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जीरी मैं नुकस्यान मरग्या किसान

October 24, 2016 9:57 am by: Category: खबर खास, खेती खास Leave a comment A+ / A-

kisano ko nuksan

हरियाणा में किसानों की दुर्दशा आने वाले समय में भाजपा की सरकार के लिये मुश्किलें खड़ी कर सकती है। ग्रामीण इलाकों में तो वैसे ही बीजेपी पर किसान विरोधी होने के आरोप लगने शुरु हो गये हैं। हालांकि इस बार कहा जा रहा है कि प्रदेश में धान की बंपर पैदावार हुई है। लेकिन कई गांव में तो किसान सर पर हाथ रखे बैठे हैं उन्हें चिंता सताए जा रही है कि धान की फसल पर जो खर्च हुआ है सारा साल जो मेहनत की है उसकी भरपाई कैसे होगी।

hopper-in-peddyबिमारी से हुई पैदावार प्रभावित

सूखे की चपेट में आने से अचानक धान से परिपूर्ण अच्छी खासी दिखने वाली फसल रातों रात सूख गई। हांसी के समीप सोरखी में कई किसानों के खेत में धान की फसल होपर नामक बिमारी के कारण भूसा भर रह गई है। नारनौंद खंड के गांव राजथल में लगभग सभी किसानों को धान की पैदावार में तीस फीसदी नुक्सान हुआ है। कुछ किसानों की पैदावार तो बिमारी की वजह से पचास फीसदी तक कम होने के आसार बताये जा रहे हैं। यही हाल इलाके के अन्य गांवों में भी है। कुछ किसानों की फसल में तो नुक्सान इतना है कि उनके लिये खड़ी फसल संकट बन गई है उन्हें उसकी कटाई पर अतिरिक्त खर्चा करेना पड़ेगा खड़ी फसल की बहाई करवाने में भी दिक्कत आती है। आग लगाना कानूनन जुर्म और जमीन की सेहत के लिये हानिकारक है। किसान सोच में पड़े हैं करें तो क्या करें।

धान का भाव भी नहीं है उचित

जैसे तैसे किसान जितनी फसल बची है उसी से उम्मीद लगाये बैठे हैं। लेकिन अब उन्हें मंडियों में भी कुछ लाभ मिलने के आसार नहीं नजर आ रहे। जिस धान के दाम दो साल पहले तक साढ़े तीन से लेकर साढे चार हजार रुपये प्रति क्विंटल तक होते थे वही धान अब हजार ग्यारहासौ से लेकर डेढ दो हजार तक पिट रहा है। कहीं पर धान में नमी बताकर उसे मानकों पर खरा न उतरने की कहकर उसे और सस्ते दामों पर खरीदा जा रहा है। तो कहीं कई-कई दिनों तक कोई खरीददार नहीं मिलता जिसके बाद किसानों को दूसरी मंडियों तक धान ले जाने के लिये मजदूरों से लेकर मंडी के किराये तक अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ता है।

 मनेगी काली दिवाली

इनेलो पार्टी तो दिवाली को काली मनाने की पहले ही घोषणा कर चुकी है लेकिन कुछ किसानों को लिये यह दिवाली फसल के दाम न मिलने से काली होने वाली है। त्यौहारों का मौसम है और इस मौसम में प्रत्येक परिवार अनेक सपने सजाता है। घर सजाने, जरुरती सामान खरीदने से लेकर बच्चों के लिये वस्त्रादि मूलभूत आवश्यकताओं की खरीददारी के लिये भी किसान इस फसल से उम्मीद लगाये होता है। अपने बच्चों के विवाह को लेकर भी उसकी योजनाएं फसल के उत्पादन व मंडी में मिलने वाले उसके भाव पर टिकी होती हैं। एक फसल के साथ किसान के अनेक सपने टूट जाते हैं। कर्जे न चुकाने के चलते उनका व्यवहार खराब हो जाता है और आगे से आढ़ती की दुकान उनके लिये बंद हो जाती है। हर रास्ता बंद होकर कुछ को अपनी जीवन लीला समाप्त करना ही अंतिम हल नजर आता है। लेकिन प्रशासन की बेरुखी पर ध्यान बहुत कम जाता है। इस ओर भी ध्यान नहीं जाता है कि खेत से निकली उसकी धान से बने चावल जब ब्रांडिट थैलियों में बंद हो जाते हैं तो उनके दाम आसमान छूते हैं। 50 रुपये प्रति किलो से लेकर 200-250 या इससे ज्यादा दाम के चावल भी होते हैं। जो कि किसान को मिलने वाले मूल्य से कई गुना होता है।

किसानों की दुर्दशा को लेकर जींद के अलेवा में 1923 में पैदा हुए हरियाणवी कवि ज्ञानी राम की ये पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैं।

कात्तक बदी अमावस आई, दिन था खास दिवाळी का 
आंख्यां के म्हां आंसू आग्ये, घर देख्या जब हाळी का 

जीरी मैं नुकस्यान मरग्या किसान Reviewed by on . [caption id="attachment_1234" align="aligncenter" width="650"] kisano ko nuksan[/caption] हरियाणा में किसानों की दुर्दशा आने वाले समय में भाजपा की सरकार के लिये [caption id="attachment_1234" align="aligncenter" width="650"] kisano ko nuksan[/caption] हरियाणा में किसानों की दुर्दशा आने वाले समय में भाजपा की सरकार के लिये Rating: 0

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