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मई दिवस – संकट में हैं मजदूर

अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की क्रांतिकारी शुभकामनाएं

April 30, 2017 4:31 pm by: Category: इतिहास खास, खबर खास Leave a comment A+ / A-

मजदूर जिन्हें हम श्रमिक, मेहनतकश, लेबर आदि कई नामों से संबोधित करते हैं। सही मायनों में बदलाव मजदूरों के दम पर ही संभव हुआ है। इतिहास गवाह है कि देश ही नहीं दुनिया में और दुनिया ही नहीं पूरी मानव सभ्यता में विकास का पहिया जितना घूमा है वह मजदूरों के दम पर ही संभव हुआ है। 1 मई दुनिया भर के मेहनतकशों के दिन के रूप में मनाया जाता है। दरअसल यह मजदूरों के उस संघर्ष की याद दिलाता है जिन्होंने कर्म करने साथ-साथ उसके फल का हिसाब मांगा। बेहिसाब कर्म पर अंकुश लगाने और सम्मानजनक जीवन जीने की मांग की। यह अपने आप में एक बड़ा बदलाव था। मई दिवस के बहाने आइये जानते हैं दुनिया के चेंजमकर मजदूरों के संघर्ष के बारे में।

सुबह से लेकर शाम तक हमारी दिनचर्या में हमें घर से लेकर दफ्तर तक सफर में, गांव से लेकर खेत तक अनेक श्रमिकों से वास्ता होता होगा। मजदूरों की मेहनतकशों की कौम एक ऐसी कौम है जिसके खून-पसीने की बू कंकरीट के इन जंगलों से लेकर खेत खलिहानों में पैदा होने वाले अन्न में घुली होती है। हाड़ तोड़ मेहनत करने वाले मजदूर तो आज भी भले ही अज्ञानता और परिस्थितियों से मजबूर होकर 12-12, 14-14 घंटे काम करता हो लेकिन पढ़े लिखे मजदूर दफ्तरों में जो 8 घंटे बिताते हैं वह दुनिया के मजदूरों के संघर्ष की बदौलत ही संभव हो पाया है। इस संघर्ष के विजय दिवस को मनाने की शुरुआत ही अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में लगभग 121 साल पहले 1 मई 1886 को अमेरिका में हुई।

भारत में कब हुई मई दिवस की शुरूआत

भारत में मई दिवस को मनाने की शुरुआत 1 मई 1923 से चेन्नई में हुई। उस समय मई दिवस को मद्रास दिवस के रूप में मनाया जाता था। इस दिन को मनाने का श्रेय भारती मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेल चेटयार को जाता है। उन्हीं के प्रयासों से मद्रास में उच्च न्यायालय के सामने एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर इस दिन को कामगार दिवस के रूप में मनाने का संकल्प लिया गया। वर्तमान में भारत सहित दुनिया के लगभग 80 देश मई दिवस को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाते हैं।

संकट में मजदूरों के संघर्ष

महात्मा गांधी कहते थे कि किसी भी देश का विकास उस देश के मेहनतकश मजदूरों और किसानों पर निर्भर करता है। अब देश का विकास तो धड़ल्ले से हो रहा है लेकिन देश के मजदूर आज भी बदहाली में जीवन बसर करने को मजबूर हैं। कहने को तो मजदूरों के संघर्ष आज भी होते हैं लेकिन उनमें वो धार नज़र नहीं आती। आज फिर पूंजीपति वर्ग मेहनतकश के शोषण से मोटा मुनाफा कमाने में जुटा है। नये-नये कानून पारित कर मजदूरों को संगठित होने पर पांबदियां लगाई जाने लगी हैं। आंदोलनों को तोड़ने के लिये साम दाम दंड भेद जितने भी हथियार अपनाये जाने चाहियें अपनाये जा रहे हैं। मजदूर भी खेमों में बंटा है जिस कारण उसकी ताकत कमजोर हुई है। जहां मजदूर संगठित हैं वहां फिर भी वे अपने हकों के लिये आवाज़ उठा लेते हैं लेकिन असंगठित क्षेत्र के मजदूर तो शोषण के लिये अभिशप्त हैं।

एक नज़र हरियाणा में मजदूरों पर

हरियाणा में लगभग हर क्षेत्र में बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर काम करते हैं। भवन निर्माण से खेतों में बिजाई कटाई तक, कारखानों से लेकर ईंट भट्ठा उद्योग तक। हर वस्तु के दाम लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन मजदूर यदि अपने मेहनताने को बढ़ाने की कहते हैं तो सबकी भौंहे तन जाती हैं। हाल ही में ईंट भट्ठा मजदूर अपनी दिहाड़ी बढ़ाने की मांग के लिये हड़ताल पर थे लेकिन भट्ठा मालिकों का जोर देखिये मजदूर नेताओं के दफ्तर पर जाकर उन्हें चोट पंहुचाने के प्रयास किये। फोन पर धमकियां देने का प्रचलन तो आम है। जब दफ्तर पर दाल नहीं गली तो अपने गुर्गे भेजकर मजदूरों से मिलने पंहुचे मजदूर नेताओं पर हमला करवा दिया। उधर यदि चार दिन काम छोड़ना पड़ जाये तो मजदूरों को खाने के लाले पड़ जाते हैं कब तक हड़ताल पर रहते। अब वे अपनी मेहनत के नहीं मालिक के रहम पर गुजर बसर करने को मजबूर हैं। यही हमारे दुनिया को बदलने वाले असली मजदूर हैं।

हरियाणा खास की ओर से अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस की आप सभी को क्रांतिकारी शुभकामनाएं।

मई दिवस – संकट में हैं मजदूर Reviewed by on . मजदूर जिन्हें हम श्रमिक, मेहनतकश, लेबर आदि कई नामों से संबोधित करते हैं। सही मायनों में बदलाव मजदूरों के दम पर ही संभव हुआ है। इतिहास गवाह है कि देश ही नहीं दुन मजदूर जिन्हें हम श्रमिक, मेहनतकश, लेबर आदि कई नामों से संबोधित करते हैं। सही मायनों में बदलाव मजदूरों के दम पर ही संभव हुआ है। इतिहास गवाह है कि देश ही नहीं दुन Rating: 0

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