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क्या यहां से कोई रास्ता खुलता है ?

December 18, 2017 3:36 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

विपक्षियों के मोदी मैजिक के उतार के तमाम दावों के बावज़ूद गुजरात चुनाव के नतीजों से किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के हालात ऐसे ही रहे तो 2019 के चुनावों में भी देश में भाजपा की ही सरकार बनेगी। शान्ति, सौहार्द्र, जनकल्याण, धर्मनिरपेक्षता और विकास की बातें अब बेमानी हैं। मतों का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण आज राजनीति का सबसे कारगर अस्त्र है। लोकतंत्र की इस हालत के लिए भाजपा ही नहीं, सभी सियासी दल समान रूप से ज़िम्मेदार हैं। तमाम गैर भाजपाई पार्टियां दशकों तक मुस्लिमों को बेवक़ूफ़ बनाकर अपने पक्ष में उनके वोटों के ध्रुवीकरण की अथक कोशिशें करती रही हैं। मुस्लिमों की शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति सुधारने की जगह उन्हें अपना वोट बैंक बनाने के लिए उन्होंने उनकी कुरीतियों, अंधविश्वासों और हठधर्मिता तक को को हवा दी। इसमें वामपंथी दलों और उनके पोषित बुद्धिजीवियों की भूमिका सबसे गंदी रही जिन्होंने हिन्दू आस्थाओं और उनके देवी-देवताओं पर तो लगातार प्रहार किए, लेकिन मुस्लिमों में व्याप्त कुप्रथाओं के खिलाफ कभी उनकी ज़ुबान नहीं खुली। देर-सबेर इसकी प्रतिक्रिया होनी थी। भाजपा और संघ ने विपक्षियों की इसी रणनीति को हथियार बनाकर बड़े सुनियोजित तौर पर पिछले कुछ सालों में हिन्दू मतों के ध्रुवीकरण में सफलता पाई है। उनकी कोशिशों से राजनीति का सांप्रदायिकरण आज अपने चरम पर है। नफ़रत की सियासत को नैतिक वैधता हासिल हुई है। धर्म के आधार पर हत्याओं को ज़ायज ठहराया जाने लगा है। हत्यारों का महिमामंडन हो रहा है। धर्मनिरपेक्षता इस देश में अब एक गाली है। राजनीति के इस भगवाकरण में सिर्फ भाजपा, संघ और मोदी-अमित शाह की ही नहीं, तमाम विपक्षी दलों के एकपक्षीय आचरण की भूमिका भी रही है। राजनीति और धर्म को अलग करने के बजाय कांग्रेस के नए अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदिर-मंदिर घूमकर और खुद को जनेऊधारी दिखाकर पहली बार कट्टर हिन्दू मतों को आकर्षित करने की जो प्रतिगामी कोशिशें की है, उससे किसी स्वस्थ परंपरा की नींव नहीं पड़ती।

आने वाले सालों में अगर देश को सांप्रदायिकता के तेजी से फैलते जहर से बचाना है तो देश के तमाम वामपंथी और मध्यमार्गी विपक्षी दलों को अपनी छुपी हुई सांप्रदायिकता की नीति पर पुनर्विचार ही नहीं करना होगा, भविष्य के सभी चुनावों में उन्हें एक कॉमन मैनिफेस्टो के आधार पर और एक सर्वमान्य नेता के साथ एकजुट होकर भाजपा के खिलाफ़ चुनाव में उतरना होगा।

( लेखक ध्रुव गुप्त बिहार के पूर्व आईपीएस अधिकारी हैंं, देश के कई चर्चित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं, आलेख इत्यादी प्रकाशित होते रहे हैं। )
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