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मेरी जाति मेरी परछाई

December 24, 2017 1:17 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

मेरी जाति मेरी परछाई

हमारे देश- जैसे बुरे हालात किसी दूसरे देश के नहीं हुए। यहाँ अजब-अजब सवाल उठते रहते हैं। एक अहम सवाल अछूत-समस्या है। समस्या यह है कि 30 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में जो 6 करोड़ लोग अछूत कहलाते हैं, उनके स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा! उनके मन्दिरों में प्रवेश से देवगण नाराज हो उठेंगे! कुएं से उनके द्वारा पानी निकालने से कुआँ अपवित्र हो जाएगा! ये सवाल बीसवीं सदी में किए जा रहे हैं, जिन्हें कि सुनते ही शर्म आती है।

भगत सिहँ

              बस्ती की तंग गलियों में खेलकूद कर मैं बड़ा हुआ। बस्ती में सभी लोग एक ही जाति के थे और आर्थिक हालात भी एक जैसे थे। सभी का एक दूसरे के घर आना जाना रहता था और सभी एक दूसरे की खुशी-गम में शम्मिल होते थे। शायद इसलिए सभी एक जैसे लगते थे ओर कभी हीनता जैसा महसूस नही होता था। लेकिन जब मैंने स्कूल जाना शुरू किया तो पहली बार मुझे अहसास हुआ की मैं कुछ अलग हुँ इसलिए कुछ बच्चे मेरे साथ खेलना नही चाहते थे और ना ही मेरे साथ खाना खाना चाहते थे।

मुझे आज भी याद है कि जब मैंने मेरे साथ पढ़ने वाले एक लड़के से पूछा कि तुम मेरे साथ क्यो नही खेलना चाहते तो उसने बोला कि मेरे मम्मी-पापा मना करते है। मैंने पूछा आपके मम्मी-पापा क्यों मना करते है तो वो जाति सूचक शब्दो का इस्तेमाल करते हुए बोला क्योकि तुम इस जाति से हो। पहली बार मुझे समझ आया कि कहीं ना कहीं मेरी जाति की वजह से कुछ लोग मुझसे दूर भागते है। उनके चेहरे पर मेरी जाति को लेकर जो हीन भावना थी वो साफ साफ़ नजर आती थी।

ऐसे अनुभवों से मेरी फिर हर दिन जान पहचान होने लगी थी। फिर भी मेरे मन मे एक आशा रहती थी की बड़ी कक्षा में ऐसे नही होगा क्योकि बड़ी कक्षा में तो हम सभी समझदार हो जाएंगे।

वो दिन भी आ गया जब मैं स्कूल की बड़ी क्लास में हो गया। लेकिन जल्द ही मेरी सारी गलतफहमी दूर होने लगी थी और जाति व्यवस्था की खाई ओर गहरी दिखाई देने लगी थी। बस अबकी बार मेरे साथ पढ़ने वाले स्टूडेंट के साथ मेरे टीचर्स भी उन अनुभवों में जुड़ते चले गए। ऐसे अनोखे अनुभव ने मुझे फिर से सोचने के लिए मजबूर किया कि कैसे मेरे पढ़े लिखे टीचर्स भी जातीय संकीर्णता के शिकार हो सकते है?

मेरे अध्यापक अप्रत्यक्ष व बहुत साफ सुथरे तरीके से भेदभाव करते थे। मेरे अध्यापक कभी भी मेरे जैसे यानी मेरी जाति से सबन्ध रखने वाले किसी भी स्टूडेन्ट से खाने-पीने की चीजें नही मंगवाते थे क्योंकि उनकी खाने पीने की चीजों को छूने से उन्हें अपना धर्म भृष्ट होने का डर रहता था। वो सिर्फ हमको ऐसे काम बताते थे जो साफ सफाई से जुड़े थे, और तो और किसी भी धार्मिक किताब को भी हाथ लगाने की अनुमति नही होती थी। बड़ी कक्षा में जाति सूचक शब्दों का इस्तेमाल गालियों में सुनना बहुत आम हो गया था ओर मेरे कानों को इसकी आदत भी पड़ने लगी थी।

स्कूल के अनुभवों को साथ लिए अब मैं यूनिवर्सिटी में आ गया था। अनुभवों के गुच्छों ने मुझे जातिय नफरतों से छिपना सिखा दिया था। अब मैं सिर्फ उन्हें ही अपना दोस्त बनाता था जो मेरे जैसे थे ताकि हीनता की भावना से बाहर आ सकू। लेकिन बहुत सी बातें हमारे हाथ मे नही होती। यूनिवर्सिटी के दौरान मेरा एक दोस्त ऐसा बना जो मेरे जैसा नही था उच्च कहे जाने वाली जातियों से सम्बद्ध रखता था। बहुत बार ऐसा होता था कि उसके दोस्त मेरे सामने जाति सूचक गालियों का प्रयोग करते थे जो मुझे असहज कर जाते थे। लेकिन मैं चुप रहता था क्योंकि मैंने भी मान लिया था कि ऐसा तो होगा ही।

