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डेरा सच्चा सौदा सिरसा के भक्तों को खुला खत

अपील भी कुछ सवाल भी

August 25, 2017 12:03 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

धन धन सतगुरु तेरा ही आसारा,

सतगुरु की प्यारी साध संगत बड़े व्यथित मन से इस खत के जरिये आपसे संवाद कर रहा हूं। डेरामुखी संत गुरमीत राम रहीम जिन्होंनें आपको अपनी शरण में लेकर इंसा बनाया। इंसा यानि इंसान इंसान यानि इंसानियत, मानवता आदि आदि। बहुत अच्छा लगता है जब बाढ़ पीड़ितों की मदद करते हैं। बहुत कम लोग होते हैं समाज में जो इस तरह के अवसर पर स्वार्थ को भूलकर मनुष्य के प्रति संवेदना प्रकट करते हुए सहायता के लिये हाथ आगे बढ़ाते हैं। बहुत अच्छा लगता है जब रक्तदान शिविर लगाकर आप सारे रिकॉर्ड तोड़ देते हैं और कुछ ही क्षणों में बहुत सारे लोगों का जीवन बचा लेते हैं। बहुत अच्छा लगता है जब शहर, गांव की गंदगी को साफ करने के लिये संगत हाथों में झाड़ू लिये सिर पर तसळे, टोकरी लिये निकलती है और देखते ही देखते पूरा इलाका चमका देती है। बहुत अच्छा लगता है जब सब मिलकर कुछ समय सतगुरु को याद करते हैं और विषय वासनाओं, कामनाओं से दूरी बनाकर प्रभु का स्मरण करते हैं और अपनी आत्मा का शुद्धिकरण करते हैं। आपके विश्वास, आपकी मान्यता का मैं सम्मान करता हूं भले ही संत गुरमीत राम रहीम मेरे लिये एक वो सब नहीं है जो आपके लिये है। भले ही मेरा विश्वास, मेरी मान्यता आपके विश्वास और मान्यता से भिन्न है लेकिन फिर भी मैं आपके विश्वास की कद्र करता हूं क्योंकि आपको वहां से तसल्ली मिली है। किसी मुश्किल की घड़ी में हो सकता है जब कहीं ओर से कोई सहारा न मिला हो तो आपको वहां से मिला हो। लेकिन इन सबके बावजूद कुछ चीज़ें हैं जो मुझे कचोटती हैं। मसलन पुराने जमाने के संत कहा करते थे कि ‘संतन को कहां सिकरी सो काम’ यानि संतो का राजनीति से क्या लेना देना वे तो भगवान के भेजे दूत मात्र होते हैं, संदेश वाहक, मैसेंजर ऑफ गॉड। लेकिन डेरे की राजनीतिक शाखाएं हैं। किस राजनीतिक पार्टी के साथ जाना है किसके साथ नहीं जाना इसका निर्णय लिया जाता है। निर्णय भी कभी कांग्रेस सच का साथ देने वाली पार्टी हो जाती है तो कभी बीजेपी में सच नज़र आने लगता है। यह क्या है? कबीर, रैदास, दादू, गरीबदास अधिकतर संतों ने मोह, माया का त्याग करने के संदेश दिये और जीवन पर्यन्त उसी रहन-सहन, सहज भक्ति की मिसाल भी पेश की अर्थात स्वयं वे काम, क्रोध, मोह, लोभ और अंहकार से दूर रहे। लेकिन अभी हम क्या देख रहे हैं कि डेरे की संपत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। डेरे के उत्पाद बनाकर संगत में बेचे जा रहे हैं। यहां तक कि डेरे में उगी फल सब्जियों का जब वितरण होता है तो उनकी कीमत कई गुणा बढ़ी होती है उन्हें प्रसाद रूप में या किसी अन्य रूप में ज्यादा कीमत देने वाले को दिया जाता है। यदि कोई भी थोड़ी सी असहमति जतादे तो प्रेमीजन अपना आपा खो बैठते हैं। मरने मारने पर उतारू हो जाते हैं जैसा अक्सर धार्मिक कट्टरपंथियों में ही देखने को मिलता है। क्या किसी भी साधुजन का क्रोध करना उचित है? इस तरह क्या वह अपने अंतिम उद्देश्य गुरु के बताये मार्ग पर चलते हुए जिसकी पहली शर्त ही काम क्रोध मोह लोभ अंहकार आदि पांच विकारों पर काबू पाने की होती है, उसे निभा पाते हैं।

अब बात करता हूं संत गुरमीत राम रहीम इंसा पर चल रहे मुकदमों की, यह तो बड़े बुजूर्ग कहते आये हैं कि भगत और जगत का बैर होता है यानि सच्चाई के मार्ग पर चलने वाले का पूरा जमाना दुश्मन होता है लेकिन कहा यह भी जाता है कि सत्यमेव जयते अर्थात सच्चाई की जीत होती है। क्या आपको इस पर यकीन नहीं है। यदि पीड़ित साध्वी एवं जिस रणजीत की हत्या हुई जो कि आपमें से ही कभी एक हुआ करते थे। उस पत्रकार (रामचंद्र छत्रपति) की हत्या हुई जो इन घटनाओं को अपने अखबार के जरिये सामने लाये उनके परिजनों की शिकायत, सीबीआई जांच और बाबा पर लगे आरोपों से आप क्यों घबरा रहे हैं। ये हत्याएं क्यों हुई ?  किसने करवाई?

