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हिंदुस्तानः एक स्वार्थी लोगों का मुल्क 

March 3, 2018 7:25 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

भारत में अनेको धर्मों, जातियों के लोग हैं। यहां अनेकों तरह की मान्यताएं प्रचलित है। विभिन्न धर्मों के लोग यहां रहते ही नहीं वे अपने तमाम तरह के त्योहार भी बड़ी आजादी के साथ मनाते हैं और ऐसी आजादी का उल्लेख हमारे मौलिक अधिकारों में अच्छे से किया गया है। एक धर्मनिरपेक्ष देश होने के कारण यहां किसी भी धर्म को मानने का स्वतंत्र अधिकार है। देश के बुद्धिजीवियों की एक बड़ी तादात प्रशासनिक सेवाओं, सरकारी नौकरियों के बड़े पदों पर आसीन है, तो वहीं कुछ ऐसे भी कर्मचारी हैं जिन्हें महज खाने और पहनने या जीवन निर्वाह करने जितनी आमदनी प्राप्त होती है। समय-समय पर गरीबी और बेरोजगारी के चलते होने वाली मौतों के वार्षिक आंकड़े इस देश की बुद्धिजीवी जनता को समय-समय पर शर्मसार करते रहे हैं। इतना ही नहीं कभी इस देश की कोई बच्ची रोटी-रोटी पुकारते हुए दम तोड़ देती है, तो कभी उधार दिए हुए कुछ पैसों के न मिलने से इस देश की नीची समझे जाने वाली जातियों के लोगों को जिंदा जला दिया जाता है।

इस देश में आदीवासी क्षेत्र भी है जहां पूरी तरह शिक्षा तो दूर की बात वहां के लोगों का तन ढकने के लिए कपड़ा तक नसीब नहीं होता। तो कुछ ऐसे भी इलाके हैं जहां दलितों को छूआछूत जैसी समस्याओं से रूबरू तो होना ही पड़ता है, वहीं बुंदेलखंड के टीकमगढ़ में आज उच्च मानी जाने वाली जातियों की दबंगई इतनी है कि दलितों को उनके घर के आगे से निकलते वक्त जूते उतार लेने पड़ते हैं। छूआछूत का ताजा और आंखों देखा यथार्थ राजस्थान के अधिकतर जिलों में घूमकर आज भी पता किया जा सकता है। मेरे एक मित्र और राजस्थान के चुनिंदा साहित्यकारों में एक डॉ. सत्यनारायण सोनी बताते हैं कि बाढमेर ( जहां वे कार्यरत है ) में आज भी किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में दतित जातियों के बैठने के लिए अलग स्थान दिया जाता है। इस तरह की जाति, धर्म, उंच-नीच, सामाजिक-आर्थिक असमानता संबंधी तमाम तरह की समस्याएं मुल्क के चारों तरफ मुंह बाए खड़ी है।

मौजूदा समय में इन सबसे निपटने का प्रयास धनसम्पन्न बुद्धिजीवियों के चिंतन में शामिल होना चाहिए, मगर ऐसा है नहीं। हालांकि जिम्मेदारी भी उन्हीं लोगों की बनती है जिनका आर्थिक आधार मजबूत है और जो किसी तरह का प्रयास कर सकते हों। लेकिन आर्थिक आधार मजबूत होने का मतलब इस देश में या तो मात्र अपने लिए रहन-सहन और परिवार की सुख-सुविधाओँ का प्रयास करना है, या फिर किसी धार्मिक संस्थानों में चंदा दे देना है। देश की गरीब जनता के लिए किसी तरह के सहयोग का प्रयास करना उन लोगों के चिंतन का विषय नहीं है। लोकतंत्र और राजनैतिक जनों का जिक्र मैनें इसलिए नहीं किया कि उनसे ये समस्या हल होती तो भारत को में ऐसे आजादी के बाद के 71 बरस बीत चुके हैं। बावजूद इसके भूख यहां की मुख्य समस्याओं में से है। इस संबंध में पिछले दिनों की अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक आंकड़ों पर गौर करें तो भारत इस फेहरिस्त के 119 देशों में 100 वें स्थान पर है। ऐसे में भारत भूख के मामले में उत्तर कोरिया, बंग्लादेश और इराक से भी पीछे है।

भूख के अतिरिक्त इस देश की जाति, धर्म, उंच-नीच जैसी अनेकों समस्याओं से निपटने का आजतक तक कोई बड़ा प्रयास नहीं हुआ। अगर सरकारें इनके सही करने के लिए प्रतिबद्ध होती तो आजतक सब समस्याएं खत्म हो चुकी होती। अनेकों तरह के सांम्प्रदायिक दंगे और आरक्षण जैसी लड़ाइयां इन समस्याओं का परिणाम वक्त-वक्त पर देखने को मिला है। देश का अधिकतर मीडिया किस तरह बिका हुआ है, ये बात किसी से छुपी हुई नहीं है। जनता का शोषण और उत्पीड़न इतनी धीमी गति से होता हुआ आगे बढा है कि इसी सीधी मार मेहनतकश पर पड़ती रही है; ये बात आज मालूम हुई है। देश के संवेदनशील बुद्धिजीवियों को छोड़कर देश का एक बड़ा तबका हाल ही में मीडिया से विमुख तब हुआ जब एक यौन शोषण के आरोपी कथित धार्मिक बाबा राम रहीम की गिरफ्तारी के वक्त मीडिया ने सटीक शब्दों में उसकी खबर दिखाई। जब बाबा के अनुयायियों की आस्था पर सीधी मार जब मीडिया के कड़े शब्दों की पड़ी तो एकदम से उनका मोह भंग हो गया। इससे पहले तक जो बिका हुआ मीडिया था उसके संबंध में हालांकि उनकी कोई टिप्पणी नहीं थी। इस घटना के बाद ये बात ठोक-बजाकर कही जा सकती है कि इस देश में तमाम तरह के खेमे स्वार्थता की खाल ओढ़े अपने-अपने कामों में जुटे हुए हैं, जिन्हें एक बार आंख खोलकर पूरे देश के कोने-कोने को सजगता से देखने की जरूरत है।

(लेखक एस.एस.पंवार स्वतंत्र पत्रकार हैं, उनके अन्य लेख आप नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं )

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