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नक्सलवाद की जड़ क्या है? सोचो और पढ़ो?

April 28, 2017 11:49 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

कल दैनिक अख़बार के पहले पेज पर खबर पढ़ी।

4 हजार आदिवासियों ने अपने पारंपरिक हथियारों के साथ ब्राजील की संसद पर प्रदर्शन किया।    पोलिस ने पानी की बौछार छोड़ी व् बल प्रयोग किया। अख़बार ने एक बहुत बड़ा फोटो आदिवासियों का लगाया हुआ था जिसमें वो अपने पारम्परिक हथियार धनुष, गुलेल, भाला लिए हुए थे।

उनकी मुख्य मांग थी की सरकार पूंजीपतियों के फायदे के लिए फ़ोर्स की मद्दत से हमारे जंगलों पर कब्जा करना बन्द करे। वो हम आदिवासियों को जंगल से विस्थापित करना चाहती है। वो हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहती है। वो ये सब प्राकृतिक संसाधनों जल-जंगल-जमीन पर कब्जे के लिए कर रही है। इसके विरोध में उन्होंने संसद पर प्रदर्शन किया। जिसको मिडिया ने संसद पर हमला दिखाया। ये ही बराबर हालात विश्व के सभी मुल्कों के है। आज विश्व के सभी मुल्कों में सरकारे पूंजीपतियों के फायदे के लिए अपने-अपने मुल्कों के आदिवसियों, किसानों, मजदूरों को उजाड़ रही है। उनकी संस्कृति को खत्म कर रही है। इस सब के पीछे सिर्फ एक ही कारण है कि जल-जंगल-जमीन पर लुटेरे पूंजीपति का कब्जा करवाया जा सके ताकि लुटेरा पूंजीपति जल-जंगल-जमीन का दोहन कर सके, प्राकृतिक संसाधनों को लूट सके। कोयला, लोहा, अबरक, सोना गैस की खाद्यानों पर कब्जा कर सके। ये सब दुनियां का सबसे मजबूत लोकतंत्र होने का दावा करने वाला अमेरिका अपने खुद के देश में भी कर रहा है और चाहे राजशाही देश हो वो भी ये सब ऐसे ही कर रहा है। पाकिस्तान का बलूच राज्य का मामला हो या भारत के आदिवासी राज्यो छतीसगढ़, झारखंड या महारष्ट्र का मामला हो। सभी जगहो पर उन देशों की सरकारे साम्राज्यवादी देशों और पूंजीपतियों के लिए आदिवसियों को उजाड़ रही है। पुरे विश्व में सरकारों और आदिवासियों के मध्य एक अघोषित युद्ध चल रहा है।

आदिवसियों को उजाड़ने के लिए सभी मुल्क अपनी पोलिस और फ़ोर्स का इस्तेमाल कर रहे है। अपने मुल्क भारत में भी 3 दिन पहले हुआ फ़ोर्स पर माओवादी हमला जिसमें 25 जवान हताहत हुए इस अघोषित युद्ध का ही परिणाम है और ये कोई पहला हमला नही है इससे पहले भी दोनों तरफ से कभी आदिवासी तो कभी सैनिक मरते रहे है। कालांतर में भी कोई सार्थक उम्मीद नही दिखाई दे रही की ताकि इस अघोषित युद्ध को बंद किया जा सके। इस युद्ध में दोनों तरफ से मरने वाले मजदूर-किसान के बच्चों को बचाया जा सके। इस युद्ध के मूल जड़ में कोई नही जाना चाहता है।

 क्योकि मूल समस्या है साम्राज्यवादी देशो और पूंजीपतियों द्वारा जल-जंगल-जमीन की लूट, प्राकृतिक संसाधनों की लूट। अब सरकार क्यों जायेगी इसके मूल में क्योकि उसको चुनाव में लाखो करोड़ की फंडिंग ये ही लुटेरे पूंजीपति करते है। न फ़ोर्स मूल में जाना चाहती क्योकि अफसरों को मोटा कमीशन पूंजीपतियों से मिलता है। 350 अरब की मोटी धनराशि हर साल नक्सल उन्मूलन के नाम पर छतीसगढ़ के 8 जिलों को मिलती है। उसमें इन सब का हिस्सा है। वैसे भी फ़ोर्स का वेतन सरकार देती है तो मूल में जाना मतलब सरकार के खिलाफ जाना है। मिडिया पूंजीपति लुटेरों का ही है तो वो भी नही जायेगा। मूल में जाने का काम मेहनतकश जनता का है, उन सैनिको के परिवारों का है जिनके बच्चे मारे जा रहे है, किसान मजदूर का है लेकिन वो सब भी मिडिया से संचालित है। जो मिडिया ने बोला वो सच मान कर आगे बढ़ गए।

