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लोक कवि कृष्ण चंद – 22 जुलाई को सिसाना में हुआ जन्म

फौजी मेहर सिंह के रहे शागिर्द

July 22, 2016 4:28 pm by: Category: शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-
krishn-chand

फोटो कविता कोश से साभार

कृष्ण चंद्र इनका जन्म 22 जुलाई 1922 को लोक कवियों की धरती सोनीपत जिले के सिसाना गांव में हुआ। बाजे भगत और पंडित मांगेराम जैसे लोक कवि भी इसी गांव में जन्में हैं। कविताई के मामले में कृष्ण चंद भी बेजोड़ हैं। ये सपनों के कवि के नाम से मशहूर कवि फौजी मेहर सिंह के शिष्य रहे हैं। फौजी मेहर सिंह के लेखन का असर इन पर भी पड़ा है इनकी कई रागनियां पढ़कर लगता है जैसे ये मेहर सिंह की लिखी हुई हैं। उदाहरण देखिये इस रागनी को पढ़ते हुए जहन में पढ़ने के साथ-साथ राजकिशन अगवानपुरिया की आवाज़ भी आपके कानों में अवश्य गूंजेगी

पढ़ो सुपने का जिक्र……

 

के सपने का जिकर बात एक याद जरुरी आगी
पुलिस लाईन मैं पड़े पड़े कै याद अंगूरी आगी

सुपने मैं सुसराड़ डिगरग्या मन मैं आन्नद छाया
ताता पानी करवा कै मैं बैठ पाटड़ै न्हाया
फेर छोटा साळा न्यूं बोल्या आ जीजा रोटी खाया
मेरी सासु नै बना रसोई मैं जड़ मैं बैठ जिमाया
जणु थाळी कै म्हां मेरे खाण नै हल्वा पूरी आग़ी

फेर जीजा तैं बतळावण खातिर कठ्ठी होगी साळी
कोए गोरी कोई श्याम वर्ण कोई भूरी कोई काळी
मीठी मीठी बात करैं थी करकै अदा निराळी
घूर घूर कै देखैं थी वे कर कर नजर कुढ़ाली
रुकमण चन्द्रो और शांति झट कस्तूरी आगी

एक जणी नै दई नमस्ते दूजी नै प्रणाम
मटक मटक इतरावैं थी वें करकै जिगर मुलाम
मन का भेद बतादे जीजा खेल कै तमाम
फेर हातह जोड़ कै न्यों बोली कोए म्हारे लायक काम
हो बोल पड़ै नै घरसी के के इसी गरुरी आगी

सुपने कै म्हां तरह तरह के देगे ठाठ दिखाई
साळे साळी कठ्ठे होरे ठोले की लोग लुगाई
आंख खुली जब बैठा होग्या कुछ नाद इया दिखाई
चौगरदें नै लड़धू सोवैं वाहे लाईन पाई
“कृष्ण चन्द” नै सेवा करकै शर्म हजूरी आगी

 

कृष्ण चंद की लेखनी सिर्फ सपनों पर ही नहीं बल्कि किसान और मजदूर के शोषण पर भी चलती है। मजदूर किसान के साथ हो रहे अन्याय को वे सिर्फ दर्ज नहीं करते बल्कि उसकी वजह भी बतातें है जानिये आप भी आखिर

 

क्या वजह है मजदूर और किसान के शोषण की

 

वजह बता दयूं आज म्हारा क्यूं हिंदुस्तान दुखी सै
मिलता ना इंसाफ आड़ै मजदूर किसान दुखी सै

हड्डी पसली पीस दई यें कूट कूट कै खागे
ना छोड्य़ा मांस कसाईयां नै यें चूट चूट कै खागे
बढ़रे पेट ढोल के से यें ऊठ ऊठ कै खागे
म्हारी कमाई लहू पसे की यें लूट लूट कै खागे
ना पेट में रोटी ना तन पै कपड़ा एक टूटी छान दुखी सै

यें कल्बां मैं ऐश करैं सैं डालमियां और टाटा
पडया भुखा मील कर्मचारी ना दो रोटी का आटा
सब क्यांहे पै काबिज होगे यें इरला बिरला बाटा
जब देणी आवै मजदूरी तै यें तुरत दिखादें घाटा
काम करणिया इस भारत मैं बहुत महान दुखी सै

