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लोक कवि मान सिहं खनौरी वाले

आजादी को अपनी आंखो से देखने और लिखने वाला कवि

July 21, 2016 12:39 am by: Category: शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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कहते हैं असली लोकजीवन की झलक लोककविताओं में मिलती है लेकिन हरियाणा की लोक कविता पर गाहे बगाहे इसके आरोप भी लगे हैं कि उसने पौराणिक आख्यानों के जरिये ही लोक को परिभाषित और मार्गदर्शित किया है। आलोचक पौराणिक कथा ज्ञान पर आधारित रचनाओं को महिला और गरीब तबकों के शोषण के एक पौषक औजार के तौर पर भी देखते हैं लेकिन वहीं कुछ ऐसी प्रतिभाएं अब भी मौजूद हैं जिन्होंने सामाजिक यथार्थ को अपनी रचनाओं में उकेरा है ये अलग बात है ऐसी प्रतिभाएं येन-केन-प्रकारेण सामने नहीं आयी हैं। हाल ही में समाजसेवी सुनीता धारीवाल जी ने अपने 91 वर्षीय ससुर मानसिंह धारीवाल की एक रचना फेसबुक पर सांझा की थी जो समाज के वर्तमान हालातों को ऊजागर करती है। मानसिंह जी की इस रचना को हरियाणा खास ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित किया। उस समय सुनीता जी की व्यस्तता के चलते हम श्री मानसिंह जी का परिचय नहीं दे पाये थे। हाल ही में सुनीता धारीवाल जी जो कि कानाबाती नाम से अपना ब्लॉग भी लिखती हैं मानसिंह जी के नाम से ब्लॉग की शुरुआत भी की है। अपने पाठकों के लिये हम यहां श्री मानसिंह जी पर बने इस नवनिर्मित ब्लॉग से दो रचनाएं दे रहे हैं साथ ही श्री मानसिंह जी का परिचय भी।

 

लोक कवि मानसिंह – संक्षिप्त परिचय

लोक कवि मान सिंह, लोक कवि इसलिये क्योंकि इनकी कविता में लोक जीवन दिखाई देता है, ये राजा रानी की नहीं बल्कि वर्तमान दौर की कहानी कहते हैं। लोकभाषा में लिखने के कारण भी इन्हें लोककवि कहा जा सकता है। लोक कवि मानसिंह धारीवाल 1 दिसबंर 1925 को गांव करौदा में श्री मेहर सिंह के घर पैदा हुए। करौदा वैसे तो पंजाब के संगरुर जिले में पड़ता है लेकिन हरियाणा और पंजाब की सरहद के बीच आये 25 हरियाणवी भाषी गांव में करौदा भी एक है।

 

स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी हैं मानसिंह

भारत छोड़ो आंदोलन के समय इनकी उम्र सत्रह साल की थी सिपाहियों की चिट्ठियों को चुपके चुपके गंतव्यों तक भी इन्होंनें पंहुचाया। इसी उम्र में इन्होंनें लिखना भी शुरु कर दिया था। सन् सैंतालिस के आंदोलन को इन्होंने अपनी आंखों देखा, उस दौर की अपनी एक कविता में ये कुछ इस तरह लिखते हैं

 

पैंतीस छतीस सैंतीस आठतीस जिक्र सुनो उनताली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

सन उनीस सौ चाली मेंह -अनपढ़ लोग हुआ करते

बिना दवाई कट जाते कुछ ऐसे रोग हुआ करते

मृत्यु के भी एक साल तक घर में शोग हुआ करते

न रिश्तेदारी टूटे थी इसे पक्के संजोग हुआ करते

सौ सौ पसु चरा कै भी मन खुसी रहवे था पाली का

बैलो से खेती करते भगवान रूप था हाली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

ब्याह सादी में एक दुसरे की खूब इमदाद करया करते

सगे सम्बन्धी मित्र प्यारे सब को याद करया करते

एक दुसरे का कर कै -अपणा उसके बाद करया करते

अल्लाह इश्वर खुदा वाहेगुरु सबसे फ़रियाद करया करते

मिल कै जश्न मनाया करते होली ईद दिवाली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

उपजाऊ धरती थोड़ी थी पैदा हों थे कम दाणे

मंडी मैं कणक बिक्या करती मण एक रूपया छ आने

कीकर जांडी झाड फूस पसुआं नै पड़ते खाने

नहीं टी वी फोन रेडियो थे सब साँगी तै सुनते गाणे

आठ कोस तै घोड़ा आता सब्जी ले कै माली का

होटल मैं भी दो आने कुल मोल पड़े था थाली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

गोरयां की सरकार के सख्त रूल सरकारी थे

बोलण लिखने पर पाबंदी -जुर्माने बड़े भारी थे

गैर गुलामी की कड़ियाँ मैं बंधे हुए नर नारी थे

आम लोग से मुलजिम बरगे -जज बरगे पटवारी थे

अंग्रेज रास्ता बंद राखें थे विद्या की प्रणाली का

फायदा चोर उठाते है सदा रात अँधेरी काली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

