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पोंची पै के बोल्ले हरियाणवी कवि

August 18, 2016 11:51 am by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

कोई भी तीज-त्यौहार हो या फेर कोई उत्सव… म्हारे हरियाणवी कवि अपनी छाप जरूर छोडै हैं, यूं तो हरेक आदमी हर तरीयां की भावना राखैं है, पर न्यू कहया करै जड़ै ना पोहंचे रवि, उड़ै पहुंचे कवि। तो पेश है थारी खातर हरियाणवी में पोंची पै ये तीन कविता…

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पौहंचिया के बहाने

साल भर मै मौका मिल्या सै मै भी पीहर नै जाउंगी

पौहंचिया के बहाने बेबे भाई भावज तै मिल आउंगी

आज सांझ नै जाणा सै मन्नै सारी त्यारी कर राखी सै

भाईयां खातर नई नई पोहंची पहला ए लेकै धर राखी सै

भाभीयां खातर डोरे ले लिए अर भतीजा की घड़ी ले ली

घर की शक्कर कढवा राखी थी वा भी एक धड़ी ले ली

भतीजे के लत्ते अर केले मिठाई शहर म्हां तै ले लूंगी

200 रुपये उधारे देदे आत्यांए मैं दे दूंगी

हड़ै तु ध्यान राखिए कदे सासू ना चिड़ ज्यावै

दो गठड़ी न्यार की गेर दी कदे कम ना पड़ ज्यावै

कम पड़ै तो एक ज्वार का भरोटा सीमा धोरै मंगवा दिए

धार तो मेरी सासू काढ देगी तु ठाणा नैं संगवा दिए

दो टैम पीण का पाणी जेठ की छोरी भर देगी

रोटी टूक की देख लिए कासण बुहारी वा कर देगी

अर मेरतै अपणी चप्पल दे दिए जो मोनू के ब्याह मैं ल्याई थी

के बेरा मेरी भाभी ल्यादे मन्नै उस धोरै मंगवाई थी

जी तो करै सै उड़ै रुकण का पर काल ए उल्टा आणा होगा

मेरी ननंद आई अर मैं ना पाई यो करड़ा उल्हाणा होगा

अच्छा बेबे तु देख लिए ईब करुं जाण की तैयारी मैं

साल भर का त्यौहार सै जगहां ना मिलै सवारी मैं

पाछले साल भी ना जा पाई ईबकै पक्का जाणा होगा

भाण भाई का वाणा सै यो जरुर निभाणा होगा

इन्द्रजीत भाई मेरा मेरी बाट देखता पावैगा

ईब ना गई तो बेरा ना कद मिलण का मौका आवैगा

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                       कवि इन्द्रजीत

 

 

 

भाई जा रा स काला पाणी

भाई जा रा स काला पाणी

उसपे पुच्चि बंधवाण आया नही ग्या

ओर भाईंया क बांध पुच्चि आग्या याद

भाण प आंख का पाणी थमाया नही ग्या

भीतर रोवॆ उसका किसे न कह ना सकी

पुच्चि पार्सल करदी पर बांधॆ रह ना सकी

दुसरी कानी भाई का भी यो ए हाल था

आज भी काम करूं? खुद तॆ सवाल था

कदे बख्त था दोनु हाथा प पुच्चि बांध्या करदी

खुवा मिठाई 50  रपिये हांस के मांग्या करदी

इब रपिये हो ग्ये तो टेम ना रहया राम जी

मन्नॆ मेरी भाण धोरॆ भेज दे राम जी

कर फोन पुंज के आंसु बोली र तु क्यु ना आया

भाई बोला रोक के सांस काम के कारण आया ना ग्या

पर तु चिन्ता ना करिये म तावला ए आउंगा जरुर

सुन के बात भाण प आंसु थमाया नही ग्या

सुबक के बोली नु बता दे म पुच्चि किसकॆ बांधु

खुवा के पेठ्ठा मिठाई माथॆ लाम्बा टिका किसकॆ काढु

इसे के रपिये राम होग्ये ग्या तु इतणी दूर

तावल करके आइये म या पुच्चि बांधुगी जरुर

भाण का दुख समझॆ भाई

अर भाई का समझॆ भाण

बिना टाहये राम मिलज्या

घर की खुशी जो जावॆ जाण ॥

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         सोमवीर दुल्हेड़ी

 

सबतै पाक रिश्ता

सबतै पाक रिश्ता जग म्हं बाहण और भाई का !

भाई बिन कोये बुझणीयां ना दुःख माँ जाई का !!

जब आवै बार रखड़ी का याद भाई आवै सै,

भाई भी पूगै टेम पै ना बाट घणी दिखावै सै,

रिश्ते की डोरी दोनों नै अपने पास बुलावै सै,

बांधके राखी भाई कै वा फूली नहीं समावै सै,

करै आरता जब आवै टेम ब्याह सगाई का !!

हुई जवान बाहण मेरी करे जा सै फ़िक्र भाई,

वर टोहवण की रात दिन जा सै चिंता खाई,

ढूंढ़के लायक वर ब्याह की जा सै बेदी रचाई,

फेरा ऊपर भाई हाथा उड़ै जा सै खील बगाई,

ला छाती धीर बंधावै जब आवै टेम बिदाई का !!

छोड़ चली घर बाप का रहया साझा सीर नहीं,

सासरे म्हं सुणै ताने जै घर माँ जाया बीर नहीं,

इसी कोण लुगाई जिसके आवै याद पीहर नहीं,

तीज सकरात रखड़ी पै कोये बंधावै धीर नहीं,

बिन भाई के हो सै लोगो पीहर लुगाई का !!

भाई बिन भात की भेली कोण घरां धरावैगा,

लेकै चीर जरी का कोण बाहण नै उढ़ावैगा,

बिन भाई रोये जा खड़ी कोये ना पाटड़े पावैगा,

कँवर सिंह जमाना थूकै जै भाती नहीं आवैगा,

भाती बिन फीका हो सै रंग शहनाई का !!

कंवर सिंह

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