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पत्नी घूंघट के अंदर, पति चमके बैनर पर

December 20, 2016 9:41 am by: Category: खबर खास 1 Comment A+ / A-

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरूआत हरियाणा के पानीपत से की और अपनी मन की बात में मुख्यमंत्री खट्टर काका की पीठ भी थपथपाई, लिंगानुपात बेहतर होने पर। हरियाणा सरकार ने एक नया काम और किया। पंचायतों में पढ़ी-लिखी महिलाएं आगे बढ़ सकें, इसके लिए पंचायतों के चुनाव में उतरने के लिए न्यूनतम शिक्षित होने की शर्त लागू कर दी। इसके चलते विपक्ष ने काफी विरोध भी किया। ना विधायक, ना सांसद और ना अन्य चुनाव में न्यूनतम शिक्षा की शर्त नहीं तो पंचायत चुनाव में ही क्यों? सरकार डटी रही। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय तक मामला गया पर सरकार ही जीती और चुनाव हुए। कई शादियां इसी चक्कर में जल्दी जल्दी हो गईं ताकि पढ़ी-लिखी बहू को चुनाव मैदान में उतारकर परिवार की राजनीतिक चौधर कायम रखी जा सके। ऐसा हुआ भी, पढ़ी-लिखी लड़कियां, विवाहिता महिलाएं चुनाव जीतीं जरूर लेकिन चौधर तो पतियों के पास ही रही। कई बैठकों में सरपंच, पंच प्रतिनिधि पहुंचते तो प्रशासनिक अधिकारी उन्हें लौटाने लगे। यही क्यों, घूंघट में आई महिला प्रतिनिधियों को घूंघट उठाने को कहा गया।

इस सबके बीच अब हरियाणा के झज्जर में मुख्यमंत्री खट्टर काका की विकास रैली के लिए जो बैनर लगे हैं, उसमें पालिका प्रधान के पति उमेश नंदवानी ने खुद को पालिका चेयरमैन बताते हुए मुख्यमंत्री खट्टर की फोटो के साथ अपना फोटो लगाया है। इस बैनर की खूब चर्चा है। पत्नी कविता नंदवानी तो घूंघट में, घर की चारदीवारी के अंदर है जबकि पति महोदय का चांद सा मुखड़ा मुख्यमंत्री के साथ चमक रहा है बैनर पर। अब आप ही बताइए कि पत्नी की चौधर को, पत्नी के चेयरमैन होने के अधिकारों की लगाम पति के हाथ में है कि नहीं? प्रशासन क्या कर रहा है? प्रशासन इन बैनरों को हटाने के आदेश क्यों नहीं दे रहा? ये तो साफ-साफ चोरी और सीनाजोरी है कि नहीं? पत्नी को घर के कामकाज में लगाकर, घर में आए लोगों की सुनवाई करने में शामिल होने तक तो चोरी है, पर इस तरह खुले आम खुद को चेयरमैन बताकर बैनर पर चमक जाना तो सीनाजोरी ही कही जाएगी या नहीं?

सवाल उठता है कि क्या इस तरह से महिला सशक्तिकरण होगा? क्या इस तरह पंचायतें या पालिकाएं चलाने के महिलाओं के नाम बस मोहर लगाने के काम ही आएंगे? क्या मुख्यमंत्री इन बैनरों को देखकर भी अनदेखा कर देंगे, जैसे झज्जर के प्रशासनिक अधिकारियों ने किया है? फिर प्रधानमंत्री किस कारण से मुख्यमंत्री की पीठ थपथपाएंगे? महिलाओं को घर की चारदीवारी से निकालकर, चेयरमैन की कुर्सी पर बैठकर लोगों की तकलीफें दूर करने का कभी अवसर मिलेगा भी? महिलाओं को उनकी संवैधानिक शक्तियां उपयोग करने व स्वतंत्रता से फैसले लेने का अधिकार कब मिलेगा और कौन दिलाएगा? क्या महिलाओं को भी पहल नहीं करनी चाहिए? क्या महिलाएं घूंघट की आड़ में, सिर्फ मोहर लगाने तक ही अपने अधिकारों को सीमित कर संतुष्ट हैं? उन्हें खुद संघर्ष करना चाहिए या नहीं? ये कैसी प्रतिनिधि हीं जो अपने अधिकारों के प्रति ही सजग नहीं, तो ग्राम या पालिका कैसे चलाएंगी? प्रशासनिक अधिकारी भी इस सत्ता के चोर दरवाजे के खेल को समझते हुए, जानते हुए भी इसे बंद क्यों नहीं कर देते? कुछेक जगह जरूर ऐसे समाचार आते हैं कि अधिकारियों ने महिलाओं के प्रतिनिधियों को बाहर निकाला, पर सभी अधिकारी को स्वयं चुनी हुई महिलाएं ऐसा सहासिक कदम उठाएं तो बेहतर होगा।

बस एक ही पंक्ति काफी है:

एक पांव रखता हूं, हजार राहें फूटती हैं…

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लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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Comments (1)

  • kamlesh bhartiya.

    panchayaton me mahilayen parhi likhi hona jaruri par chaudhar phir patidev ke pass, yeh kaisa insaf?

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