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हर जगह नकल माफिया अंजाम-ए-परीक्षा क्या होगा?

March 29, 2017 10:35 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

बोर्ड की परीक्षाओं के दिन आए, नकल की बहार लाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश के चुनाव में अखिलेश सरकार पर यह आरोप लगाया था कि नकल करवाने के लिए बकायदा टेंडर निकलते हैं। अब तो भाजपा सरकार है। अब शिक्षक ही नकल करवा रहे हैं। क्या अखिलेश जाते-जाते नकल माफिया को टेंडर दे गए? वैसे विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री मोदी जी, नकल एक सामाजिक बुराई के रूप में फल-फूल चुकी है, जिसका टेंडर ना अखिलेश देते हैं ना आप ही आपके योगी। नकल एक ऐसी बीमारी है या कह लीजिए दीमक है, जो बच्चों को अंदर ही अंदर खोखला किए जा रही है। स्वयं अभिभावक ही नकल करवाने में पूरी तरह शामिल होते हैं। परीक्षा बोर्ड शुरू होने से पहले परीक्षा डयूटी देने वाले स्टाफ की जानकारी जुटाते हैं। फिर उनकी हर इच्छा पूरी करने के साथ अपने होनहार का रोल नम्बर थमाते हैं। अब यह टेंडर किस ने उठाया? खुद अभिभावकों ने ही ना? इसमें मोदी, अखिलेश और योगी को दोष किसलिए?

                इन दिनों मीडिया में जो दृश्य दिखाए जा रहे हैं वे सब इसी नकल की वीरतापूर्ण कहानियां दिखाने वाले हैं। कैसे खिड़कियों से लटक रहे हैं, कैसे सुरक्षाकर्मी मुंह फेर कर डयूटी दे रहे हैं और कैसे नकल का खेल चलता रहता है। इन सब दृश्यों से हटकर हरियाणा के बेरी का दृश्य है। इसे देखकर आप भी चौंक जाएंगे। सरकार, प्रशासन और पुलिस को जो पुनीत कर्तव्य निभाना था, उसे निभा रही हैं नारी शक्ति सेवा समिति की स्वयंसेविकाएं। ये परीक्षा स्थल के बाहर बकायदा एक जैसी ड्रस में नकल रोकने के लिए पहरा दे रही हैं। इस तरह देखा जाए तो यह एक अनुकम्प उदाहरण है। अभिभावकों ने ही नकल का टेंडर उठाने से इंकार कर दिया और इस सामाजिक बुराई के खिलाफ पहला कदम उठाया। यह एक शुभ आरम्भ है और बेरी के कदम के साथ सबको अपने कदम मिलाने चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो नकल पर पूरी तरह नकेल कसी जा सकती है।

                बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए ऐसा कदम अनुकरणीय है। नकल ही करनी है तो इस कदम की नकल करें। बोर्ड परीक्षा की डयूटी वाला स्टाफ तो परीक्षा के दिनों में बढिय़ा मौज मस्ती के दिन मना कर चलता है। परीक्षा के बाद अच्छे होटल में स्टाफ को डयूटी का पूरा लुत्फ लेते देखा जा सकता है।

                मैने स्वयं शिक्षा क्षेत्र में लगभग डेढ़ दशक तक के अनुभव से अपनी व्यथा रखी है। बोर्ड परीक्षा से पूर्व अभिभावकों से नकल के बाद स्टाफ की खातिरदारी करने के लिए चंदा इक्ट्ठा किया जाता है। यानि जिन बच्चों को वर्ष भर पढ़ाने की जिम्मेदारी थी, उन्हें पढ़ाया नहीं और इसकी सजा भी अभिभावकों को ही क्यूं? चंदा भी वहीं दें और स्टाफ के साथ होटल में मौजमस्ती करें, यह कैसी शिक्षा और कैसी परीक्षा?

                जब स्कूल की कमान संभालने का अवसर मिला, तब मैने अभिभावकों से नकल करवाने के लिए नाम पर लिया जाने वाला चंदा बंद करवा दिया। साथी टीचर्स ने पूछा कि फिर पैसा कहां से आएगा? मैने कहा यह सजा आपकी है, आप भुगतो। जिन बच्चों के बल पर सालभर में मोटा वेतन पाते हो तो परीक्षा के दिनों से क्यों डरते हों? खुद के पैसे से खर्च करों, अपने बच्चों के लिए भी तो करते हों, फिर ये छात्र किसके हैं? मित्रों, मैंने जब स्कूल से और शिक्षाक्षेत्र से इस्तीफा दे दिया, तब कहा गया कि चलों गांधी से पीछा छुटा। शिक्षक गांधी बनें, अभिभावक बोर्ड के बाहर परीक्षा के प्रहरी बनें, तो नकल कैसे नहीं रूकेंगी।

kamlesh-bhartiyaलेखक परिचय

कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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