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मा. सतबीर – गायकी में भी मास्टरी थी मास्टर जी की

मा. सतबीर ने कभी नहीं गाये ओच्छे गीत

July 19, 2016 12:52 am by: Category: खबर खास, शख्सियत खास, साहित्य खास 5 Comments A+ / A-

master satbir ji

आज की पीढ़ी को पंडित लख्मीचंद को देखना नसीब नहीं हुआ क्योंकि वह बहुत पहले अपना सबकुछ आने वाली पीढियों को समर्पित करके जा चुके हैं लेकिन पुरानी के साथ आज की पीढ़ी पंडित लख्मीचंद, मांगेराम, बाजे भगत, धनपत आदि लोक कलाकारों, गायकों से भली भांति परिचित है जिसका श्रेय उनके बाद के गायकों को ही जाता है। इन गायकों में सर्वोपरि  और श्रेष्ठ यदि किसी का नाम लिया जा सकता है तो वो नाम है मास्टर सतबीर का। इसका एक कारण उनकी साफ-सुथरी छवि और सिद्धांतो से समझौता न करने का दृढ़निश्चय भी है। अपने जीवनकाल में मास्टर सतबीर ने देश-प्रदेश में अनेक मंचों पर अपनी गायन कला का जोहर दिखाया। वे एकमात्र ऐसे कलाकार माने जाते हैं जिन्होंनें पंडित लख्मीचंद द्वारा बनाई गई देसी धुनों की विरासत को बचाये रखा। समय के साथ बहुत सारे लोक कलाकार नई चाल ढाल में ढलकर अपनी विरासत को भूल गये और फिल्मी धुनों की पूंछ पकड़ कर गाने लगे लेकिन मास्टर जी ने हमेशा अपने रंग को बचाये रखा। उनकी एक खासियत यह भी मानी जाती है कि उन्होंनें कभी भी मंच पर गंदा गाना नहीं गाया यह विशेषता उन्हें बाकियों से अलग करती है। असल में मास्टर जी की तुलना किसी से नहीं की जा सकती वे पंडित लख्मीचंद और मांगेराम की धुनों को अपने में संजोने वाली धरोहर थे।

13 अप्रैल 1951 में भैंसवाल कलां में हुआ जन्म

सोनीपत जिले के गोहाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव भैंसवाल कलां में 13 अप्रैल 1951 को मास्टर सतबीर का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ। स्नातक पास कर ये बतौर शारीरिक शिक्षा अध्यापक जौली गांव में नियुक्त हुए इसके बाद रभड़ा और रिवाड़ा आदि गांवों में भी बतौर शिक्षक अपनी सेवाएं दी 2009 में ये सेवानिवृत हुए। भले मास्टर जी पेशे से अध्यापक रहे हों लेकिन उनका मुख्य शौक रागनी गायन में था जो कि हरियाणा की लोक संस्कृति की एक विशेष पहचान मानी जाती है। रागनी गायन बहुत ही मुश्किल माना जाता है विशेषकर लोक धुनों में रागनी गायन करना। पंडित लख्मीचंद को उनके जाने के बाद जन-जन तक उनकी रागनियों को पंहुचाने और लोगों की जुबान पर लाने में मास्टर जी का अहम योगदान माना जाता है।

1971 से किया था गाना शुरु

परिजनों के अनुसार मास्टर सतबीर पंडित लख्मीचंद से प्रेरित होकर 1971 से रागनी गाने लगे थे और बिमारी के समय में भी चारपाई पर लेटे-लेटे ही गुनगुनाते रहते। कभी कभी वे हरियाणवी संस्कृति खासकर रागनियों में जो फूहड़ता आयी है उस पर भी अपनी चिंता जाहिर करते कभी-कभी वे सरकार से भी हरियाणवी संस्कृति को बढ़ावा देने की अपेक्षा करते फिर सरकार की उपेक्षा से दुखी भी महसूस करते। जानकार बताते हैं कि 2012 में जींद जिले के पड़ाना गांव में हुए कार्यक्रम के बाद उन्हें फिर कभी मंच पर नहीं देखा गया। सरकार ने भले ही उनकी कद्र ना की हो लेकिन लोगों ने उन्हें सर आंखों पर बैठाया। उनके अंतिम संस्कार पर उमड़ा जन सैलाब और सोशल मीडिया में आभासी श्रद्धांजलियों से लोगों के दिल में उन्होंनें कितनी जगह बनाई इसका पता चलता है।

