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राजनीति की डगर पर, मिर्चपुर के सबक…

December 14, 2016 1:21 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

mirchpur

हिसार और जींद की सीमा पर बसा मिर्चपुर गांव वर्ष 2010 की 21 अप्रैल को राष्ट्रीय स्तर पर इसलिए चर्चा में आया क्योंकि एक कुत्ते के विवाद को लेकर एक समुदाय के लोगों ने बाल्मीकि बस्ती में आग लगा दी थी। इस अग्निकांड में एक वृद्ध ताराचंद और उसकी दिव्यांग पुत्री सुमन आग में ही खाक हो गए थे। इस घटना के बाद मिर्चपुर गांव में सीआरपीएफ की कंपनी तैनात कर दी गई थी।

इस घटना के समय हरियाणा में कांग्रेस की सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई थी। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी ताराचंद व सुमन के परिवारजनों को ढाढ़स बंधाने बिना मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को सूचित किए अचानक ही पहुंच गए थे। लोकजनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामबिलास पासवान और अन्य नेताओं ने मिर्चपुर की इस मिर्च सी तीखी, कड़वी सच्चाई को जानने की कोशिश की थी। खुद मुख्यमंत्री के तौर पर तब भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी गांव पहुंचकर इस घटना से प्रभावित लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की कोशि की और दो-दो क्विंटल गेहूं, घायलों को उपचार के लिए राशि और ताराचंद के तीन-तीन बेटों को सरकारी नौकरी और आवास उपलब्ध करवाया। इसके बावजूद 130 दलित परिवार मिर्चपुर गांव से पलायन कर जनवरी 2011 में हिसार एक फॉर्म हाउस में पहुंच गए। लघु सचिवालय के सामने मिर्चपुर कांड को लेकर धरना, नारेबाजी चलती रहती। जहां राज्य सरकार ने मिर्चपुर में दलितों के पुनर्वास के प्रयासों में करोड़ों रुपए खर्च कर दिए, वहीं सीआरपीएफ की तैनाती पर घटना के बाद से अब तक 16 करोड़ से भी ज्यादा की राशि खर्च हो चुकी, तब खट्टर सरकार ने गृह मंत्रालय के पास सीआरपीएफ की कंपनी की तैनाती हटा लेने का प्रस्ताव भेजा। इसे स्वीकार कर लिया गया। पुलिस अधिकारी गांव पहुंचे और जायजा लेने के लिए सभी पक्षों से बातचीत के बाद अद्र्धसैनिक बल को हटाए जाने की सहमति को देखते हुए, अब मात्र 25 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए। देखा जाए तो मिर्चपुर कांड में बहुत कुछ खो देने वाले, अब गांव में भाईचारे की मिठास, सद्भाव का रिश्ता बनाने के लिए तैयार हो गए हैं। यह एक शुभ का संकेत है और मीडिया में सकारात्मक खबर कभी सुर्खियों में नहीं आती, इसलिए कोई बड़ा नेता मिर्चपुर के लोगों को इसके लिए बधाई देने नहीं पहुंचा। वैसे भी देश के नेता नोटबंदी पर लोकसभा व राज्यसभा के अंदर व बाहर हंगामे में मशगुल हैं। अब मिर्चपुर किए याद है?

मिर्चपुर कांड से राजनीति की डगर पर चलने वाले लोग कुछ सबक लेंगे? यह भी एक अजीब घटनाक्रम कहा जाएगा कि मात्र एक कुत्ते के विवाद पर पूरे गांव की एक बस्ती को ही आग के हवाले करके अंशांत व नर्क जैसा बना दिया जाए? गांव से पलायन करने पर विवश लोग तंबुओं व खुले आसमान के नीचे कैसे जीवन गुजारते रहे? मकान बनाने के लिए भी सहायता लेने और अन्य सुविधाओं व सुमन की हृदय विदारक घटना को भुलाकर, हाशिए पे डालकर राजनीतिक रोटियां ही सेंकी जाती रहीं? क्या ऐसा करने वाले मिर्चपुर के मजबूत भाईचारे से कोई सबक लेंगे? आखिरकार प्रेम, सद्भाव और भाईचारे की ही जीत हुई और राजनीति की हार। मानव जहां भी रहता है, उसे स्वर्ग बनाना व देखना चाहता है। इसलिए मिर्चपुर के लोग बधाई के पात्र हैं। सेना को हटाने से बचा करोड़ों रुपया अब विकास पर खर्च होगा?  मिर्चपुर के लोगों के लिए इतना ही कह सकते हैं:-

दुआ करो कि यह पौधा हरा-भरा ही रहे,

उदासियों में भी चेहरा खिला-खिला ही रहे।

kamlesh-bhartiya

लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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