एक बार मेरे दोस्त के साथ मेरा झगड़ा हो गया और झगड़ते हुऐ मेरे दोस्त ने मुझसे कहा- तेरी जात के लोग चप्पल उतार के हमारी गली से निकलते है। उसके इन शब्दों ने मुझे बहुत बुरी तरह से तोड़ दिया कि मेरा आत्मविश्वास ही खत्म हो गया। यूनिवर्सिटी के दौरान जब कोई मुझसे पूछता था कि क्या तुम जाति में विश्वास रखते हो तो मेेरे पास उसका जवाब नही होता था। इसकी एक वजह भी थी क्योंकि अगर मैं ना बोलता था तो ये सुनने को मिलता था अपनी जाति छुपाने के लिए ऐसा बोल रहा है। अगर मैंने हाँ बोला तो बोलता तो कि जात-पात में विश्वास करता है। दोंनो सूरतों में हार तो मेरी ही होती थी।

स्कूल से यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी से जॉब ऐसे कटु अनुभवों का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। बस फर्क इतना था कि लोगों के जातीय घृणा के रूप बदलते चले गए। एक बार मेरी बॉस ने मुझसे उच्च कहे जाने वाली जाति का नाम लेकर पूछा कि क्या तुम उसे जाति से हो। मैंने मना करते हुऐ अपनी जाति के बारे में बताया तो मेरी बॉस के चेहरे पर सन्नटा सा छा गया। शायद उसको इतना सदमा लगा कि वो अपने चेहरे के भावों को भी नही छुपा पाई। उस दिन के बाद उसका व्यवहार ऐसे बदल गया जैसे मैं कोई जन्मजात अपराधी हुँ। आर्थिक हालात खराब होते हुए भी मुझे जॉब छोड़ने का फैसला लेना ही पड़ा।

बहुत से ऐसे लोग भी मिले जो मुझसे कहते थे कि वो जातिय-भेदभाव के खिलाफ है लेकिन वही लोग मुझसे मेरा गौत्र पूछते थे। मैंने जातिय भेदभाव के तरीके कुछ इस तरह से बदलते देखा कि कोई नही कह सकता कि कोई जातिय सकीर्णता से ग्रसित है। जब किराये के लिए मकान की तलाश में किसी घर जाते तो उनका पहला वाक्य ये होता था पण्डित हो क्या या फिर कोई और उच्च जाति। जैसे ही मेरी जाति से उसकी पहचान होती थी वो मकान देने से इन्कार कर देते थे।

मेरी जिंदगी एक दिन वो भी आया जब मेरे अनुभवों को थोड़ा विराम मिला। मैंने ब्रेकथ्रू नाम की एक मानव अधिकार संस्था में काम मिला। ये संस्था महिलाओं और लड़कियों के प्रति हो रही हिंसा के खिलाफ काम करती है। शुरू- शरू में मेरे मन यही ख्याल चलता रहता था कि जब ब्रेकथ्रू से कोई मेरी जाति के बारे में पूछेगा तो क्या होगा। जब भी मेरे साथ काम मेरे सहकर्मी बात करते थे तो लगता था कि अब जाति के बारे में पूछेंगे। दिन महीनों में बदले महीने सालों में बदल गए लेकिन जाति का सवाल ओर मेरे कटु अनुभव ब्रेकथ्रू में कभी अनुभव नही किये। मुझे मेरी जाति से नही मेेरे काम से पहचान मिली। मुझे ब्रेकथ्रू में 5 साल से ज्यादा हो गए लेकिन किसी को मेरी जाति से कोई मतलब नही है।

अच्छे और बुरे लोग तो हर धर्म और जाति में होते है फिर क्यो किसी एक जाति या धर्म के प्रति हम इतनी नफरत रखते है और ये नफरत कब हिंसा में बदल जाती है पता ही नही चलता। आज भी जात-पात के नाम पर बहुत हिंसा होती आ रही है और इस हिंसा में लोगों की जान भी चली जाती है। आज भी मेरे मन में ऐसी दुनिया का सपना है जहां हर किसी को न्याय, सम्मान और समानता मिले। जातिवाद नफ़रतों को छोड़ कर हम सम्मान की बात करे। जहां किसी की जाति उसकी परछाई ना हो व जाति से किसी की पहचान न हो ।

 

लेखक परिचय – रॉकी कुमार स्वतंत्र लेखक हैं एवं सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। लैंगिक समानता पर काम करते है। मास्टर डिग्री सोशल है।

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

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