 

master satbir yogeshwar dutt

पहलवान योगेश्वरदत्त के पहले गुरु

अध्यापन और गायन के अलावा मास्टर सतबीर जी अखाड़े का संचालन भी करते थे। विदेशों में देश और प्रदेश का सर ऊंचा करने वाले पहलवान योगेश्वरदत्त ने अपनी पहलवानी की एबीसीड़ी मास्टर जी के सानिध्य में ही सीखी। उनके देहांत पर योगेश्वर दत्त ने कहा भी है कि आज वे जो कुछ भी हैं मास्टर जी की ही बदौलत हैं मास्टर जी चाहते थे कि योगेश्वर ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर लौटे, वे अपने गुरु का यह सपना पूरा कर उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि देना चाहते हैं।

पिता की विरासत अब पुत्र के कंधों पर

मास्टर सतबीर जो अपने आपमें एक धरोहर, लोक संस्कृति के विश्वविद्यालय कहे जा सकते हैं अब उनकी विरासत को संभालने का भार उनके सुपुत्र संदीप उर्फ काला पर हैं संदीप की दो बहनें ममता और राखी भी हैं जिनका विवाह हो चुका है। संदीप तीन साल से अपने पिता की विरासत को संभाल रहा है।

master satbir antim sanskar

तीन महीने से डायलेसिस से थे पीड़ित

66 वर्षीय मास्टर सतबीर शुगर के मरीज तो थे ही पिछले तीन महीने से डायलेसिस ने भी उन्हें घेर लिया। हालांकि रोहतक के एक निजी अस्पताल में उनका ईलाज भी चल रहा था लेकिन कोई लाभ नहीं पंहुचा और गुरु पूर्णिमा से ठीक एक दिन पहले मास्टर जी अपनी यादों को हमारे बीच छोड़ गये।

master ji social media

 

सोशल मीडिया पर दी गई मास्टर जी को श्रद्धांजलि

फेसबुक वॉल पर हरियाणा के मशहूर कवि कवि इंद्रजीत उन्हें याद करते हुए पहली बार उनकी लाइव प्रस्तुति को देखने का अपना संस्मरण याद करते हुए कुछ यूं लिखते हैं

‘‘बात उस वक्त की है जब पढ्या करता.. शायद 11वीं या 12वीं मैं.. बेरा लाग्या फळाणे गाम मैं रागनी कंपीटीशन है… गाम के कई आदमी जा रहे थे… हमनै भी साईकिल ठाई अर पोहंचगे प्रोग्राम देखण.. देख्या कुछ ज्यादा बड्डा प्रोग्राम ना था.. लोग भी घणे ना थे.. पर जितने थे शांति तै बैठे रागनी सुणन लागरे थे…अर शायद रागनीयां के असली प्रेमी अर पारखी लोग थे… खैर साईकिल साईड मैं लाकै थोड़ा आग्गै गए… देख्या.. 50-60 की उम्र का रागनी गायक.. धोळा कुड़ता पजामा.. एक स्वैटर पहरे… एक हाथ कान पै धरकै.. कर्कश सी आवाज मैं.. राजा नळ किस्से की कोए रागनी गा रहा..अर वा भी कती देसी रंग मैं… माहौल ज्यादा मनोरंजक नही था…पर कुछ ज्ञानवर्धक सा लाग्या… सोच कै तो नु गए थे की कोए लेडिज कलाकार आ रही होगी.. फिल्मी तर्ज पै रागनी सुणन नै मिलैगी… लटके झटके दिखैंगे… पर इन सबतै उल्टा… यो एक आदमी पूरी भीड़ नै बांध रहा…. इसे थे रागनी गायक मास्टर सतबीर…

