Friday , 24 November 2017

Home » साहित्य खास » ढाई आखर मुफ़्त के…

ढाई आखर मुफ़्त के…

September 8, 2016 2:59 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

व्यंग्य

 

इश्क़ भी ढ़ाई आखर का होता है, और मुफ्त भी ढाई आखर का। लेकिन जबसे लोगों ने दिल को ‘प्रियतम का घर’ के बजाए ‘आवास विकास कालोनी’ समझ लिया, तबसे मुफ़्त के नाम पर भीड़ ज्यादा जुटती है और इश्क़ के नसीब में वही हिज्रे अज़ाब। अब अफसानानिगार भी हुस्नपरस्ती के आलम में नहीं, मुफ़्त वाली कतार में ही पाया जाने लगा है।

khat-par-charcha

इधर देवरिया (उत्तर प्रदेश) में श्री राहुल गाँधी की ‘खाट पर चर्चा’ कार्यक्रम में शामिल भीड़ पर मुफ़्त की खटिया लेकर भाग जाने का आरोप लग रहा है। मेरे कुछ बुद्धिजीवी मित्र यूपी वालों को चोर लुटेरा कहने लगे हैं। राजनीतिक टोपियाँ उछाले जाने लगीं हैं। मैं समझ रहा हूँ बिहार की तरह यूपी की जनता को गाली सुनने का समय आ गया है। सच भी है लेकिन क्यों न पहले ‘मुफ़्त की सर्वव्यापकता’ को समझ लिया जाए।

जिस मुफ़्त नामक ‘ढाई आखर’ को आप यूपी का चरित्र समझ रहे हैं वह दरअसल हमारा राष्ट्रीय चेहरा है। याद है, हम बिजली का बिल कब जमा करते हैं? जब तक बिजली विभाग ब्याज दर पर पच्चीस प्रतिशत ‘मुफ़्त’ की घोषणा नहीं कर देता। कभी सोचा है आपने कि जब हम पूरे देश में ‘मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा’ की बात करते हैं तो इसमें मुफ़्त की कीमत क्या है? ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ में तीस बच्चों पर एक अध्यापक चाहिए। एक अध्यापक का वेतन है औसत तीस हजार रुपये। मतलब एक छात्र पर एक हज़ार रुपए लागत। अब बच्चे का मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति, ड्रेस, किताबें, बैग, स्कूल का रखरखाव आदि का खर्च मात्र एक हज़ार रुपए ही रखिए । मतलब आपके पूरे देश में किसी भी सरकारी प्राथमिक विद्यालय में नाक बहाते हुए फटे मटमैले ड्रेस वाले बच्चे पर सरकार दो हजार रुपये महीना खर्च करती है। इतना फीस बहुत मंहगे स्कूल का होता है। अब जब नि:शुल्क शिक्षा लागू है तो यह एक बच्चे की शिक्षा पर खर्च होने वाला दो हजार रुपया कहाँ से मैनेज होगा?

सार्वजनिक वितरण प्रणाली का नाम सुना है न? जहाँ गेहूँ दो रुपये किलो और चावल तीन रुपये किलो तथा मिट्टी का तेल अट्ठारह रुपये लीटर मिलता है। अब देखिए, मुझसे सरकार गेहूँ खरीदती है तेरह रुपये किलो और वही गेहूँ सरकारी क्रय केंद्र के गोदाम से होते हुए मेरे ही गाँव के बीपीएल एपीएल अन्त्योदय परिवारों को मिलता है दो रुपये और तीन रुपये किलो। कब तक चलेगा यह मुफ़्त का खेल? और कब तक देश ढोता रहेगा इस घाटे की अर्थव्यवस्था को? मुफ़्त के नाम पर।

होली दीपावली पर वुडलैंड से लेकर एलेन कापर, बाटा, रुपानी , जापानी सब चालीस प्रतिशत आफ कर देते हैं और खरीदता है पूरा देश। क्या लोग जानते नहीं कि रेट बढ़ा कर छूट दिया जाता है। मिट्टी का तेल, पेट्रोल एलपीजी का वास्तविक रेट जानते ही होंगे आप। अभी राजकोषीय घाटे की प्रतिपूर्ति के लिए पांच रुपये रेट बढ़ जाए तो पूरा देश आंदोलन कर देगा।

दरअसल हम ‘मुफ़्त’ के इतने आदी हो चुके हैं कि अगर मुफ़्त में जहर मिले न, तो भर पेट खाकर मर जाएंगे, लेकिन खाएंगे जरुर। किसी मुर्दे का कफन रास्ते में गिरा मिल जाए तो लोग उसे लेकर भाग जाएंगे, और गर्मी में सिलवा कर पहनेंगे। देश का कोई ऐसा राज्य नहीं जहां मुफ़्त की शराब पीने से सौ पचास लोग मर न गए हों। और हमारे देश के नेताओं ने हमारे इस चरित्र को बखूबी पहचान लिया है। कोई भी राज्य हो चुनाव आते ही ‘ढाई आखर मुफ़्त का’ अपना रंग दिखाने लगता है। कहीं मुफ़्त साड़ी मिलती है तो कहीं आवास। कहीं लैपटॉप तो कहीं मोबाइल। कहीं मुफ़्त बिजली कहीं मुफ़्त पानी।

अभी हफ्ते भर पहले की बात है हमारे कस्बे में एक विधानसभा प्रत्याशी मंच से बोल रहे थे – दोस्तों! हम आज ही वादा करते हैं कि मुफ्त बिजली देंगे।

मैं बाजार से लौट रहा था, सुना तो चौंक गया। सोचने लगा कि यार इतनी मँहगाई में पूरे विधानसभा क्षेत्र के बिजली का बिल यह अपने घर से देंगे! कमाल के नेता हैं भाई। और उनके मंच से उतरते ही उनसे पूछा कि – कहाँ से बिजली मुफ़्त देंगे सर ?