क्या आप अपने गुरु को इतना कमजोर समझते हैं? क्या भगवान के दूत इतने कमजोर होते हैं कि उन्हें अपने आपको सही साबित करने के लिये भक्तों को ढ़ाल की तरह इस्तेमाल करने की आवश्यकता होती है? क्या उन्हें या आपको देश के कानून पर भी विश्वास नहीं है, उस देश के कानून पर जिसके मंत्री, संतरी उनके यहां मत्था टेकने आते हैं। जिन सरकारों को चुनने में आपकी अहम भूमिका होती है। क्यों आपको नियंत्रित करने के लिये देश के आतंकियों या दुश्मनों से रक्षा करने वाली सेनाओं की तैनाती की जाती है? आप इतने हिंसक क्यों समझे जाते हैं? क्यों नहीं आप धारा 144 का मान रखते हैं? क्यों उच्च न्यायालय को आदेश जारी करने पड़ते हैं कि कानून की सही से पालना नहीं हो रही है? एक बात बताएं क्या आपको अपने गुरु पर विश्वास है? क्या आप उन्हें सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी ईश्वर का रूप मानते हैं? यदि मानते हैं तो फिर क्या आपमें इतना सामर्थ्य है कि आप उनकी रक्षा कर सकें? यदि हां तो आपका विश्वास कैसा है आप खुद सोचिये और यदि नहीं तो फिर आप इतने उग्र क्यों, इतने उद्वेलित क्यों हो रहे हैं?

मैं यह बात इसलिये भी कर रहा हूं भले ही आप शांतिपूर्ण ढंग से अपने गुरु के दर्शनाभिलाषी बनकर उनकी राह देख रहे हों लेकिन कुछ शरारती तत्व अक्सर ऐसे मौकों की तलाश में होते हैं कि कब उन्हें दो-दो हाथ करने का मौका मिले। हाल में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान शरारती तत्वों की करतूत देखी होगी आपने जातीय जहर जो आपके आस-पास घुल चुका है उससे आप भी अंजान तो नहीं होंगे। उस दौरान पैदा हुए हालातों से जो नुक्सान हुआ है उसकी भरपाई शायद ही हो पाये। फिर आप क्यों इन शरारती तत्वों को मौका देना चाहते हैं? कानून को अपना काम सही ढ़ंग से करने क्यों नहीं देते? सत्य का पाठ पढ़ाने वाले अपने गुरु पर विश्वास रखें।

इतना ही नहीं मेरी सतगुरु जी से भी यह अपील है यदि बच्चे बहक जायें चूंकि आप उन्हें पिताजी मानते हैं तो आप उनकी संतान ही हुए तो जब बच्चे बहक जायें या गलत राह पकड़ लें, गलत जिद्द करने लगें तो उन्हें एक बार समझाने का कर्तव्य बनता है? यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो विरोध करने वालों को लगेगा कि यह तो भक्तों के कंधे पर रखकर बंदूक चला रहे हैं? अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप इसे किस तरह से ले रहे हैं। मेरा इरादा कतई भी आपको किसी तरह कमतर आंकना या फिर आपकी भावनाओं को आहत करने का नहीं है मैं बस इतना कहने का प्रयास कर रहा हूं आपने अपने नाम के पिछे जो इंसा शब्द लगाया है कृपया उसकी मर्यादा का पालन करें। आपकी, आपके मार्ग की, डेरे की, गुरु की इज्जत, प्रतिष्ठा आपके हाथों में हैं। ना ही कोई ऐसा कदम उठाएं जिससे आप या आपके गुरु पर सवाल उठें। मसलन एक बहन की वीडियो बड़ी प्रचारित हो रही है जो इंडिया यानि अपने भारत का नाम नक्शे के गायब करने के दावे कर रही है। ऐसी भटकी हुई संगत को मार्ग पर लायें। देश और देश का संविधान, देश का कानून सर्वोपरि है। आपके नाम पर कोई अपना स्वार्थ सिद्ध न करने पाये। कोई इस समय बारूद पर बैठे प्रदेश को आग न दिखा पाये। अन्यथा जो अंजाम होगा वह आप सब जानते हैं।

जगदीप सिंह

पूर्व एसिस्टेंट प्रोफेसर 

शाह सतनाम जी ब्वॉयज़ कॉलेज सिरसा।

संपादक हरियाणा खास।

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