एक बहुत बड़ा तबका है जो पढ़ा-लिखा है जो अच्छे से इस समस्या को समझ सकता है वो है सरकारी कर्मचारी जो मजदूर-किसान परिवार से आता है वो भी इस समस्या के मूल में नही जाना चाहता क्योकि उसको मोटा वेतन सरकार ही देती है और समय-समय पर उस वेतन में बढ़ोतरी करती रहती है। इसलिए वो भी सरकार के खिलाफ नही देखना चाहता। देश के छात्र-नोजवान, मजदूर, किसान अगर अंधराष्ट्रवाद का चश्मा उतार कर आगे आये तो कुछ सार्थक परिणाम निकल सकते है।

इन सब की अनदेखी के चलते पूंजीपति अपनी लूट जारी रखे हुए है। वो ही इस युद्ध का मास्टर माइंड है लेकिन वो इस अघोषित युद्ध के पर्दे के पीछे रहता है। उसने अपनी लूट को जारी रखने के लिए सरकार और सामंती गुंडों से गठजोड़ किया हुआ है।

अब युद्ध के एक छोर पर आदिवासी+देश का बुद्विजीवी व् दूसरे छोर पर पूंजीपति पर्दे के पीछे, सामने सरकार (फ़ोर्स+पोलिस+सरकारी अमला) +मिडिया+सामंती गुंडे+धर्म+जाति+अंधराष्ट्रवाद है।

 पूंजीपति के इशारे पर सरकार अपने अमले को पूरी छूट देती है कि वो कैसे भी आदिवासियों को विस्थापित करे। इसके लिए वो कभी सलवा झुडुम चलाती है तो कभी ग्रीन हंट चलाती है। इन सभी ऑपरेशनों में सरकार और उसके साथी मानवाधिकार उलघ्न की सभी सीमाएं लाँघ देते है। उनको ये सारी सीमाएं लांघने की इजाजत अप्रत्यक्ष तौर पर सत्ता देती है ताकि आदिवासियों में डर बैठाया जा सके। आदिवासियों के घर जलाने, फ़ोर्स द्वारा अनगिनित महिलाओं, बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार  करने, झूठे इनकाउंटर करने आम घटनाएं बन जाती है। अभी पिछले दिनों की तो बात है जब एक महिला को गांव से उठाया उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। उसको 11 गोलियां मारी फिर एक माओवादियों वाली वर्दी पहनाई, हाथ में बन्दूक थमाई। कमाल की बात ये थी की उस वर्दी में एक भी सुराग नही था। मामला हाईकोर्ट में है।

सत्ता के नशे में आज आप जिसको रौंद रहे हो। वो रौंदे हुए जिस दिन इकठ्ठा होकर हमला करते है तो जुल्म की हस्ती मिटा देते है।”

 झूठे मुकद्दमो में लाखों लोगो को जेल में डाला जाना भी आम घटना बनी हुई है। जेल में इतनी ज्यादा भीड़ है कि कैदियों को सोने के लिए भी शिफ्टों में सोना पड़ता है।

इस लड़ाई में जान-मॉल का नुकशान दोनों तरफ से ही आम जनता का हो रहा है। इसलिए क्या देश की आम जनता का फर्ज नही बनता है कि वो कोशिश करे की जितना जल्दी हो ये युद्ध बन्द हो। इसके लिए क्या आम जनता ने प्रयास नही करने चाहिए। क्या सत्ता पर दबाव नही बनाना चाहिए। क्या सरकार से सवाल नही पूछना चाहिए की क्यों पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए आदिवासियों और फ़ोर्स के जवानों को आपस में लड़वा रही है। क्यों देश की जनता के खिलाफ जंगलों में 1 लाख फोर्स को तैनात किया हुआ है। सेना और पोलिस के जवान नैतिकता के आधार पर पूंजीपतियों के लिए लड़ने से क्यों न मना कर दे। क्योकि सेना और पोलिस जनता की रक्षा के लिए है न की लुटेरे पूंजीपतियों के लिए।

(जब मानवाधिकार कार्यकर्ता सरकारी सुरक्षा बलों और पुलिस द्वारा आदिवासियों की हत्या का मामला उजागर करते हैं, तो भक्तगण तुरंत आकर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से कहते हैं कि तुम तब क्यों नहीं बोलते जब नक्सली मारते हैं?

