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पौष मास – पोह का म्हिना रात अंधेरी

December 16, 2016 10:07 am by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

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किसान के दुख की कथा कहती यह हरियाणवी रागनी/कविता पढ़ें जिसे लिखा है डॉ रणबीर सिंह दहिया ने।

पोह का म्हिना रात अन्धेरी, पड़ै जोर का पाळा
सारी दुनिया सुख तैं सोवै मेरी ज्यान का गाळा

सारे दिन खेतां के म्हां मनै ईख की करी छुलाई
बांध मंडासा सिर पै पूळी, हांगा लाकै ठाई
पूळी भारया जाथर थोड़ा चणक नाड़ मैं आई
आगे नै डिंग पाट्टी कोन्या, थ्योड़ अन्धेरी छाई
झटका देकै चणक तोड़ दी हुया दरद का चाळा

साझे का तै कोल्हू था मिरी जोट रात नै थ्याई
रुंग बुळथ के खड़े हुए तो दया मनै भी आई
इसा कसाई जाड्डा था भाई मेरी बी नांस सुसाई
मजबूरी थी मिरे पेट की, कोन्या पार बसाई
पकावे तैं न्यों कहण लग्या कदे होज्या गुड़ का राळा

कई खरच कठ्ठे होरे सैं, ज्यान मरण मैं आई
गुड़ नै बेचो गुड़ नै बेचो, इसी लोलता लाई
छोरी के दूसर की सिर पै, आण चढ़ी करड़ाई
सरकारी करजे आळयां नै, पाछै जीप लगाई
मण्डी के म्हां फंसग्या क्यूकर होवै जीप का टाळा

खांसी की परवाह ना करी, पर ताप नै आण दबोच लिया
डाक्टर नै एक सूआ लाया, दस रुपये का नोट लिया
मेरे पै गरदिश क्यों चढ़गी, मनै इसा के खोट किया
कई मुसीबत कठ्ठी होगी, सारियां नै गळजोट लिया
रणबीर साझे जतन बिना भाई टळै ना दुख का छाळा

dr-ranbeer-dahiya

लेखक परिचय

डॉ. रणबीर सिंह दहिया पीजीआई रोहतक के सेवानिवृत सर्जन हैं और हरियाणवी साहित्य व समाज की गहरी समझ रखते हैं…. फौजी मेहर के गांव बरौणा में पैदा हुए डॉ. दहिया उनकी विरासत को रागनी लेखन के जरिये आगे बढ़ा रहे हैं। वर्तमान में भी निशुल्क ओपीडी की सेवाएं जरुरत मंद लोगों के लिये देते हैं और समाज के प्रति समर्पित एक सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता की भूमिका अदा कर रहे हैं।

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