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आखिरकार FRDI बिल का सबसे महत्वपूर्ण क्लाज ‘बेल इन’ क्या है ?

December 23, 2017 1:11 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

आखिरकार FRDI बिल का सबसे महत्वपूर्ण क्लाज ‘बेल इन’ क्या है ?

इस विधेयक का नाम है फाइनैंशियल रेजॉल्युशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल (एफआरडीआई) वस्तुतः बेल इन IMF यानी इंटरनेशनल मोनेटरिंग फण्ड द्वारा सुझाया गया फार्मूला है विश्व इतिहास में इस फार्मूले को दो ही बार इस्तेमाल में लाया गया है 2013 में साइप्रस में बैंकों ने अचानक जमाकर्ताओं के पैसे निकालने पर रोक लगा दी, साइप्रस सरकार ने भी बैंको को बेलआउट देने से इनकार कर दिया तब साइप्रस में इस बेल इन फार्मूले को अमल में लाया गया, ओर यह फार्मूला बुरी तरह से विफल हुआ ओर यह जमाकर्ताओं के साथ एक तरह का कानूनी धोखा साबित हुआ लेकिन दूसरी तरफ साइप्रस से कुछ समय पहले 2011डेनमार्क में भी इस फार्मूले को लागू किया गया था वहाँ पर इसे बेहद समझदारी के साथ लागू किया गया और सामान्य जमाकर्ताओं को इसके दुष्प्रभाव से बचा कर रखा गया ओर इसके बाद ही यूरोपीय देशों में बेल इन के बारे में गंभीरता से विचार किया गया

गिरीश मालवीय

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद G20 देशों के अंतरराष्ट्रीय निकाय वित्तीय स्थिरता बोर्ड ने सिफारिश की थी कि देशों को अपने अधिकार क्षेत्र में बेल इन की व्यवस्था करनी चाहिए, भारत भी इनका सदस्य देश है साधारण शब्दों में बेल-इन का अर्थ है कि बैंक का घाटा अगर ज़्यादा बढ़ जाता है तो वो आम लोगों की पूंजी से अपने नुकसान की भरपाई करें और ख़ुद को बचाने की कोशिश करें.”

बेल आउट यानी सरकार के पैसे से दिवालिया होने से बचना अौर बेल इन यानी बैंक द्वारा जमाकर्ताओं के पैसे को बांड या शेयर आदि में बदल कर दिवालिया होने से बचना। आर्थिक मामलों के जानकार एमके वेणु कहते हैं, बेल इन को लेकर लोगों का शक़ जायज़ है। ये प्रावधान कहता है कि जमाकर्ता का पैसा कुछ वक्त के लिए सरकार रोक सकती है।

बिज़नेस स्टेंडर्ड में देवाशीष बसु लिखते हैं “भारतीय न्याय व्यवस्था प्राय: हमें विचित्र किस्म के हलों से दो चार होने का अवसर देती रही है लेकिन अब तक हमारा पाला किसी ऐसे न्यायाधीश से नहीं पड़ा है जिसने आकर किसी विफल बीमा कंपनी के ऋण देने वाले से कहा हो कि अपना पैसा भूल जाओ और बदले में कंपनी के कुछ शेयर ले लो। न ही किसी नाकाम बैंक के जमाकर्ता से किसी ने यह कहा होगा कि आपने अपनी गाढ़ी कमाई के जो पैसे बैंक में जमा किए थे उन्हें भूल जाइए और बदले में दिवालिया हुए बैंक के कुछ शेयर रख लीजिए। अगर इन शेयरों की कीमत सुधरती है तो आपको अपना पैसा वापस मिल जाएगा। परंतु आने वाले दिनों में अदालतें ऐसे निर्णय दे सकती हैं क्योंकि कानून बनने जा रहे एक नए विधेयक में काफी कुछ ऐसी ही बातों का उल्लेख है।

इस विधेयक का नाम है फाइनैंशियल रेजॉल्युशन ऐंड डिपॉजिट इंश्योरेंस बिल (एफआरडीआई) वस्तुतः बेल इन IMF यानी इंटरनेशनल मोनेटरिंग फण्ड द्वारा सुझाया गया फार्मूला है विश्व इतिहास में इस फार्मूले को दो ही बार इस्तेमाल में लाया गया है 2013 में साइप्रस में बैंकों ने अचानक जमाकर्ताओं के पैसे निकालने पर रोक लगा दी, साइप्रस सरकार ने भी बैंको को बेलआउट देने से इनकार कर दिया तब साइप्रस में इस बेल इन फार्मूले को अमल में लाया गया, ओर यह फार्मूला बुरी तरह से विफल हुआ ओर यह जमाकर्ताओं के साथ एक तरह का कानूनी धोखा साबित हुआ लेकिन दूसरी तरफ साइप्रस से कुछ समय पहले 2011डेनमार्क में भी इस फार्मूले को लागू किया गया था वहाँ पर इसे बेहद समझदारी के साथ लागू किया गया और सामान्य जमाकर्ताओं को इसके दुष्प्रभाव से बचा कर रखा गया ओर इसके बाद ही यूरोपीय देशों में बेल इन के बारे में गंभीरता से विचार किया गया।

बेल इन जैसे विचार को धरातल पर उतारने के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उसके कानूनी स्वरूप की व्याख्या कैसे की जाती है और दूसरी महत्वपूर्ण चीज यह है कि इसे किन परिस्थिति में लागू किया जाता है जब हम भारत के संदर्भ में विचार करते है तो पाते है कि हमारे बैंकिंग सिस्टम में एनपीए अब अपने उच्चतम स्तर पर पुहंच गया है रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने पिछले दिनों बैंकों को शीर्ष अधिकारियों को संबोधित करते हुए एक बड़ी बात कही थी. उनका कहना था कि फंसे हुए कर्ज की समस्या इतनी भयानक हो चुकी है कि एक समाज के रूप में अब हमारे पास कोई बहाना नहीं बचा है। इसलिए कोई कितनी भी चीख पुकार मचा ले कुछ दिनों में यह FRDI बिल पास होकर ही रहेगा, देखना बस इतना है कि इस सरकार में भारत के इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक संकट से निबटने की क्षमता कितनी है।

गिरीश मालवीय की फेसबुक वॉल से साभार

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