Thursday , 19 October 2017

Home » खबर खास » आखिर पहुंचते कैसे हैं राज्यसभा में ?

आखिर पहुंचते कैसे हैं राज्यसभा में ?

आसान नहीं वोटों की गिनती

June 15, 2016 9:21 am by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

-दीपकमल सहारण

Deepkamal

राज्यसभा चुनावों के लिए वोटों को Single Transferable Vote सिस्टम से गिना जाता है। 1851 में डेनमार्क में पहली बार इस्तेमाल हुए इस सिस्टम को वोटरों की पसंद जानने के लिए सबसे सटीक माना जाता है। इसमें वोटों की गिनती काफी टेढ़ी होती है। फार्मूला और प्रक्रिया इतनी पेचीदा है कि एक गलती तो इस बार हरियाणा विधानसभा वाले भी कर गए। गलती आखिर में बताऊंगा। पूरा पढ़ेंगे, समझ भी तभी ठीक से आएगी।
ये तो हमें पता ही है कि जितनी सीटें हों, मतदाता को मौजूद उम्मीदवारों में से उतनों को ही 1,2,3.. के हिसाब से प्राथमिकता देनी होती है.. मतलब पहली पसंद कौन, दूसरी कौन आदि, सीटों की संख्या तक। 10 उम्मीदवारों में से 4 सीटें भरी जानी हों तो किन्हीं 4 नामों के आगे 1,2,3 या 4 लिखना होगा। गिनती के वक्त पहली पसंद का वोट तो सीधे उसी उम्मीदवार को दे दिया जाता है फुल वैल्यू के साथ। इससे पहले जीत के लिए जरूरी कोटा तय किया जाता है  इसे Droop Quota कहा जाता है और इसे पार करने पर ही जीत होती है। पहली पसंद के वोट के आधार पर जो उम्मीदवार कोटा पार कर जाते हैं, उन्हें विजेता घोषित कर दिया जाता है। साथ ही, कोटे से ऊपर के उनके वोटों को दूसरी या तीसरी पसंद के उम्मीदवारों को ट्रांसफर किया जाता है। इसकी एक प्रक्रिया है और यही सबसे महत्वपूर्ण है।
मौजूदा उदाहरण में ये आसान दिख रहा है क्योंकि बीरेंद्र सिंह के 20 मतदाताओं ने एक ही उम्मीदवार को दूसरी पसंद का वोट दिया था। जीत चुके उम्मीदवार के फालतू बचे वोटों को दूसरी पसंद जताने वाले मतदाताओं की संख्या से भाग दिया जाता है और फिर उसे Round down कर (दशमलव के बाद का हिस्सा काटकर) एक वोट की वैल्यू निकाली जाती है। इस वैल्यू को दूसरी पसंद के उम्मीदवारों में उनके वोटों (दूसरी पसंद के) के हिसाब से बांट दिया जाता है। इस मामले में सभी 20 मतदाताओं ने सुभाष चंद्रा को ही वोट दिया था, इसलिए एक वोट की वैल्यू (1466/20 =73.3 = 73) निकालकर उसे 20 से ही गुणा (73 X 20 =1460) कर दिया गया। इस तरह ये वोट चंद्रा को मिले और वे कोटे से ऊपर चले गए और जीत गए। आसान शब्दों में सुभाष चंद्रा को दूसरी पसंद के मिले 20 वोटों के बदले 14.6 वोट मिले।
इसमें तीसरी या ज्यादा पसंद होने पर प्रक्रिया और लम्बी व जटिल होती जाती है। साथ ही, जब एक स्टैप के बाद कोई नया विजेता ना मिले तो सबसे कम वोट वाले उम्मीदवार को हारा घोषित कर दिया जाता है व उसके दूसरी पसंद के वोटों का बंटवारा उन वोटों पर दूसरी पसंद बताए गए उम्मीदवारों में किया जाता है। कई बार उम्मीदवारों के वे वोट भी आगे बंटते हैं जो उन्हें खुद दूसरी, तीसरी पसंद के तौर पर मिले थे। ऐसे वोटों की वैल्यू कम होती जाती है। ऐसे समझ आने के चांस कम ही हैं, चिंता ना करें।