मजदूर चव्वनी दिहाड़ी खातर दर दर करया करै था खोज

राज मिस्त्री के आठ आने -देसी घी और मीठा रोज

किसान वयापारी छोटे छोटे सर पै ढोया करते बोझ

रंगरूट रूपये बारां मैं -खतरे में थी हिन्द की फ़ौज

अंग्रेजा के पिट्ठू थे जो करते काम दलाली का

अब तो पहरा हम ने है देना भारत की हरियाली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

मिल के सिरे चढ़ाया करते किसी भी काम अधूरे को

पक्का मीठा कह्या करै थे घर मैं चीनी बूरे को

किणकी कह कै खाया करते कटे चौल के चूरे को

पाट्या कपडा मिल्या करे था माछर दानी जाली की

बिना सूट न मन खिले था ब्याह मैं जीजा साली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

देस आजाद करवावण खातर बोहत लोग बर्बाद हुए

काले पाणी भेज दिए कोई फांसी तोड़े कैद हुए

किसी के बच्चे मार दिए माँ बाप बिना औलाद हुए

उजड़ गए घर बार किसी के बड़ी मुसकल आजाद हुए

भ्रस्ताचारियां नै रंग बदल दिया नीति गांधी वाली का

पैसे खातर पड़े जेल मैं गम न गुस्सा गाली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

कांसी पीतल सोना सिक्का घर घर मैं था चांदी का

हम सब नै डर लाग्या करता गैर हुकूमत आंधी का

सन उनीस सौ ब्याली मैं उपदेस सुन्या जब गांधी का

मान सिंह हमने मुहँ देख्या अंग्रेज हुकूमत जांदी का

जाते जाते खेल गए थे खूनी खेल संताली का

कश्मीर समस्या मैं घी दे गये आग सुलगने वाली का

आँखे देखया हाल बताऊँ उनीस सौ चाली का

 

श्री मान सिंह धारीवाल ने पंजाब के प्रजामंडल संगठन से जुड़कर आर्यसमाज की विचारधारा का प्रचार-प्रसार किया। सत्री शिक्षा को बढावा देने के लिये गांव-गांव जाकर लोगों को जागरुक किया। साथ ही साथ इनका कविता क्रम भी चलता रहा। आजादी मिलने के दस साल बाद 1957 में इनका पहला कविता संग्रह ‘सुधार की तोप’ प्रकाशित हुआ उसके बाद 1958 में ‘करणी का फल’ विश्वकर्मा महिमा भजन संग्रह और किस्सा हरफूल जाट जुलानी का प्रकाशित हुए। साल 2014 में इनका कविता संग्रह इक्कसवीं सदी का संदेश प्रकाशित हुआ। राजनैतिक तौर पर ये कांग्रेस से जुड़े रहे और तीन दशक तक मूनक ब्लॉक के अध्यक्ष भी रहे यहां तक कि खनौरी को मंडी में तब्दील करने में भी इनकी सक्रियता रही इसी के चलते इन्हें मंडी का पहला कमिटी प्रधान भी बनाया गया। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के साथ भी इन्होंने काम किया। भले राजनैतिक जीवन में इनकी सक्रियता रही हो लेकिन अपने अंदर के लोककवि को हमेशा इन्होंने जीवित रखा और समाज में घट रही घटनाओं पर ये अपनी कलम चलाते रहे हैं। काले धन और भ्रष्टाचार पर उनकी यह रचना देखते ही बनती है

 

काले धन को कलयुग मे धनी -नाग समझ ले काला

जिसके मारे डंक जहर का, मुस्किल होए संभाला

 

काला धन  है काल बराबर रिश्वत एक बीमारी

चोरी का धन आग बराबर सिलगे जै चिंगारी

माल महकमा महल बनावै नीवं धरे पटवारी

जे हो ज्या बुनियाद गलत बेकार है बिल्डिंग सारी

उस घर मैं बैठण आले का न हटे गात से पाला

जिसके मारे डंक जहर का, मुस्किल होए संभाला

 

किसी को अपणा हक़ मिले ,न कोई दुसरे का खा ज्या

बहुत बुरी दुर्घटना हो पाप गरीब डाह ज्या

झगडा और लड़ाई मैं धन पाणी ज्यूँ बह ज्या

लुट ज्या धन बीमारी मैं कदे आंतकवादी आ ज्या

चोर लूट कै ले जाते धन  कभी तोड़  ताड़ के ताला

जिसके मारे डंक जहर का, मुस्किल होए संभाला

 

 

धन कमाना पाप नहीं जे सीधी नीयत कमावै

नेक कमाई करै व्यापारी जो पहले घर तै लावे

हो जाता किसान धनी जो जुट के खेत कमावै

दाना एक कनक का बल्ली बीस गुणा फल ल्यावै

छप्पर पाड़ के देता है फिर दाता देने वाला

जिसके मारे डंक जहर का, मुस्किल होए संभाला

 

खाली हाथ चला जाता कोई गलत खजाने भर कै

जिंदगी भर न चैन मिले गुज़र जाये डर डर कै

आपने सर पै बहार धरे गलत कमाई कर कै

धन माया का मालिक न कदे वापिस आया मर कै

मान सिंह सोना चांदी से भी कीमती काठ की माला

जिसके मारे डंक जहर का, मुस्किल होए संभाला

 

(चित्र और सामग्री – सुनीता धारीवाल प्रस्तुति जगदीप सिंह)

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