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पंडित मांगे राम – आज ही मिले थे गंगा जी के खेत में

November 16, 2016 12:47 pm by: Category: खबर खास, शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-
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चित्र के कलाकार राजेश रंजन जी हैं जिसे रोशन वर्मा जी की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है

हरियाणा सिर्फ एग्रीकल्चर ही नहीं बल्कि कल्चर की भी महान विरासत को संजोए हुए है… हरियाणवी संस्कृति की इस महान विरासत का हिस्सा हैं हमारे लोकनाट्य….. यानि सांग और सांगों से जुड़े हमारे सांगी या कहें लोक कलाकार…. लोक कथाकार ….लोक नाटककार…. जितनी भी उपमाएं उन महान आत्माओं को लगाएं कम ही पड़ेंगी …. आज एक एसी ही महान आत्मा का महान हस्ती का जिक्र हम यहां करेंगें जिन्होंने देश भक्ति से लेकर प्यार महोब्बत और घर गृहस्थी को ठीक ढंग से चलाने का संदेश अपने भजन रागनियों के जरिये दिया जो सूर्य कवि पंडित लख्मीचंद के शिष्य रहे और गुरु के समान ही नाम भी कमाया आप समझ गए होंगे की बात हो रही है पंडित मांगे राम की….

 

पंडित मांगेराम का जन्म बाजे भगत जैसे महान सांगी के गांव सुसाना में 1906 में हुआ था लेकिन इन्हें नाना ने गोद ले लिया था जिसके कारण इनका लालन-पालन पाणची गांव में हुआ। ये सांगों के तगड़े आशिक थे और सांगों को सुनने और गाने के प्रति उनकी यह आशिकी उन्हें सांग सम्राट सूर्य कवि पंडित लख्मीचंद की शरण में ले आई। पंडित लख्मीचंद बड़े कठोर स्वभाव के थे उनसे मंच पर किसी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं होती थी हाथ में एक कामची भी रखते एक दिन वो पंडित मांगे राम को पड़ गई अब गुरु कठोर है तो शिष्य भी कुछ कम स्वाभिमानी नहीं था उन्होंने पंडित लख्मीचंद से अलग हो खुद की मंडली बना ली कहा तो ये भी जाता है शुरुआत में तो उन्होंने लख्मीचंद की छाप नहीं लगाने का फैसला किया था। लेकिन उनके करीबी बताते हैं कि कई वर्ष तक वे निःसंतान रहे फिर उन्होंनें गुरु की छाप अपने भजन-रागनियों में लगानी शुरु की तो उनके आंगन में किलकारी गूंजी। इसके बाद तो पंडित जी ने एक भी रागनी एक भी किस्सा एक भी भजन एसा नहीं लिखा और गाया जिसमें पंडित लख्मीचंद का नाम ना लिया गया हो.. पंडित मांगे राम की शख्सियत कमाल की थी वे शरीर से तो बलिष्ठ थे ही साथ ही उनकी आवाज को भी लोग दूर दूर से सुनने के लिए आते थे। पंडित मांगे राम ने लिखा भी गजब है उनकी एक एक बात आज भी समाज को मार्गदर्शन देने का काम करती है लोग तो आज भी उनकी रागनियों की पंक्तियों को उदाहरण की तरह पेश करते हैं

किसनै देख्या सुरग भरथरी आपां मरे बिना….

क्यूकर आज्या सबर आदमी कै पेटा भरे बिना..

पंडित जी के किस्सों की खास बात होती थी उनका अनुभव… व्यक्तिगत जीवन में उन्होंने दो शादियां की….. उनके किस्सों में ये पारिवारिक झलक कहीं ना कहीं देखने को मिल जाती है। पंडित मांगे राम की खास बात ये भी है कि उनके भजन रागनियों की धुनों में लोकगीतों की महक आती है… गोकुल गढ तै री वा चाली गुजरिया हो राम हो या फिर भरण गई थी नीर….. हरियाणवी जनमानस के बारे में रीति रिवाजों के बारे में उनकी गहरी समझ थी नोरत्न किस्से मे जब नौरत्न शादी कर लौटने लगता है और पती पत्नी जब जहाज में सवार होते हैं तो नौरत्न अपनी पत्नी से पूछता है

कोण थी वा फेरयां पर कै ओळी सोळी जा थी

उठै था सुसाटा जणूं नई गोळी जा थी

इतने ठेठ अंदाज में अभिव्यक्ति पंडित मांगेराम ही कर सकते थे…. इसमें उनका कोई सानी नहीं है। इसी किस्से की एक और रागनी जो बहुत प्रसिद्द हुई….. आज भी है… और हमेशा रहेगी…