खैर, हमारे मामले में गड़बड़ कहां हो गई, वो जानते हैं। वैसे नतीजे पर इसका कोई असर नहीं पड़ा लेकिन गलती तो गलती है। दरअसल कोटा तय करने का फार्मूला ही थोड़ा गलत लिखा हुआ है। असली फार्मूला है {Total Value of Valid Votes/(No of Seats + 1)} + 1… जबकि लिखा गया है [{Total Value of Valid Votes + 1)/(No of Seats + 1)}]. गणित के जानकार इनके अंतर को अच्छे से समझते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में दशमलव के बाद के हिस्से को Round off की बजाय Round Down करने का नियम है यानी चाहे दशमलव के बाद 1 आए या 9, उसे खत्म किया जाएगा और दशमलव से पहले की संख्या ही ली जाएगी, ना कि दशमलव के बाद 5 या ज्यादा होने की सूरत में संख्या में 1 जोड़ दिया जाए। इस वजह से जहां असली फार्मूले की वजह से कोटा 2533 आना था, वहीं गलत फार्मूले की वजह से वह 2534 हो गया। हालांकि Round Down नियम की वजह से दूसरी पसंद को ट्रांसफर वोट अंतत: 1460 ही हो जाने थे। लेकिन गलती तो गलती है। वो तो total Votes की जगह 100 से गुणा कर Total Value of Votes इस्तेमाल किया जाता है जिससे संख्या 100 गुणा बढ़ जाती है और उस पर 1 को भाग से पहले या बाद में जोड़ने का ज्यादा असर नहीं पड़ता, वरना अगर Total Votes (असल फार्मूले में यही है) का ही इस्तेमाल होता तो यह चूक बड़ा खेल कर सकती थी। जहां विधायकों की नीयत की बजाय पेन और स्याही से हार-जीत का खेल हो जाए, वहां बतंगड़ तो चाहे जिस बात का बना लो।
इन सब बोरिंग और दिमाग को गर्म करने वाली बातों के बाद मोटी बात यह है कि अगर 14 की बजाय 9 वोट रद्द होते, तो भी सुभाष चंद्रा ही जीतते, 8 वोट रद्द होते तो भी बेहद मामूली अंतर से चंद्रा ही जीतते, और 7 वोट रद्द होने पर आरके आनंद को आनंद आ जाता और वे मामूली अंतर से जीत जाते। दूसरे नंबर के वोट आदि की संख्या यूं की यूं रहने पर।
Single Transferable Vote का तरीका पेचीदा या गैरजरूरी लग सकता है लेकिन मतदाताओं की राय सबसे अच्छे से जानने का यह वैज्ञानिक और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त तरीका है। इससे मतदाता को एक से ज्यादा पसंद वरीयता क्रम में बताने का अवसर मिलता है और नतीजों में इस बात को महत्व मिलता है।

 

लेखक दीपकमल सहारण हरियाणा के जाने माने वरिष्ठ पत्रकार हैं उन्हीं की फेसबुक वाल से साभार यह लेख।

आखिर पहुंचते कैसे हैं राज्यसभा में ? Reviewed by on . -दीपकमल सहारण राज्यसभा चुनावों के लिए वोटों को Single Transferable Vote सिस्टम से गिना जाता है। 1851 में डेनमार्क में पहली बार इस्तेमाल हुए इस सिस्टम को वोटरों -दीपकमल सहारण राज्यसभा चुनावों के लिए वोटों को Single Transferable Vote सिस्टम से गिना जाता है। 1851 में डेनमार्क में पहली बार इस्तेमाल हुए इस सिस्टम को वोटरों Rating: 0

Leave a Comment

scroll to top