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राजेंद्र यादवः साहित्य के ‘द ग्रेट शो मैन’

August 28, 2016 8:40 pm by: Category: शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

Rajender Yadav

लम्बी जिंदगी से रूखसती यूं अच्छी तो नहीं

गर तीरगीसा हो जाता सुबह का सितारा कोई  

84 साल की उम्र में कलमकार राजेन्‍द्र यादव का चला जाना इतना दर्द नहीं देता अगर वे सुबह के सितारों की तरह धुंधला गए होते, या मध्यम पड़ गए होते। लेकिन बहसों, ठहाकों, विवादों में गुजर रही जिंदगी का एकदम ठहर जाना दर्द का सबब बन जाता है।

साहित्य की कोई सदी ठहर गई हो जैसे या ठहर गयी हो कोई हसंती, खेलती, चहकती, और सिसकती दुनिया की दर्दीली कलम। यूं लगता नहीं कि ‘हंस’ पत्रिका के ‘संपादक’ और ‘लोकप्रिय उपन्यासकार’ के साथ ‘राजेद्र यादव’ शब्द जोड़ देने से उनकी कोई पहचान बाकि रह जाती हो। 28 अगस्त 1929 को आगरा, उत्तर प्रदेश में जन्में राजेंद्र यादव के लिए हिंदी साहित्य की ऐसी कोई विधा नहीं जिन्हें उन्होनें न छुआ हो। उपन्यास, कहानी, कविता और आलोचना सहित साहित्य की तमाम विधाओं पर उनकी एक साथ पकड़ थी। जिस दौर में हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाएं अकाल मौत का शिकार हो रही थीं, उस दौर में भी हंस के लगातार प्रकाशित होने की पहचान राजेंद्र यादव ही तो थे।

प्रेमचंद की विरासत रूप में 25 सालों तक हंस के संपादकीय में ‘‘मेरी-तेरी उसकी बात‘‘ के नाम से छपने वाली राजेंद्र यादव की कलम हमेशा नये विमर्श के साथ-साथ विवाद को खड़ा करती नज़र आती थी। कविता से लेखन की शुरूआत करने वाले राजेंद्र यादव ने बड़ी बेबाकी से सामन्ती मूल्यों पर प्रहार किया और दलित व नारी विमर्श को हिन्दी साहित्य जगत में चर्चा का मुख्य विषय बनाया। इनकी मशहूर रचनाओं में सारा आकाश, शह और मात, जहां लक्ष्मी कैद है और काश… मैं राष्ट्रद्रोही जैसे अनेकों रचनाएं शामिल हैं।

एक लम्बे समय तक उनके नए विचारों को पढ़ लेने की तमन्नाएं समेटे उनका कोई पाठक नहीं चाहता था कि ये कलम कभी रूके। लेकिन नियति के क्रूर हाथों ने 28 अक्टूबर 2013 को उन्हे अपने आगोश में ले लिया और साहित्य के लम्बे रास्ते से बिछुड़ गया कोई राहगीर… जो साहित्य जगत के एक मजबूत स्तंभ की तरह सदीयों तक याद आता रहेगा।

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