कोए ऐडी रगड़ रगड़ कै मर्ग्या बाह्र पड़या पाळे मैं
कोए पत्थरां कै नीचै दबग्या कोए डूब गया नाळे मैं
आंख फूटगी अन्धा होग्या कोए धूम्मे काळे मैं
फिर भी रोटी ना थ्याई कुछ कसर नहीं चाळे मैं
कमा कमा घर भर दिया फिर भी बेअनुमान दुखी सै

दई बिठा रुखाळी बिल्ली जड़ मैं यो दूध उघाड़ा धरकै
जब बाड़ खेत नै खाण लगै तै के जहाज चलैंगे भरकै
पाप के बेड-ए भवसागर से पार लगै ना तिरकै
ना सुख पाया दुनियां म्हं कोए बुरा गरीब का करकै
“कृष्ण चंद” कहै इस दुनिया म्हं न्यों नादान दुखी सै

 

इस शोषण की वजहों को ढूंढते हुए जब कृष्ण चंद इन्हें दूर करने के लिये समाधान का प्रयास करते हैं तो उन्हें दीन दुखियों के सच्चे रहबर दीनबंधु सर चौधरी छोटूराम की याद आती है… उन्हें याद कर वे तड़प उठते हैं कि वे उन्हें कहां से लायें

 

छोटू राम कड़े तै ल्याऊं

 

जिले रोहतक मैं बसरया सै वो गढ़ी गाम कड़े तैं ल्याऊं
सच्चा रहबर इस जनता का छोटूराम कड़े तैं ल्याऊं

थे मेळ मुल्हाजे आपस मैं इसा महर मळोटा दिखै था
मिलकै काम करया करते सब भरम भरोटा दिखै था
जो दीदे काढ़ै ठाडा बणकै ना माणस खोटा दिखै था
वो सबका सेवक और सबका प्यारा सबतैं छोटा दिखै था
मेरी आत्मा सीळी हो इसा प्यारा नाम कड़े तैं ल्याऊं

ये कला बाज हठधर्मी सैं मेळ मिलारे जनता पै
झूठ कपट छळ बैइमानी की बेल फलारे जनता पै
एक सीट के लालच खातर सेल चलारे जनता पै
लूट लूट धन कठ्ठा कर लिया खेल खिलारे जनता पै
करै खात्मा गुंड्यां का इसा छत्री जाम कड़े तैं ल्याऊं

कदे वो उसकी कदे वो उसकी यो दुत्तां केसा रोळा सै
कठ्ठे होरे यें लाख कुमसल यो पुत्तां केसा टोळा सै
कोए जात जमात नहीं इनके यो ऊत्तां केसा टोळा सै
लेकै माल घरां म्हं बड़गे यो भुत्तां केसा टोळा सै
न्यूं मुंधा पड़ पड़ रोऊं सूं भला उसके काम कड़े तैं ल्याऊं

मूरण माणस इस दुनिया म्हं बोई जामी के जाणै
ऊंच नीच की बातां नै भई नमक हरामी के जाणै
इज्जत और बैइज्जती नै यो कृपण कामी के जाणै
स्याल बड़े रहैं बिल म्हं पर यो शेर गुलामी के जाणै
कहै कृष्ण चन्द सुसाणे केसा रमणीक धाम कड़े तैं ल्याऊं

 

हरियाणा खास हरियाणा की माटी में जन्म इस लाल को सलाम करता है।

लोक कवि कृष्ण चंद – 22 जुलाई को सिसाना में हुआ जन्म Reviewed by on . [caption id="attachment_362" align="aligncenter" width="630"] फोटो कविता कोश से साभार[/caption] कृष्ण चंद्र इनका जन्म 22 जुलाई 1922 को लोक कवियों की धरती सोनीपत [caption id="attachment_362" align="aligncenter" width="630"] फोटो कविता कोश से साभार[/caption] कृष्ण चंद्र इनका जन्म 22 जुलाई 1922 को लोक कवियों की धरती सोनीपत Rating: 0

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