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राजनीति और सिनेमा का वंशवाद

October 17, 2016 4:05 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-
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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी  में चाचा-भतीजे की शब्दों की जंग जारी है। सपा के मुखिया  मुलायम सिंह यादव ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि पार्टी बहुमत में आने पर, विधायक ही अपना मुख्यमंत्री चुनेंगे। वैसे तो यह बयान ही हास्यास्पद है, क्योंकि सपा जैसी परिवारवाद से बुरी तरह ग्रस्त पार्टियों में  इतना लोकतंत्र कहां है कि विधायक अपने मन का मुख्यमंत्री चुन सके। परिवारवादी पार्टियों की बात छोड़ो, अब तो राष्ट्रीय पार्टियों में विधायक सिर्फ हाईकमान द्वारा थोपे गए मुख्यमंत्री को ही अपनी पंसद की मुहर लगाने में ही भलाई समझते हैं। फिर मुलायम सिंह यादव का बयान पूरी तरह सफेद झूठ नहीं है तो क्या होगा। अब चाचा शिवपाल यादव भी कम नहीं हैं। वे कल इटावा क्लब के एक कार्यक्रम में गए तो मीडिया कर्मियों के सामने बिना मुख्यमंत्री अखिलेश का नाम लिए कहा कुछ लोगों को विरासत और भाग्य से ही सब कुछ मिल जाता है, जो कईयों को सालों की मेहनत और समर्पण के बाद भी नहीं मिलता। मजेदार बात है कि शिवपाल यादव इटावा क्लब में एक भोजपुरी फिल्म के मुहूर्त के मौके पर आए थे। इसलिए वे संवाद लेखकों से भी बढिय़ा संवाद बोले। उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री न बन पाने का दर्द वैसे ही छलक गया, जैसे अपने हरियाणा के बीरेंद्र सिंह की पीड़ा की झलक देखने सुनने को मिल ही जाती है। शिवपाल ने इसके बाद बड़े भाई मुलायम यादव के साथ पार्टी के कई उतार-चढ़ाव देखने की बात याद करके कहा कि उन्हें तो समाज सेवा से ही बड़ा सुकून मिलता है। जो कुछ हूं, नेता जी की वजह से हूं। इस तरह फिल्म का बढिय़ा मुहूर्त  शॉट देकर शिवपाल यादव चल दिए। इतना भी कहते गए कि परिवार व पार्टी में कोई मतभेद या विवाद नहीं है। मीडिया ने छोटे मुद्दे को हवा दे दी। घर में भी सब कुछ सुलझा लिए जाने का दावा भी किया। अब बताओ, इस सादगी पर कौन न कुर्बान हो जाए, ऐ खुदा। क्या कहना चाचा शिवपाल के? खैर, राजनीति और फिल्मों में विरासत नहीं चलती। किसी काम नहीं आती विरासत। यदि ऐसा होता तो अब तक देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर राहुल गांधी या वरूण गांधी आसीन होते। आखिर नेहरू गांधी की विरासत किसी काम नहीं आई। चंद्रशेखर रेड्डी के बाद जगन रेड्डी ने मुख्यमंत्री बनने के लिए खूब हाथ-पांव मारे, हाय-तौबा मचाई पर मुख्यमंत्री की कुर्सी हाथ न आई। अरूणाचल में दोरजी खांडू के बेटे पेमा खांडू भी विरासत से नहीं बल्कि दल-बदल से मुख्यमंत्री बने हैं। हरियाणा में कुलदीप बिश्नोई भी चौधरी भजनलाल के राजनीतिक वारिस तो हैं पर अभी तक विरासत में मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर ही है। अपनी पार्टी बनाकर देख ली और कई गठबंधन बनाकर देख लिए। लौट के कांग्रेस में ही आ गए। उदाहरण अनेक हैं। पंजाब में सुखबीर बादल ने पिता प्रकाश सिंह बादल का मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड बनवाने के लिए उपमुख्यमंत्री बनना स्वीकार कर लिया। माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन सकें। पिता सिंधिया की तरह केंद्र में मंत्री ही बन पाए। राजनीति विरासत का खेल कम, संघर्ष का खेल ज्यादा है। इसी तरह फिल्मों में देखिए अमिताभ बच्चन आज तक जमे हुए है जबकि अभिषेक बच्चन वैसी लोकप्रियता नहीं पा सके। उनका बचाव करते हुए मां जया बच्चन कहती हैं कि अमिताभ को भी सितारा बनने से पहले कितनी फ्लॉप फिल्में दीं। जॉनी के नाम से प्रसिद्ध राजकुमार के बेटे पुरू राजकुमार का नाम भी बहुत कम लोग जानते हैं। नायक से खलनायक बनकर भी देख लिया। पर बात नहीं बनी। मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार के बेटे कुणाल गोस्वामी भी नहीं चलें। राजकपूर के बेटे रणधीर कपूर और राजीव कपूर भी कपूर खानदान की विरासत के बल पर वैतरणी पार नहीं कर पाए। प्रतिभा के बल पर ऋषि कपूर ही चलें। इसी तरह माला सिन्हा की बेटी प्रतिमा सिन्हा सिर्फ राजा हिंदुस्तानी के आईटम सांग से जानी जाती है। ड्रीम गर्ल हेमामालिनी की बेटियां आहना वा ईशा देओल दोनों मां-बाप की विरासत होते हुए भी नहीं चलीं। दोनों ने घर बसाना ही उचित समझा। इसी प्रकार शर्मिला टैगोर की बेटी सेाहा अली भी नहीं चली। उसने भी आखिर कार शादी कर ली। इसके अतिरिक्त अनेक उदाहरण है। मुकेश के बेटे नितिन मुकेश भी नहीं चले।
इसलिए राजनीति व फिल्मों में विरासत का क्या काम? हां, भाग्य का कुछ कह नहीं सकते, किस पर हो जाए मेहरबान।
शिवकुमार बटालवी के शब्दों में
की लिखिया किसे मुकद्दर सी,
हत्थां दीयां चार लकीरां दां।
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