़े ध्यान से पढ़ते देखा गया है।

भूखमरी, गरीबी, बेरोजगारी का जो गुस्सा सत्ता के प्रति होना चाहिए था बाजार ने उसे विलासिता में बदल कर अपने कब्जे में कर लिया है। मनुष्य के सामूहिक गुण को व्यक्तिवादिता में बदल दिया है।
हमारे आस-पास अनगिनत उदाहरण मिल जाएंगे जो हमारी असंवेदनशीलता को जगजाहिर करते हैं। जब रोहतक में नेपाली युवती की रेप के बाद जघन्य तरीके से हत्या की गयी तो रोहतक के विवेकशील लोगों ने समस्त रोहतक निवासियों से आह्वान किया कि वो मानसरोवर पार्क में इक्ट्ठे हों और अपराधियों को पकड़ने के लिए प्रशासन पर दबाव डालें। सैंकड़ों की संख्या में लोग आए लेकिन वहीं पार्क में ताश खेलने वाले लोग ताश खेलते रहे. जो सायं को घूमने आते हैं सभा में मुश्किल से दो मिनट रूके होंगे फिर अपने फेरे पूरे करने चलते बने। क्या इस लिए कि वह नेपाल की थी? हां सिर्फ और सिर्फ इसलिए। इस प्रदर्शन में जितने भी लोग शामिल हुए आखिर फिर से उन्हें एकजुट होना होगा। बाजार द्वारा यह जो विलासिता की संस्कृति खड़ी की जा रही है इसका विरोध करना होगा और वैकल्पिक संस्कृति का निर्माण करना होगा।

स्कूल कॉलेजों में जो शिक्षा दी जा रही है वह एक गैर बराबरी पर आधारित शिक्षा है। जो महिला को हमेशा घर में कार्य करने वाली, बच्चे पैदा करने वाली और पिता, पति, पुत्र की गुलाम बनी रहने की शिक्षा देती है। जब तक महिला को एक इंसान का दर्जा नहीं दिया जाएगा तब तक रेप जैसी क्रूरतम घटनाएं घटती रहेंगी और सरकारें जो बाजार की दलाली का काम कर रही हैं वो इस शिक्षा पद्ति को कभी नहीं बदलेंगी।  हम जहां भी रहें वहीं लोगों को जैसे भी हो सके जागरूक करें।

लेखक परिचय – संदीप कुमार स्वतंत्र लेखक हैं एवं सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लेंगिक समानता पर काम करते है। दलित एवं पीड़ितों के हक की आवाज़ के लिये अपने संगठन के माध्यम से उठाते रहते हैं।

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

 

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