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पाकिस्तान की मशाल को सलाम

April 18, 2017 11:12 pm by: Category: इतिहास खास, खबर खास, शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

पाकिस्तान में “वली खान यूनिवर्सिटी” के छात्र नेता व पत्रकारिता विषय के छात्र कामरेड मशाल खान की उसी यूनिवर्सिटी के धार्मिक आंतकवादी छात्रों द्वारा की गयी निर्मम हत्या पाकिस्तान, भारत, बंग्लादेश या विश्व के किसी भी हिस्से में की गयी कोई पहली हत्या नही है। इससे पहले भी पाकिस्तान में अनगिनित प्रगतिशील, वामपंथी, अल्पसंख्यको, पत्रकारो, जजो की हत्याएं धर्म का सहारा लेकर शासको ने करवाई है। धर्म का सहारा लेकर हत्याएं पाकिस्तान में ही नही पुरे विश्व में शासक वर्ग करवाता रहता है। पाकिस्तान में इससे पहले वर्ष 2011 के जनवरी महीने में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर को उनके ही सुरक्षागार्ड ने सिर्फ इसलिए मार दिया क्योंकि सलमान तासीर ने ईशनिंदा कानून की आलोचना की थी। 2011 में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज़ भट्टी की भी इस्लामाबाद में हत्या कर दी गई थी. मलाला को तो धार्मिक आंतकवादियो ने गोली ही, सिर्फ इसलिए मार दी थी क्योंकि मलाला लड़कियों की शिक्षा की पैरवी कर रही थी।

भारत में रामराज्य में महान शिक्षक शम्भूक की राम द्वारा हत्या, लाखो बुद्धिस्टो की हत्याएं या वर्तमान में डॉ डाबोलकर, प्रो. कलबुर्गी, कामरेड पनसारे, रोहित वेमुला, अख़लाक़, पहलू खान की हत्याएं भी धार्मिक आंतकवादियो ने शासक वर्ग के इशारे पर की है। जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली के छात्र नजीब को पिछले कई महीनों से धार्मिक आंतकवादियो ने गायब किया हुआ है।
फ़रवरी 2013 से अब तक बांग्लादेश में इससे मिलते-जुलते हमले में 40 से अधिक लोगों की हत्या कर दी गई है जिनके पीछे इस्लामिक चरमपंथियों का हाथ रहा है.
मरने वालों में उदारवादी ब्लॉगर, समलैंगिक अधिकार कार्यकर्ता और धार्मिक अल्पसंख़्यक शामिल हैं.

क्या ये हत्याएं सिर्फ इसलिए की जा रही है कि हत्यारों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं।
क्या आप धार्मिक भावना आहत होने का बहाना बना कर किसी को भी मार दोगे।
क्या आपका हजारो साल पुराना धर्म इतना कमजोर है कि कुछ तार्किक सवालों से डर जाता है।
क्यों डरते हो तुम और तुम्हारा धर्म विज्ञान से और क्यों सामना नही कर सकते हो तुम विज्ञान का।
धर्म कहता है कि “कर्म कर फल की चिंता मत कर”
लेकिन विज्ञान कहता है कि “पहले फल की चिंता कर उसके बाद कर्म कर”

धर्म और विज्ञान जो अलग-अलग ध्रुव् है जो कभी एक साथ नही आ सकते।

धर्म मेहनतकश की मुक्ति के रास्ते को बंद करता है। धर्म इन्सान के दिमाक को कुंद करता है। धर्म शासक द्वारा की जा रही लूट को जायज ठहराता है। धर्म मेहनतकश को कहता है कि अपनी मेहनत का मूल्य मत मांग जो तुमको मूल्य मिला है उससे सन्तुष्ठ हो जाओ। जो तुम्हारी किश्मत में था वो तुमको मिल गया।
लेकिन वही, विज्ञान मानव जाति की मुक्ति का रास्ता खोलता है। विज्ञान कहता है कि जो तुमने मेहनत की है उसका जितना मूल्य बनता है उसको क्यों छोड़ रहे हो। विज्ञान कहता है कि प्रकृति ने जो भी बनाया है उस पर सबका समान अधिकार है। धार्मिक और लुटेरी सत्ता का सबसे बड़ा दुश्मन विज्ञान है। इसलिए धार्मिक ताकते विज्ञान का सबसे ज्यादा विरोध करती है। विज्ञान की पैरवी करने वाले को धर्म का दुश्मन घोषित करती है। कोई भी धर्म हो वो सत्ता की रक्षा करता है। लुटेरी सत्ता को बनाये रखने के लिए सबसे कारगर हथियार धर्म ही है। इसलिए सत्ता धर्म को बनाये रखना चाहती है। जब भी कोई धर्म पर तार्किक सवाल उठाता है सत्ता धार्मिक उन्मादियों को इशारा करती है कि इस अधर्मी को खत्म कर दिया जाये।
गीता का उपदेश देते हुए श्री कृष्ण अर्जुन को कहते है कि-

