Saturday , 21 October 2017

Home » शख्सियत खास » राममनोहर लोहिया – गांधी और मार्क्स के बीच की कड़ी

राममनोहर लोहिया – गांधी और मार्क्स के बीच की कड़ी

October 12, 2017 1:22 pm by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम।

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

संस्कृत के इस श्लोक में वर्णित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की कसौटी पर खरा उतरता था भारतीय समाजवादी विचारक राम मनोहर लोहिया का व्यक्तित्व। मानव की स्थापना के पक्षधर समाजवादी डॉ. लोहिया एक महान विचारक ही नहीं अपने दम पर शासन का रूख बदलने का भी दम रखते थे। वे समाजवादी भी इस अर्थ में थे कि, समाज उनका कार्यक्षेत्र हो और वे अपने कार्यक्षेत्र को जनमंगल की अनुभूतियों से महकाते रहें।

23 मार्च, 1910 को फैजाबाद, उत्तर प्रदेश में पिता हीरालाल के घर जब वे पैदा हुए तो देश में आजादी को लेकर उधेड़बुन का दौर था। महात्मा गांधी के अनुयायी इनके पिता के साथ-साथ गांधी के व्यक्तित्व का असर इन पर भी रहा। लोहिया वैसे तो किसी परिचय के मोहताज नहीं है, लेकिन उनको उन्ही के रूप में समझ पाना बेहद मुश्किल है। अधिकतर पढाई देश में करने के बाद पीएच डी की पढाई इन्होने जर्मन से की ।

विश्व की रचना और विकास के बारे में उनकी अनोखी और अद्वितीय दृष्टि थी। उन्होंने सदा से ही मानव-मात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक माना। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ सरीखी यही अनूठी पहचान थी लोहिया की।

लोहिया एक नयी सभ्यता और संस्कृति के दृष्टा और निर्माता थे। लेकिन आधुनिक युग जहाँ उनके विस्तारित और मौलिक दर्शन की उपेक्षा नहीं कर सका, वहीं उन्हें पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया। लोहिया ने मार्क्सवाद और गांधीवाद को मूल रूप में समझा और दोनों को अधूरा पाया, क्योंकि इतिहास की गति ने दोनों को छोड़ दिया है। दोनों का महत्व मात्र-युगीन है। लोहिया की दृष्टि में मार्क्स पश्चिम के तथा गांधी पूर्व के प्रतीक हैं और लोहिया पश्चिम-पूर्व की खाई पाटना चाहते थे। मानवता के दृष्टिकोण से वे पूर्व-पश्चिम, काले-गोरे, अमीर-ग़रीब, छोटे-बड़े राष्ट्र नर-नारी के बीच की दूरी मिटाना चाहते थे।

लोहिया अनेक सिद्धान्तों, कार्यक्रमों और क्रांतियों के जनक हैं। उन्होंने एक साथ सात क्रांतियों का आह्वान किया, जो इस प्रकार वर्णित है

  • नर-नारी की समानता के लिए
  • चमड़ी के रंग पर रची राजकीय, आर्थिक और दिमागी असमानता के ख़िलाफ़
  • संस्कारगत, जन्मजात जातिप्रथा के ख़िलाफ़ और पिछड़ों को विशेष अवसर के लिए
  • परदेसी ग़ुलामी के ख़िलाफ़ और स्वतन्त्रता और विश्व लोक-राज के लिए
  • निजी पूँजी की विषमताओं के ख़िलाफ़
  • आर्थिक समानता व योजना द्वारा पैदावार बढ़ाने के लिए
  • अस्त्र-शास्त्र के ख़िलाफ़ और सत्याग्रह के लिए

उन्होनें कहा कि ये सातों क्रांतियाँ पूरे विश्व में एक साथ चल रही हैं। अपने देश में भी उनको एक साथ चलाने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि बढ़ते-बढ़ाते शायद ऐसा संयोग हो जाये कि सब नाइन्साफियों के ख़िलाफ़ लड़ता-जूझता आज का इन्सान ऐसे समाज और ऐसी दुनिया को बना पाये कि जिसमें आन्तरिक और बाह्य शांति के साथ भौतिक भरा-पूरा समाज बन पाये।

साल 1967 में 12 अक्तूबर यानि आज ही का दिन था। एक बीमारी के कारण डॉ. लोहिया का नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल में इलाज चल रहा था। कि अचानक आई अंदर की एक खबर ने पूरे देश को गमगीन कर दिया। लोहिया चले गए। अपने जीवन के बहुमूल्य 57 साल भारत को देकर लोहिया इस जगत से रूखसत हो गए। आज भले ही वो हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके समाजवादी दृष्टिकोण, व्यापक दर्शन और उनके सिद्धांतों के लिए उन्हे आज भी याद किया जाता है।

लेखक परिचय – एस.एस पंवार एवन तहलका हरियाणा, तख्तीडॉटइन, हरियाणा खास, खबरफास्ट, हरियाणा न्यूज सहित कई समाचार चैनल एवं वेबपोर्टल के लिये पत्रकारिता कर चुके हैं। वर्तमान में वह फतेहाबाद के एम.एम कॉलेज में सहायक आचार्य (एसिसटेंट प्रोफेसर) के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफोर्म और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनके लेख, कविताएं, पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

राममनोहर लोहिया – गांधी और मार्क्स के बीच की कड़ी Reviewed by on . अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। संस्कृत के इस श्लोक में वर्णित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की कसौटी पर खरा उतरता था भारतीय समाजवादी अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।। संस्कृत के इस श्लोक में वर्णित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की कसौटी पर खरा उतरता था भारतीय समाजवादी Rating: 0

Leave a Comment

scroll to top