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मानसिक स्वास्थ्य जागरुकता – दिल की दिमाग पर न लें

April 29, 2017 12:15 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है संभव है कि यह कहावत भी बिना किसी अनुभव के तो बनी नहीं है इसलिये स्वस्थ मन के लिये शरीर का स्वस्थ होना पहली अनिवार्यता है लेकिन क्या आपने सोचा है कि कभी-कभी शरीर तो एकदम स्वस्थ और तंदुरुस्त लगता है लेकिन हमें सारे रंग फिके, प्रकृति के मनोरम दृश्य विरान से लगते हैं। अंदर-अंदर ही कुछ टूटता हुआ नज़र आता है। यह हमारे मन की अस्वस्थता का संकेत हैं।

मन का कोई आकार नहीं माना जाता ऋषियों, मुनि, साधु, संत तो इसे बहुरंगी घोड़े की संज्ञा देते हैं। जिसकी गति सबसे तेज होती है। क्षण भर में यह चांद तारों की सैर करके लौट आता है। जब यह अशांत होता है, दुखी होता है, चिंतित होता है, तनाव में होता है तो यह मन का विकार बनता है। मानसिक रूप से स्वस्थ न होने का तात्पर्य है शरीर के सोचने, समझने, महसूस करने, आदेशों को क्रियान्वित करने जैसे निर्णय जो मस्तिष्क द्वारा लिये जाते हैं उन्हें लेने में असमर्थ होना। यदि मानसिक संतुलन अधिक खराब हो तो मनुष्य किसी काम को करने में समर्थ नहीं होता और यदि यह क्षीण हो तो उसकी गति धीमी रहती है। ऐसे में शरीर और मस्तिष्क तालमेल के साथ काम नहीं कर पाते।

तन और मन का गहरा नाता है यदि तन पीड़ित होता है तो मन पर उसका सीधा असर होता है और मन की पीड़ा से तन की पीड़ा भी बढ़ने के आसार हो जाते हैं। ऐसे में बेहतर स्वास्थ्य के लिये तन ही नहीं मन की स्वस्थता भी बहुत जरुरी है।

मानसिक अस्वस्थता के क्या हैं कारण

दु:ख – मानसिक अस्वस्थता का मुख्य कारण है किसी भी प्रकार का दु:ख। महात्मा बुध दु:ख का कारण इच्छाओं को बताते हैं। ओशो समय को दु:ख बताते हैं वे आनंद को समयातीत मानते हैं। जो समय से परे है, जो इच्छाओं से ऊपर उठ जाता है वह दु:खों से भी पार पा लेता है लेकिन यह बातों में जितना सरल जितना अच्छा लगता है व्यावहारिक रूप से उतना ही असंभव प्रतीत होता है। इसलिये दु:खों से पार पाने के लिये अपनी क्षमताओं को विकसित करें और क्षमतानुसार अपेक्षाएं रखें। सब्र करना सीखें। इससे आप अपने मन में एक संतुष्टि एक शांति महसूस करेंगें और आपका मानसिक स्वास्थ्य भी सही रहेगा।

क्रोध – दु:ख अपेक्षाओं के पूरा न होने पर होता है तो क्रोध हमें तब आता है जब कोई हमारी इच्छाओं, अपेक्षाओं के पूरा होने की राह में रोड़ा बनकर खड़ा हो जाये। लेकिन इसकी चिंता करने, क्रोध करने से मानसिक स्वास्थ्य पर बूरा असर पड़ता है।

भय – बचपन से ही अनेक प्रकार भय हमारे मस्तिष्क में बैठाए जाते हैं। भय का एक बड़ा व्यापार है। ऐसा करो नहीं तो वैसे होगा, ये करो वरना ये हो जायेगा। वहां मत जाना, उसका मत खाना, वहां भूत रहते हैं आदि आदि। इस तरह डर की भावना हमारे मस्तिष्क की रोग प्रतिरोधक क्षमता को क्षीण करती है। इसलिये हमें विवेक का सहारा लेना चाहिये। ज्ञान से ही हम भय के अंधकार को भगा सकते हैं। हमें यह समझना चाहिये कि भय हमें किस चीज़ का होता है भय हमें होता है कुछ छीन जाने का, कुछ खो जाने का, किसी अपने से दूर हो जाने का यहां यह समझने की आवश्यकता है कि जिन परिस्थितियों को हम नियंत्रित कर सकते हैं उसके प्रयास तो हम करते ही हैं जो परिस्थितियां हमारे वश में हैं ही नहीं फिर उस पर हम काबू कैसे पा सकते हैं इसलिये प्रत्येक परिस्थिति के लिये अपने आपको दिमागी रूप से तैयार कर लेना चाहिये। कहते भी हैं ना कि डर के आगे जीत है।

मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के उपाय

एकमात्र उपाय हर परिस्थिति को विवेकपूर्ण ढंग से समझें, धैर्य रखें, योगाभ्यास जैसी ध्यान क्रियाओं से मन को शांत करने के प्रयास करें और प्रसन्न रहें। दिल की बिमारी को अपने दिमाग पर हावि न होने दें। समाज इसमें महत्वपूर्ण भूमिका इतनी ही निभा सकता है कि वह अपने आस-पास एक स्वस्थ, सुरक्षित और विश्वासपूर्ण माहौल का निर्माण करे।

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