आजकल भक्तगणों के साथ कुछ पुलिस वाले और अर्धसैनिक बलों के अफसर भी फेसबुक पर आकर हमसे ऐसी ही बातें कहते हैं, हम नक्सलियों और सरकार को एक ही बराबर नहीं मान सकते, ऐसा नहीं हो सकता कि हर बार सरकार की क्रूरता और बलात्कार पर सवाल उठाने के लिये हमें नक्सलियों की भी निन्दा करनी पड़ेगी, हम एक बार स्पष्ट कर चुके हैं कि हम संवैधानिक राजनैतिक लड़ाइयों के समर्थक हैं, इस लिये सरकार के अपराधों को उजागर करते समय हर बार उस बात को दोहराने की हमें कोई ज़रूरत नहीं है, हम सरकार को टैक्स देते हैं, वोट देते हैं, कोर्ट में जाते हैं, मतलब हम सरकार का ही हिस्सा हैं, अब मेरे वोट से, मेरे टैक्स के पैसे से तनख्वाह लेकर सिपाही अगर आदिवासी महिला से बलात्कार करेगा तो मुझे उस पर आपत्ति करने का अधिकार है या नहीं ?

मैं अगर आपत्ति करता हूँ कि मेरे वोट से बनी सरकार का सिपाही, मेरे टैक्स के पैसे की बन्दूक लेकर, मेरे पैसे की वर्दी पहन कर मेरे पैसे से तनख्वाह लेकर मेरे ही देश की आदिवासी लड़कियों से बलात्कार नहीं कर सकता, तो मुझसे यह नहीं कहा जा सकता कि पहले तुम नक्सलियों के विरुद्ध बोलो, वर्ना हम तुम्हें नक्सली समर्थक घोषित कर देंगे, बाज़ार में यदि कोई सिपाही किसी की जेब काट रहा हो, और मैं उसे पकड़ लूं तो वह सिपाही यह नहीं कह सकता कि तुम पहले दुनिया के सभी जेबकतरों की निन्दा करो बाद में मुझे कुछ कहना, जनता की ज़मीन बन्दूक के दम पर छीनना सरकारों का पुराना काम है, यह काम तब भी चलता था जब नक्सलवादी नहीं थे, और आज भी जहां नक्सलवादी नहीं हैं वहां भी पुलिस बन्दूकों के दम पर ही ज़मीन छीनती है, राजधानी की नाक के नीचे भट्टा पारसौल में भी ज़मीन के लिये किसानों के घर जलाये गये थे।)*1हिमांशु कुमार

इस युद्ध को रोकने के लिए आम जनता को जितना जल्दी हो आगे आकर मांग करनी चाहिए।

अपनी सरकार पर दबाव बनाना चाहिए की इस युद्ध को रोकने की कोशिश करे।

साम्राज्यवादी मुल्कों और देश के पूंजीपतियों से जितना जल्दी हो सरकार अपना नापाक गठजोड़ खत्म करे।  ईमादारी से माओवादियों से शांति समझौता करने की कोशिश करे।

लुटेरे पूंजीपतियों की प्राकृतिक संसाधनों की लूट को फौरन बन्द किया जाये।

आदिवासी जो विस्थापित हो गए है उनको उनकी जगह वापिस बसाया जाये व उनको इसके लिये आर्थिक सहायता दी जाये।

मानवाधिकार हनन के जिम्मेदार पूंजीपतियों, सामंती गुंडों और फ़ोर्स के जवानों व अफसरों को सजा दिलाने के लिए सरकार मजबूती से आदिवासियों की मद्दत करे।

झूठे मुकदमो में बंद आदिवासी नौजवानों को सरकार जल्द रिहा करें।

जंगल से फ़ोर्स को वापिस बुलाया जाये।

आम जनता इस युद्ध रोकने की मुहीम को जितना लेट करेगी इस युद्ध में उतना ही नुकशान दोनों तरफ से आम जनता का बढ़ता जायेगा।


लेखक परिचय

उदय चे पूर्व छात्र नेता हैं स्वतंत्र रूप से लेखन कार्य करते हैं। सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं। दलित एवं पीड़ितों के हक की आवाज़ अपने संगठन के माध्यम से उठाते रहते हैं। उदय चे हिसार के हांसी में रहते हैं।

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

नक्सलवाद की जड़ क्या है? सोचो और पढ़ो? Reviewed by on . कल दैनिक अख़बार के पहले पेज पर खबर पढ़ी। 4 हजार आदिवासियों ने अपने पारंपरिक हथियारों के साथ ब्राजील की संसद पर प्रदर्शन किया।    पोलिस ने पानी की बौछार छोड़ी व् बल कल दैनिक अख़बार के पहले पेज पर खबर पढ़ी। 4 हजार आदिवासियों ने अपने पारंपरिक हथियारों के साथ ब्राजील की संसद पर प्रदर्शन किया।    पोलिस ने पानी की बौछार छोड़ी व् बल Rating: 0

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