उस वक्त तो ज्यादा मजा नही आया.. पर पाच्छै बेरा लाग्या अक ये ही वे कलाकार सै जो रागनी की असली विधा नै जीवित रख रे सैं…अपणी लोकधुना नैं गर्व तै गांवै सै… समाज के साम्ही सामाजिक बात सुणावैं सै

मास्टर सतबीर रागनी गायक के अलावा पहलवानी का शौक भी राख्या करते.. अर अपणे ओलम्पियन पहलवान योगश्वर दत्त के गुरु भी रहे हैं… भगवान उनकी आत्मा नैं शांति देवैं…’’

छात्र और युवा नेता मानव पी वशिष्ठ अपनी फेसबुक वॉल पर लिखते हैं ‘‘पिछले कुछ सालों में हरियाणवी गायन में बहुत गिरावट नजर आई है। फूहड़ बोल, फूहड़ इशारे, फूहड़ धुनें और बेसुरे से गायक बहुत प्रसिद्धि पा गये हैं। इस सांस्कृतिक संकट में भी अपनी प्राचीन संस्कृति को बाईज्जत बचाए रखने वाले, सभ्य,शौम्य और कर्णप्रिय गायक, बेहतरीन लेखक और हरियाणवी साहित्य के जानकार मास्टर सतबीर का आज देहांत हो गया। मास्टर जी ना केवल पेशे से मास्टर थे बल्कि उनकी गायकी में भी मास्टरी थी। लगभग सभी हरियाणवी रागनी गायक मास्टर जी को अपना गुरु समान मानते थे। व्यक्तिगत तौर पर टीवी पर रागनियों वाले चैनल को जल्दी से बदल देता हूँ लेकिन मास्टर जी की रागनियाँ अक्सर रुक कर सुनता रहा हूँ । हरियाणवी गायकी के क्षेत्र में यह बहुत बड़ा झटका है । हमेशा लोगों से सुनता रहा हूँ कि मास्टर सतबीर कभी फूहड़ नहीं गता और आज तक कभी लोगों की बात को झूठा नहीं पाया। मास्टर जी को अलविदा…

वहीं कंवर सिंह कुछ यूं लिखते हैं

शुक्ल पक्ष आषाढ़ की चौदस करगी हमने गमगीर

संस्कृति का स्तम्भ रहया कोन्या मास्टर सतबीर

 

मास्टर जी पर लिखी कंवर सिंह की यह पूरी कविता पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें

 

हरियाणवी संस्कृति की महान विरासत के रक्षक मास्टर सतबीर को हरियाणा खास सलाम करता है।

मा. सतबीर – गायकी में भी मास्टरी थी मास्टर जी की Reviewed by on . आज की पीढ़ी को पंडित लख्मीचंद को देखना नसीब नहीं हुआ क्योंकि वह बहुत पहले अपना सबकुछ आने वाली पीढियों को समर्पित करके जा चुके हैं लेकिन पुरानी के साथ आज की पीढ़ आज की पीढ़ी को पंडित लख्मीचंद को देखना नसीब नहीं हुआ क्योंकि वह बहुत पहले अपना सबकुछ आने वाली पीढियों को समर्पित करके जा चुके हैं लेकिन पुरानी के साथ आज की पीढ़ Rating: 0

Comments (5)

  • kapinder sharma

    🙏🙏मास्टर सतबीर जी को सत सत नमन ।🙏🙏
    यह रागनी ” रागनी सम्राट मास्टर सतबीर जी ” को श्रधांजलि स्वरूप अर्पित है ।

