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मास्टर सतबीर – लोक संस्कृति के एक युग का अंत

फेसबुक से साभार कंवर सिंह की यह कवितामयी श्रद्धांजलि

July 18, 2016 11:15 pm by: Category: शख्सियत खास, साहित्य खास 1 Comment A+ / A-

लोक गायक मास्टर सतबीर पंडित लख्मीचंद, बाजे भगत, धनपत, पंडित मांगेराम की पंरपरा को संभालने वाले एक मजबूत स्तंभ थे उनका चले जाना एक पूरे युग का चले जाना है। फेसबुक पर उनके बहुत से चाहने वालों ने भावभीनी श्रद्धांजलि दी है उनमें से एक श्रद्धांजलि हरियाणा खास आपके साथ सांझा कर रहा है। कंवर सिंह ने मास्टर जी अपनी इस हरियाणवी कविता के जरिये श्रद्धांजलि दी।

master satbir

शुक्ल पक्ष आषाढ़ की चौदस करगी हमने गमगीर

संस्कृति का स्तम्भ रहया कोन्या मास्टर सतबीर

उठ सुबह सुणी खबर तबियत गई ना डाटी

हीया उझल कै आया सबका पाटण लागी छाती

संस्कृति का बणै कोण हिमाती न्यूं भरा आँख महं नीर

संस्कृति का स्तम्भ रहया कोन्या मास्टर सतबीर

ज्ञानी ध्यानी कहया करते ज्ञान गजब का गोला था

अभिमान का खोज नहीं बिल्कुल सादा भोला था

उका देश म्हं रुक्का रोला था सुणा करते मर्द और बीर

संस्कृति का स्तम्भ रहया कोन्या मास्टर सतबीर

दादा लख्मी और मांगे के किस्से सब गा गया

गाकै ब्रह्मज्ञान धार ज्ञान की बहा गया

वो सबके दिल पै छा गया चाहे साधु संत फ़कीर

संस्कृति का स्तम्भ रहया कोन्या मास्टर सतबीर

ऐसा गायक हटके फेर दोबारा आवै कोन्या

कँवर सिंह फिरै टोहवैता टोहे तै पावै कोन्या

ईब खड़ा होकै गावै कोन्या किस्सा राँझा पीर

संस्कृति का स्तम्भ रहया कोन्या मास्टर सतबीर

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मास्टर सतबीर – लोक संस्कृति के एक युग का अंत Reviewed by on . लोक गायक मास्टर सतबीर पंडित लख्मीचंद, बाजे भगत, धनपत, पंडित मांगेराम की पंरपरा को संभालने वाले एक मजबूत स्तंभ थे उनका चले जाना एक पूरे युग का चले जाना है। फेसबु लोक गायक मास्टर सतबीर पंडित लख्मीचंद, बाजे भगत, धनपत, पंडित मांगेराम की पंरपरा को संभालने वाले एक मजबूत स्तंभ थे उनका चले जाना एक पूरे युग का चले जाना है। फेसबु Rating: 0

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