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ऐसी कडक़ चाय, विपक्ष से पी न जाए

November 16, 2016 9:50 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चाय का रिश्ता जगजाहिर है। बचपन में वे अपने पिता के साथ रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने के काम में हाथ बंटाते थे। फिर वे आरएसएस से जुड़े और इसी के माध्यम से वे राजनीति की सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते गुजरात के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे। गुजरात के मुख्यमंत्री बनवाने और फिर गुजरात के गोधरा कांड में संकट में आने पर उपप्रधानमंत्री रहे लाल कृष्ण आडवाणी ने मदद की, नहीं तो उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तो सांकेतिक रूप में कह दिया था कि मोदी राजधर्म का पालन करें यानी सीधे अर्थों में मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दें लेकिन उप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी उन्हें इस राजनीतिक भंवर से निकाल लाए। वैसे ही जैसे क्रिकेट खिलाड़ी को आउट होते-होते कैच टपक जाने से जीवनदान मिल जाए। पर मजेदार बात यह हुई कि जैसे क्रिकेट में किसी बढिय़ा बल्लेबाज को जीवनदान देना महंगा पड़ जाता है, ठीक बिल्कुल ऐसा ही राजनीति में लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हुआ। मोदी को दिलाया गया वह राजनीतिक आशीर्वाद कहिए या जीवनदान आडवाणी को ही मंहगा पड़ गया। मोदी ने बड़े प्रेमपूर्वक प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनने के लिए आडवाणी को पीछे कर दिया और अब तो आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा व अन्य अनेक वरिष्ठ नेता भाजपा में हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। सुषमा स्वराज ही अपना विकेट एक छोर पर बचा पाई और अब तक नॉट आउट हैं।

जब लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में नरेंद्र मोदी मैदान में उतरे तब उन्होंने आम आदमी से अपनी निकटता व मधुर संबंध जाहिर करने के लिए फिर से अपने चाय बेचने वाले बचपन को याद किया। उनके रणनीतिकार प्रशांत किशोर, संक्षेप में ‘पीके’ ने भी इस चरित्र को बखूबी जनता के बीच सफल बनाने के लिए नमो टी स्टॉल खोलने और चाय पे चर्चा के कार्यक्रम बनाए। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने इस चाय की चर्चा में आग में घी डालने का काम किया। जब उन्होंने बड़ा रुखा व अपमानजनक बयान दे डाला कि एक चायवाला देश का प्रधानमंत्री कैसे हो सकता है? बस, मोदी ने इस बयान को खूब भुनाया और भावुक करने के लिए जनता से पलटकर सवाल पूछा कि आप ही बताइए कि एक चाय वाले को प्रधानमंत्री बनने का अधिकार नहीं है क्या? मैं एक चायवाला होने के नाते प्रधानमंत्री बनने का सपना नहीं देख सकता क्या? इस तरह एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री पद तक भी पहुंच गया। चाय बेचने वाली छवि को कब तक भुनाएंगे?

अब 500 व 1000 रुपए के नोट बंद करने को भ्रष्टाचार पर सर्जिकल स्ट्राइक कह रहे मोदी ने फिर से यूपी के गाजीपुर में एक रैली में कहा कि मेरी कडक़ चाय गरीबों को पसंद आती है पर अमीरों का जायका बदल गया है। उन्होंने यह भी कहा कि गरीब आराम से सो रहे हैं जबकि अमीर नींद की गोलियां खा रहे हैं। इस पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पलट कर कहा कि हकीकत इसके  उलट है। गरीब बैंक के बाहर मर रहे हैं और ‘मोदी के दोस्त’सो रहे हैं। गाजीपुर में मोदी ने व्यंग्य से कहा कि कुछ नेता ऐसे हैं नोटों की माला से जिनकी मुंडी भी नहीं दिखती थी। इस पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि हमारे कार्यकर्ता मेहनत की कमाई से नोट की माला पहनाते हैं। दलित की बेटी का सम्मान इनसे देखा नहीं जा रहा। अब मोदी के शब्दों में उन्होंने जो कडक़ चाय बनाई है, उसे विपक्ष को पीना मुश्किल हो रहा है। बल्कि इस चाय को छोडक़र पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों से भी हाथ मिलाने की पेशकश कर, विपक्ष को एकजुट होकर संसद सत्र में पूरे जोर-शोर से उठाने की मांग की।

अभी तक मोदी की कडक़ चाय सामने है। अब देखते हैं कि ममता बनर्जी विपक्ष को एकजुट कर कैसी चाय बदले में पेश करती हैं… किसकी बनाई चाय जनता को पसंद आएगी- मोदी या ममता की?

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लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइस हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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