    अठारा सात सोला (18-07-16) के दिन , लग्या झटका हर इंसान को ।
    हरियाणवी कला के रक्षक श्री सतबीर छोड़गे ज़हान को ।। ( टेक )

    1. सोमवार का दिन मिलग्या , इतणा तो अहसान होया
    शिव शंकर के बरत करै था , ना उस दिन जल-पान होया
    मित्र प्यारे याद करे फेर , असनाईयां मैं ध्यान होया
    ब्याही बीर तैं कहण लग्या न्यूं , मैं कुछ पल का मेहमान होया
    फेर बेटे नै समझावण लाग्या , ना चाहिये रोणा जवान को ।।
    2. सारे शिष्य याद करे फेर आंगलियां पै गिण -2 कै
    सारे महल गिरण लगे फेर , जो त्यार करे थे चिण -2 कै
    लिखे कर्म नै पूरा करग्या , धरया बेहमाता नै खिण -2 कै
    सादे बाणैं रह्या हमेशा , ना चाल्या था कदे बण – ठण कै
    बेइज्जती का ना संगी था वो , दिया साथ सदा सम्मान को ।।
    3. इतणा इज्जत आला था वो , ना गाया गेल लुगाइयाँ कै
    कह्या सुणी चाहे रोज रही हो , पर धोरै बैठ्या भाइयाँ कै
    गलत ब्राह्मण ना आच्छा लाग्या , गाया गेल्यां नाईयां कै
    आच्छे कर्म तो करे भतेरे , ना धोरै गया बुराईयाँ कै
    लख़मी – मांगे की बात दोहरादी , गा दिया ब्रह्म ज्ञान को ।।
    4. छोहला तो था ब्हौत घणा पर , सही-गलत पिछाणै था
    सोच समझ कै बात करै था दूध और पाणी छाणै था
    चौगरदे कै थी इज्जत उसकी , वो माणस सही ठिकाणै था
    सही सुर और जोश खूब था , ज्ञान भतेरा जाणै था
    कहै कपीन्द्र शर्मा दियो मुक्ति प्रभु , ऐसी अद्भुत ज्यान को ।।

    लेखक कपीन्द्र शर्मा – 8529171419

  • manukumar sharma

    ma master satvir singh ji ko sunta hu to lakhmi chand ji ko unhe ki abaj me sun raha hu asa lagta tha kyo ki unohanae lakhmi chand ji aur mange ram ji ki jo dhun the unhe ko banaye rakha

    manu kumar sharma

  • Sitaram

    Regards for master satbir hi.

  • pt.manjeet pahasouriya

    ना क्यांहे का घमण्ड था , मास्टर सतबीर के मन मैं ।
    18 तारीख भीना जुलाई गया छोड़ सोला के सन् मैं ।। (टेक)

    १) ब्राह्मण के घर जन्म लिया और ब्रह्मज्ञान की सुणाई बात
    पिर्थवि सिंह का सुपुत्र था और कृष्णा तैं लिए फेरे सात
    ममता, राखी , संदीप नै तूं दुःख देगा एक छन मैं ।।

    २). गायन विधा सीखण खात्तर रामदत्त जी गुरू बनाया
    देशी साज पै गाया गाना स्याहमी अड़णीया ना माणस पाया
    बोल सुरीले कह्या करता , ला सुरति हरि भजन मैं ।।

    ३). मेहनत करकै भैंसवाल कर दिया रोशन गाम तन्नै
    लय सुर सही जाण्या करता क़रया संस्कृति का नाम तन्नै
    साथ सबका छोड चल्या या लागीआग बदन मैं ।।

    ४) खबर सुणी जिब मास्टर जी की , झटका लग्या गात मैं
    ईश्वर का भी कुछ ना बेरा , के करदे घड़ी स्यात मैं
    कह मनजीत पहासोरिया ना पार बसाई , या होई अँधेरी दिन मैं ।।

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