जहाज के म्हां बैठ गोरी राम रटकै

ओढणा संगवाले तेरा पल्ला लटकै

पंडित जी ने ज्ञान की बातें या कहें धार्मिक उदाहरण भी लोगों के सामने अच्छे से पेश किए हैं। अन्याय को सहन ना करने की आवाज भी पंडित मांगे राम ने उठाई भले ही वह भाभी की सीख मानकर एक बड़े भाई ने अपने छोटे भाई के साथ किया हो पिंगला भरथरी के किस्से की ये फेमस रागनी है कई लोग तो इसे आज भी महिलाओं के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं

आज का बोल्या याद राखिये विक्रम भाई का

धरती पर तै खो देगा तनै बहम लुगाई का

धरती पर तै खो दे गा तनै बहम लुगाई का…. ये बात विशेष परिस्थिति में किस्से की खलनायिका के लिए कही गई है लेकिन इसे हमेशा से नकारात्मक रूप से महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता रहा है…. समाजिक नजरिये को महिला विरोधी बनाने में इस तरह के गीतों की भूमिका पर शोध भी किया जा सकता है। इसके अलावा पंडित जी की एक खास बात और है नायिकाओं के रुप रंग नैन नक्स की तारीफ तो लगभग सभी सांगियों ने की लेकिन एक पुरुष चरित्र के श्रृंगार का वर्णन जैसा पंडित मांगे राम ने किया वैसे कहीं और नहीं मिलता उदाहरण हीर रांझा किस्से में मिल जायेगा जब कवि कहते हैं

बाबा जी तेरी स्यान पै बेमाता चाळा करगी

पंडित जी ने मानवीय संवेदनाओं को जिस रुप में पेश किया वे काल्पनिक नहीं बल्कि जीवन से जुड़ी लगती हैं एक यथार्थ उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है लेकिन जहां कल्पना करने की…. सपने गढने की बात आती है तो उसमें भी पंडित जी माहिर हैं। देश की आजादी का आंदोलन चल रहा था…. अंग्रेजी सेना में भर्ती होने के संदेश भी सांगियो ने कलाकारों ने दिए लेकिन देश के वीर शहीदों को सलाम किसी ने किया हो इसके उदाहरण न के बराबर हैं। किसी की कलम देशभक्तों पर क्रांतिकारियों पर नहीं चली उस दौर में एक प्रकार से अकेले क्रांतिकारी लेखक होने का गौरव भी पंडित मांगे राम को दिया जा सकता है जिन्होंने शहीद भगत सिंह के जीवन पर पूरा किस्सा तैयार किया। हालांकि किस्से में भगत सिंह को भगवान को मानने वाला दर्शाया गया है जबकि व्यक्तिगत जीवन में शहीद भगत सिंह नास्तिक थे और धर्म की शिक्षाओं को अपनाने का संदेश उन्होंने दिया और बाह्याडंबरो का विरोध किया। पंडित मांगे राम ने सामाजिक, धार्मिक, देशभक्ति, उपदेशक हर तरह के गीत भजन रागनी लिखे। पंडित जी कि सबसे लोकप्रिय रागनी भजन अगर पूछी जाए तो सब की जुबान पर एक नाम सबसे ज्यादा आता है गंगा जी तेरे खेत मैं। गंगा जी तेरे खेत मैं इस भजन के बारे में कहा जाता है पंडित जी को पहले ही सुझ चुका था उन्होंने गीत के आखिर में इच्छा जताई की गंगा मैया तेरे रेत में आकर मिलूंगा और इसी वादे को निभाने के लिए वे 14 नवंबर 1967 को गंगा स्नान के लिए निकले और 16 नवंबर को गंगा के रेत में खुद को मिला लिया। अपने जीवन काल में उन्होंनें लगभग 40 सांगों की रचना की। हरियाणा के इस महान कलाकार, लेखक, गायक, सांगी पंडित मांगे राम को हरियाणा खास कोटि कोटि प्रणाम करता है।

पंडित मांगे राम – आज ही मिले थे गंगा जी के खेत में Reviewed by on . [caption id="attachment_1365" align="aligncenter" width="389"] चित्र के कलाकार राजेश रंजन जी हैं जिसे रोशन वर्मा जी की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है[/caption] [caption id="attachment_1365" align="aligncenter" width="389"] चित्र के कलाकार राजेश रंजन जी हैं जिसे रोशन वर्मा जी की फेसबुक वाल से साभार लिया गया है[/caption] Rating: 0

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