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किसान समस्याऔ पर एक रिर्पोट

December 24, 2017 9:43 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

 

यह वह सच का आइना है जिसके सामने खड़े होकर अपना चेहरा भी भयानक डरावना दिखलाई पङ रहा है। जब प्रकृति की सौन्दर्यता ही खत्म हो रही है तो फिर सभ्यता भी नहीं बचेगी?

Jaipal Nehra की किसान समस्याऔ पर एक रिर्पोट – 21 दिसंबर को 03:26 अपराह्न बजे

फेशबुक के उन सभी मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि किसानों के बारे में जानने-समझने के लिए कुछ गाँवों में जाएँ और किसानों के जीवन तथा वहाँ की शिक्षा और स्वास्थ्य से जुङी हुई संस्थाओं को भी नजदीक से देखकर आकलन करें। 

आजकल कृषि को करीब से जानने-समझने के लिए रोज एक-दो किसानों से मिलता हूं। लगभग जिनसे भी मिलता हूँ वे आज खुद किसानी में हैं और उनके बाप-दादा भी खेती करते हुए इस दुनिया से चल बसे। खेती-किसानी करने का पुरानी परंपरा को निर्वाह करते हुए आज वो बढ़ निकले है। अपने पूर्वजों की कमाई को जीवंत रखने की कोशिश में लगे हुए हैं। उनकी पीड़ा को समझने की कोशिश करता हूं और इस परिप्रेक्ष्य में मेरे जहन से उठने वाला सवाल भी यही होता है कि जिस स्कूल में वो पढ़ाई-लिखाई कर चुका है क्या आज उनके बच्चे किसी बेहतर विद्यालय को मुंह देख पाये हैं?

वे जब बताते हैं कि हम लोगों के समय में सरकारी विद्यालय में ठीक-ठाक पढ़ाई-लिखाई की समुचित व्यवस्था हुआ करती थीं तो आज के समय वो विद्यालय खुद भी अंतिम सांसें गिन रहे हैं। जब दस किसानों के बीच पहुंचता हूं उसमें बमुश्किल 2-3 ही किसानों के चेहरे पर मुझे मुस्कान नजर आती है। वो अपने पेशेवर खेती से खुश दिखते हैं। किसान खुद बताते हैं कि खेती करने के लिए नये फसल लगाने के वक्त गांव के ही किसी बड़े सूदखोरों से ब्याज पर रकम लाकर अपने खेतों में फसल बुआई करता हैं । उसमें खाद-पानी डालता हैं।

एक किसानों की एक समस्या धान की फसल के बाद उसके पुआल के निपटान की भी है। किसानों को तुरंत बाद खेत में गेहूँ की बिजाई करनी होती है। प्रशासन और मीडिया उसको पर्यावरण प्रदूषण के खलनायक के रूप में पेश कर रहा है। जबकि पूरा दोष वर्तमान कारपोरेटी विकास माडल का ही है।

उसके बच्चे आज भी सरकारी विद्यालय में ही पढ़ते हैं दुर्भाग्यवश घर की माली हालत को लेकर वो भी खुद सरकारी विद्यालय में ही पढ़ाई की है। वो कहते हैं कि मेहनत का भी वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता है। मैंने फिर कहा इस पर आप सरकार से क्या कहना चाहते हैं? आपका अपने सरकार से क्या मांग होगा? तो बहुत निराशाजनक तरीके से कहा कि सरकार हमारी सुनती कब है। हमलोग चाहते हैं कि हमारी मेहनत का वाजिब मूल्य और हमें सम्मान मिले। हमारे फसल का उचित दाम तय हों। किसानों से बात करते हुए चुपचाप मैं उन किसानों का मुंह निहारता रहता हूँ। इतना कहते ही मैं उनकी पीड़ा सुनकर जब यह सवाल लेकर किसानों से बात करता हूँ तो मुझे खुद निराश होकर वापस लौटना पड़ता है।

अब आप खुद सोचिए क्या आज भारत के किसान अपनी किडनी बेचकर फसल का उत्पादन करें? किसान शब्द को लिखकर-बोलकर प्रयोग कर लेना बहुत आसान बात है पर खेती-किसानी कर पाना बहुत मुश्किल। खेती-किसानी की व्यथा को जो व्यवहारिक तौर पर भोगता है, प्रकृति के उतार-चढ़ाव को बेहद तकलीफ से महसूसता है उसका सामना करता है वो दर्द कितना असहनीय होता होगा सोचकर रीढ़ की हड्डी सिहर उठती है।

आजादी के सत्तर साल बाद भी जो किसान वास्तविक अन्नदाता है वो प्रकृति की मार तो सहन करता ही करता है और वही साहूकारों का भी दर्द भी झेलता है साथ ही बाजारवादी व्यवस्था और नेताओं और अधिकारियों की चालबाजियों की ठगी की लूट का भी शिकार हुआ है। यह भी याद रखने की जरूरत है कि पर्यावरण प्रदूषण गाँवों की उपेक्षा का उपउत्पाद है।

किसानों की स्थिति देखकर मुझे सच पूछिए रोना आता है। आज भी किसान फटेहाल जीवन गुजारने को विवश हैं। एक किसान का बेटा यह अब जरूर कह सकता है कि अब खेती-बाड़ी फायदे का व्यवसाय नहीं रही है । किसान कह सकता है उपजाए कोई और लाभ उठाये कोई। वैसे ही नहीं भारत में आज किसान आत्महत्या करने को विवश हुए हैं। मिट्टी को सजाने-संवारने वाला किसान जब रोता है तो प्रकृति रोती है।

यूँ ही कोई मरने पर उतारू नहीं हो जाता है यही कहना काफी है कि आज भी उनकी स्थिति वहुत ही चिंताजनक है। किसान बताते हैं कि हम हर सरकार के लिए केवल वोट बैंक हैं। अधिकतर सरकारों ने खेती-किसानी को आज तक एक घाटे का सौदा समझा है हम उनके लिए बस पाॅलटिक्ल टूल्स से अधिक कुछ भी नहीं हैं। अगर हम किसानों को नहीं बचा सकें तो आने वाली दुनिया बहुत ही शीघ्र पर्यावरण प्रदूषण से ही समाप्त हो जाएगी। हमें अपने आपको बचाने के लिए ही सही गाँवों और किसानों को बचाना ही होगा।

अगर सभ्यता को बचाना चाहते हो तो प्रकृति-मानव केंद्रित विकास माडल पर ही आचरण करना पङेगा। वर्तमान कारपोरेटी माडल को ध्वस्त करना पङेगा। बाजारवादी लोभतंत्र लाभतंत्र से हटकर वोटरशिप कानून बनाकर भूख से विवश महानगरों की तरफ पलायन कर रहे नागरिकों को गाँवों में रहकर प्रकृति पोषण का नया विभाग खोलकर वहीं पर जीवन को जीने का नया आधार प्रदान करना ही होगा।

  • इसके साथ ही अमीरी रेखा बनाकर उससे ऊपर ही विशेष टैक्स लगाकर संसाधन जुटाने ही होंगे।
  • राजसत्ता लोकतांत्रिक हो गई है धनसत्ता को भी लोकतांत्रिक बनाने हेतु उत्तराधिकार कानून भी बनाना ही होगा।
  • औसत संपत्ति से अधिक संपत्ति पर ब्याज की दर से टैक्स कानून भी बनाना ही होगा।

Jaipal Nehra कि फेसबुक वाल से…….

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