यदा यदा ही धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत |
अभ्युत्थानम् धर्मस्य, तदात्मनं सृजाम्यहम् || गीता 4/7

अर्थ : हे अर्जुन ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं प्रकट होता हूँ ।। 7 ।।
इसका मतलब क्या है कि जब-जब कोई भी धर्म के कुतर्को पर तार्किक सवाल उठाएगा, हजारो साल पहले बने धार्मिक नियमो को आज के सन्दर्भ में लागू करने की बजाए चेतावनी देगा की आपके ये नियम उस बर्बर समाज के समय बने हुए है जो असमानता पर आधारित है। उस समय के समाज में और आज के समाज में दिन रात का अंतर आ चुका है। विज्ञान ने भी बहुत उन्नति की है। इसलिए आपके ये धर्म के नियम आज लागु नही होते इनको बदला जाना चाहिए।
ऐसे तार्किक सवाल करने वालो के खात्मे के लिए व् धर्म के कुतर्को को बचाने के लिए मै पैदा होऊँगा।

लेकिन श्री कृष्ण तो पैदा नही हुए शासक वर्ग ने एक भीड़ जरूर पैदा कर दी जो किसी को भी धर्म के नाम पर मार देती है।

धर्म शुरू से ही शासक वर्ग का हथियार रहा है। इस लुटेरे वर्ग ने मेहनतकश को गुलाम बनाये रखने के लिए और मेहनतकश की मेहनत के मूल्य को लूटने के लिए धर्म का सहारा लिया है और आज भी ले रहा है। लुटेरे वर्ग ने धर्म के ऐसे कानून बनाये जिससे मेहनतकश आवाम वज्ञानिक शिक्षा से वंचित रहे। क्योकि अगर मेहनतकश शिक्षित हो जायेगा तो वो इस लूट के खिलाफ आवाज उठाएगा। असमानता पर आधारित बने हुए धार्मिक कानूनों के खिलाफ आवाज उठाएगा। प्रकृति के सभी संसाधनों पर बराबर हक मांगेगा। इसलिए शासक वर्ग ने शाम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाकर मेहनतकश को शिक्षा से वंचित रखा और आज भी रखने के पूरे प्रयास कर रहा है।
इन सभी हत्याओं के पीछे धार्मिक शासकों के साथ साम्राज्यवादी देश के शासक वर्ग भी है। जो खुद के देश में तो धार्मिक स्वंतत्रता की बात करते है लेकिन पिछड़े देशो के संसाधनों पर कब्जे के लिए इन देशों में धार्मिक सत्ताएँ हथियारों के दम पर स्थापित करवाते हैं। इन पिछड़े देशो में जब भी मेहनतकश आवाम के नेतृत्व में प्रगतिशील सता ने कब्जा किया उसको उखाड़ फेंकने में साम्राज्यवादी देश अमेरिका और उसके गठजोड़ ने इन देशों के धार्मिक आंतकवादियो को तन-मन-धन से मद्दत की है। अफगानिस्तान हो या लीबिया हो उसके प्रगतिशील शासको को साम्राज्यवाद ने मरवाया और वहाँ धर्म की सत्ताएँ स्थापित करवा दी ताकि ये सत्ताएँ मेहनतकश को और प्राकृतिक संसाधनों को लुटती रहे और साम्राज्यवादी देशो को भी लूटने दे।

कामरेड मशाल खान की हत्या उस भीड़ ने नहीं उसकी हत्या तो उस युद्ध का परिणाम है जो हजारो सालों से धर्म और विज्ञान के बीच, मेहनतकश और लुटेरे के दरमियान चला आ रहा है। कामरेड मशाल तुम मेहनतकश की तरफ से लड़ते हुए शहीद हुए हो। तुम्हारी सहादत मेहनतकश आवाम की आजादी की लड़ाई में बहुत बड़ा योगदान होगी। जिसको कभी भी भुलाया नही जा सकता है। विश्व का क्रांतिकारी आवाम आपकी इस क्रांतिकारी मशाल को कभी बुझने नही देगा।

“ऐ मशाल खान तूँ जिन्दा है हर एक लहू के कतरे में
हर एक लहू के कतरे में, हर इन्कलाब के नारे में”

कामरेड मशाल खान भारत ही नही पुरे विश्व का क्रांतिकारी आवाम आपकी सहादत को सलाम करता है।
लाल सलाम!
UDay Che

लेखक परिचय

Uday Che पूर्व छात्र नेता हैं स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करते हैं। सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दलित एवं पीड़ितों के हक की आवाज़ अपने संगठन के माध्यम से उठाते रहते हैं। उदय चे हिसार के हांसी में रहते हैं।

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

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