उन्होंने कहा कि – राजकीय कोष से।

मैंने पूछा कि – तहरी बाबू जी के हऽ राजकीय कोष?

गाड़ी का गेट बंद हो गया। नेता जी चले गए। मेरा सवाल आज भी अनुत्तरित ही है।

मेरे ऊपर वाले दोनों सवाल रख लीजिए। और मारिए, हर उस पार्टी के नेता के मुँह पर जिसने मुफ़्त के नाम पर लोकतंत्र को रखैल बना रखा है। जो रोजगार, नियोजन, स्वास्थ्य, जनसंख्या, कुटीर उद्योग, शिक्षा, बलात्कार, जीवन मूल्यों पर चुप हैं लेकिन मुफ़्त की घोषणाओं में उनकी आवाज़ सप्तम सुर वाली हो जाती है। अभी उत्तर प्रदेश में माननीय मुख्यमंत्री जी ने मुफ्त लैपटॉप के बाद मुफ्त मोबाइल फोन देने की घोषणा की है। मध्य प्रदेश में तो मिलने भी लगा।

देखिए इस कलयुग में अगर आप राजनीति को ‘सेवा’ मानते हैं तो जितनी जल्दी हो सके इस दिवास्वप्न से बाहर आइए। राजनीति भी ठीक वैसे ही व्यवसाय है जैसे अध्यापक बच्चों को पढ़ाने की फीस लेता है । जैसे कोई डाक्टर रोगी से फीस लेता है। और ठीक वैसे ही नेता हमसे ‘मुफ़्त’ की भरपूर कीमत लेते हैं। क्योंकि राजकीय कोष किसी नेता के बाप का नहीं होता वह पूरे राज्य की जनता का खून पसीना होता है।

ऐसा नहीं कि मैं समझ नहीं रहा कि भारत में हजारों परिवार ऐसे हैं जिन्हें मुफ़्त अनाज दिया जाना चाहिए। लेकिन क्या यही एक तरीका है? और कब तक? क्या उसे कोई छोटा मोटा रोजगार नहीं दिया जा सकता जिससे वह अपने परिवार का पेट भर सके। मेरे गाँव में बीस साल से एक गरीब परिवार को बीपीएल कार्ड मिला है। अब उसके चार बच्चे हुए, चारों की शादियाँ हुईं, वो अलग परिवार बन गए और उनके नाम से भी बीपीएल कार्ड जारी हो गया। यही है पूरे देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली। और मैं कह रहा हूँ कि उसे अनाज के साथ रोजगार दे देना था, ताकि उसके चारों बच्चे तो बीपीएल सूची में नहीं आते। अब भी कह रहा हूँ कि उन चारों को रोजगार दो, ताकि उनके जो सोलह बच्चे होंगे वो बीपीएल सूची में न आ सकें। लेकिन रोजगार की घोषणा करना मुश्किल है और मुफ्त की आसान,  गुणवत्ता युक्त शिक्षा देना कठिन है क्योंकि युवा जैसे ही शिक्षित हुआ वह आपकी पार्टी का झंडा फेंक देंगा। और भीड़ तो लोकतंत्र की शान है।

मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि ‘मुफ़्त एवं अनिवार्य शिक्षा’ में से ‘मुफ्त’ हटाइए। और बच्चे के बाप को इस काबिल बनाइए कि वह एक हजार रुपए शिक्षण शुल्क दे सके। पता है न! दो रुपये की हरी मिर्च खरीदते हैं तो कैसे कहते हैं सब्जी वाले को, कि अबे साले दो चार और दो… बस???? दो रुपये की मिर्च इतनी ही??

जब बच्चे का बाप सौ रुपए फीस देगा न, तो पढ़ाई का हिसाब भी लेगा। जब बीस रुपए की एक कॉपी खरीदेगा न, तो एक बार जरूर देखेगा कि बच्चे ने लिखा क्या है? तब कोई अध्यापक क्लास में सोएगा नहीं। दिन नहीं काटेगा और अयोग्य अध्यापकों का चयन भी नहीं होगा। जब मुफ्त का चंदन है तो नंदन जी घिस रहे हैं बस। इसलिए मुफ्त की राजनीतिक चाल से जितना जल्दी हो सके बचना होगा। बस यूपी बिहार को ही नहीं, पूरे देश को।

“खाट पर चर्चा” विषय पर नहीं लिखूंगा यह मेरा विषय नहीं। हाँ, एक बात दिमाग में आई थी सोचा बता दूँ। अगर ‘खाट पर बैठकर चर्चा’ से कुछ होना होता, तो हमारे गाँव के सिवबचन चचा गूगल के संस्थापक होते, अकलू काका आज संयुक्त राष्ट्र संघ के अध्यक्ष होते और पदारथ चचा भारत के प्रधानमंत्री….

– असित कुमार मिश्र, बलिया ( उत्तर प्रदेश )

ढाई आखर मुफ़्त के… Reviewed by on . व्यंग्य   इश्क़ भी ढ़ाई आखर का होता है, और मुफ्त भी ढाई आखर का। लेकिन जबसे लोगों ने दिल को 'प्रियतम का घर' के बजाए 'आवास विकास कालोनी' समझ लिया, तबसे मुफ़् व्यंग्य   इश्क़ भी ढ़ाई आखर का होता है, और मुफ्त भी ढाई आखर का। लेकिन जबसे लोगों ने दिल को 'प्रियतम का घर' के बजाए 'आवास विकास कालोनी' समझ लिया, तबसे मुफ़् Rating: 0

Leave a Comment

scroll to top