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अभिव्यक्ति पर खतरे और प्रेस दिवस  

November 16, 2017 8:02 am by: Category: इतिहास खास Leave a comment A+ / A-

राष्ट्रीय प्रेस दिवस। यानि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी और निष्पक्षता की याद दिलाने वाला दिन। यूं तो मीडिया का अर्थ मीडियम या माध्यम होता है यानि समाज के विभिन्न वर्गों, सत्ता केन्द्रों, व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच पुल का जो काम करे। मीडिया को समाज का दर्पण (आइना) भी माना जाता है, क्योंकि मीडिया से जनता को समाज की हू-ब-हू तस्वीर समाज के सामने पेश करने की अपेक्षा होती है। भारत में 16 नवम्बर यानि आज ही के दिन हर साल मनाए जाने वाले राष्ट्रीय प्रेस दिवस का उद्देश्य भी प्रेस स्वतंत्रता की रक्षा और पत्रकारिता में उच्च आदर्श कायम करना होता है।

इतिहास पर गौर करें तो सबसे पहले ये दिन प्रेस परिषद की ओर से 4 जुलाई 1966 को मनाया गया। जिसके बाद हर साल 16 नवंबर को ये दिन मनाया जाने लगा। विश्व में आज लगभग 50 देशों में प्रेस परिषद या मीडिया परिषद है। भारत में प्रेस को ‘वाचडॉग’ और प्रेस परिषद इंडिया को ‘मोरल वाचडॉग’ कहा गया है। प्रथम प्रेस आयोग ने मीडिया के वांछित उद्देश्य को लेकर 4 जुलाई, 1966 को प्रेस परिषद की स्थापना की, जिसने अपना विधिवत काम शुरू किया 16 नवम्बर 1966 को।

1966 के 16 नवंबर से लेकर एक निश्चित उद्देश्य को दोहराते आज 51 साल बीत चुके हैं लेकिन मीडिया को लेकर चुनौतियां जस की तस पड़ी हैं। आज जो वास्तव में पत्रकार कहलाने के हक़दार हैं, उन्हें उपेक्षाओं का, विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वे फ्रीलांसर बन कर काम करने को मजबूर हैं, और जिन्हें कलम पकड़ने का ज्ञान नहीं, वे खुद को कलमकार बनाते डोल रहे हैं। संस्था चाहे मीडिया की कैसी भी रही हो, आज मीडियाकर्मी को सबसे ज्यादा समस्या झेलनी पड़ रही है।

सर्वप्रथम छोटे चैनलों की आर्थिक स्थिति का खामियाजा उसके अंदर काम करने वालों या पत्रकारों को भुगतना पड़ता है जिससे पत्रकार पर पारिवारिक तथा मानसिक दोनों तरह का दबाव पड़ता है। वास्तविकता में आज किसी भी पत्रकार की नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। शाम को ऑफिस से घर पहुंचा, और सुबह बिना बताए ही नौकरी से निकाल दिया गया। पत्रकारों की भरमार और संसाधनों की कमी के चलते यहां मेहनत, प्रतिभा और काम के अनुसार प्रमोशन भी नहीं मिल पाता।

समाज का आयना कहे जाने वाले मीडिया के ‘सपने’ यानि ‘अपेक्षापरक उद्देश्य’ आज टूटते जा रहे हैं। मौजूदा पत्रकारिता के व्यापक क्षेत्र से आज सूचनात्मक, शिक्षाप्रद और मनोरंजनात्मक संदेश ही नहीं बल्कि उससे तथ्यपरकता, यथार्थवादिता, संतुलन और वस्तुनिष्ठता की भी उम्मीद होती है। लेकिन बाजार बनते जा रहे संचार माध्यम कभी बाजार ही बन जाते हैं तो कभी सियासत की साफ झलक इनमें नजर आने लगती है। इतना ही नहीं वर्तमान दौर में अभिव्यक्ति को लेकर आज भी मीडिया स्वतंत्र नहीं है। चाहे छत्रपति हत्याकांड हो, दाभोलकर, कलबुर्गी, पनसारे और गौरी लंकेश सरीखे लेखकों-पत्रकारों की हत्याएं हो या फिर अविजित रॉय जैसे ब्लॉगरों की हत्या, ये तमाम मौतें आज भी सिहरन पैदा कर देती हैं।

भारत की ही एक चर्चित समाचार वेबसाइट व मीडिया वॉचडॉग द हूट की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 से लेकर 2017 की पहली तिमाही तक 50 से भी ज्यादा पत्रकारों पर हमलों की घटनाओं को दर्ज किया गया है। साईट के मुताबिक 2016 में 31 बार इंटरनेट बंद किया गया तो वहीं इस साल के पहले छह महीनों में 14 बार नेट की सेवा बंद की गई। तो वहीं इसके अलावा राजद्रोह, मानहानि और फिल्म और अन्य कलाओं की सेंसरशिप के मामलों में पिछले सालों में काफी बढ़ोतरी देखी गई।

हाल में हरियाणा के सोनीपत डीपीआरओ की ओर से समस्त ब्यूरो चीफ, संवाददाताओं एवं छायाकार बंधुओं के लिए जारी एक पत्र के अनुसार उन्होनें सीएम से किसी भी कार्यक्रम के दौरान उचित दूरी बनाए रखने और बार-बार सवाल न करने की हिदायत दी है। सवाल ये उठता है कि जिस लोकतंत्र में तमाम तरह की चीजों, कायदे-कानूनों, योजनाओं, बजट इत्यादि के बारे में जानने का जो हक जनता को है वो छीने जाने के रूप में ही इस पत्र को देखा जा सकता है। लेकिन क्या लोकतंत्र में ये सब जायज है, अगर नहीं तो ऐसे तमाम मुद्दों पर पत्रकारों के साथ-साथ जनता को भी प्रेस के साथ खड़े होने की जरूरत है, ताकि अवाम की हर समस्याओं का जवाब और हल उन्हें मिल सकें। आज प्रेस दिवस के मौके पर मीडिया की जिम्मेदारी और निष्पक्षता के साथ-साथ राजनीति के संबंध में प्रेस से जुड़े तमाम बिंदुओं पर भी हम सब को गौर करने की जरूरत है।

( लेखक हरियाणा खास के कंटेंट एडिटर हैं)

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