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लोकसभा और जनसभा में ये कैसी भाषा?

February 10, 2017 11:32 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

विधानसभा के चुनाव क्या आए, नेताओं की भाषा ही बदल गई। पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यथित होकर कहते थे कि लोकसभा में बोलने का अवसर नहीं मिलता, इसके चलते जनसभा में अपनी बात रखता हूं। लोकसभा और जनसभा की भाषा में निश्चित तौर पर फर्क होना ही चाहिए। जनसभाओं में नेताओं की जुबान लगातार फिसल रही है। खासतौर पर यूपी के चुनाव की जनसभाओं में तो एक दूसरे पर ऐसी-ऐसी छिंटाकशी की जा रही है कि इससे मुख्य मुद्दे पीछे छुटते जा रहे हैं और सिर्फ शब्दों से खिलवाड़ सामने आ रहा हैं। इससे जनता को क्या मिलेगा?

                लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़से ने कांग्रेस के बलिदानों का बखान करते-करते कह दिया कि इंदिरा गांधी ने देश के लिए जान दी थी। प्रधानमंत्री देशभक्ति का दावा नहीं कर सकते, क्यों कि उनके परिवार से किसी कुत्ते ने भी ऐसा नहीं किया। यह हमारी संसदीय भाषा है तो जनसभा की भाषा का अंदाजा आप खुद ही लगा सकते हैं। अब बारी प्रधानमंत्री की थी। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रंधानमंत्री मोदी ने एक रात पहले आए भूकम्प पर चुटकी ली और इशारों-इशारों में इसे राहुल गांधी के बयान से जोड़ दिया। उन्होंने कहा चेतावनी तो कुछ दिन पहले दी गई थी, लेकिन कल रात भूकम्प आ ही गया। जब को सेवा और नम्रता से जोड़ेंगे तो भूकम्प आएगा ही। धरती कांपेगी ही। यहां तक तो सब नेचुटकी का मजा लिया, लेकिन फिर बात खड़से के कुत्तों के बलिदान पर आ गई। मोदी ने कहा कि हम कुत्तों वाली परम्परा से पले-बढ़े नहीं हैं। देश के करोड़ों लोग तब भी थे, जब कांग्र्रेस नहीं थी। सन 1857 का स्वतंत्रता संग्राम लोगों ने लड़ा था। तब भी कमल था, आज भी कमल है।

                जो बात प्रतिपक्ष नेता के तौर पर खड़गे ने कही वह शोभनीय भाषा कतई नहीं थी। जैसा प्रधानमंत्री मोदी ने जवाब दिया वह भी गरिमापूर्ण माना जाएगा, इस में संदेह है। खड़गे हों या मोदी दोनों की भाषा जनसभा की भाषा तो हो सकती है, लोकसभा की कदापि  नहीं। मोदी ने आप के सांसद भंगवत मान पर टिप्पणी की, कि चार्वाक ने भी उधार लेकर घी पीने की बात कही थी, वह दौर भी घी पीने का था। भंगवत मान रहते तो कुछ और पीने का कहते। दरअसल पंजाब के चुनाव के दौरान मान के शराबी हालात में वीडियो वायरल हुए थे। मान ने संसद से बाहर आ कर मीडिया से कहा कि यह प्रधानमंत्री की गरिमा गिराने वाला बयान है। राज्यसभा में फिर प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर कटाक्ष करते कहा कि बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाने की कला मनमोहन सिंह ही जानते हैं। इतने घोटाले हो गए और उन पर एक दाग नहीं लगा। इससे भड़की कांग्रेस राज्यसभा से वाकआउट कर गई और इस बात पर अड़ गई कि मोदी इस बयान पर माफी मांगे। मोदी का कहना है कि जब मनमोहन सिंह ने संगठित लूट कहा था, जब उन्हें सोचना चाहिए था।

                राहुल गांधी संसद में माजूद नहीं थे। मंख्यमंत्री अखिलेश के साथ यूपी में रैली कर रहे थे। उन्होंने वहीं से जवाब दिया कि मोदी ने प्राकृतिक त्रासदी का मजाक उड़ाया है। स्वतंत्रता संघर्ष का अपमान भी किया है। भूकम्प की बात और भाजपा की आंधी पर भी कहा कि सपा-कांग्रेस के गठबंधन के बाद ही यूपी में आंधी आ गई थी। प्रधानमंत्री के पास विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं है। इसी बीच कोई जनसभाओं में प्रधानमंत्री को रावण कह रहा तो कोई यमराज कह रहा है। ये भी नेताओं को शोभा नहीं देता। प्रधानमंत्री पर ऐसे कटाक्ष? ऐसी सोच से हम लोगों की नजरों में गिरेंगे ही, उठेगे नहीं । राजनीतिक फायदे के लिए सहानुभूति पाने के लिए कोई अपने भाई की हत्या भी करवा सकता है? यह भी यूपी की खुर्जा सीट पर देखने को मिला।

                अब देखो ना, कहने को योगी हैं पर राजनीति में रमे हैं और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर टिकी है। यूपी का चुनाव हो और राममंदिर की बात ना हो यह कैसे हो सकता है। योगी कह रहे हैं कि बावरी मस्जिद का ढ़ांचा रामभक्तों ने गिराया और रामभक्त ही राममंदिर बनाएंगे। क्या ऐसे ही राममंदिर के नाम पर प्रधानमंत्री मोदी चौदह वर्ष के बाद यूपी में भाजपा का बनवास खत्म होने के सपने देख रहे हैं? कुछ तो बड़ा सोचो यार……

लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

 

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