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इनके आगे हैं रावण के अपराध तुच्छ

इंद्र, बाली, राम, कंश, भीष्म, दुर्योधन, और पांडवों ने भी किये थे पाप कर्म

September 29, 2017 6:14 pm by: Category: खबर खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

इस वर्ष भी बुराई के प्रतीक रावण का पुतला धूमधाम से जलाया जायेगा I रावण का जलता पुतला देख कुछ बुराइयों के शीर्षक मन में तैर जाते हैं यथा बलात्कार, स्त्री अपहरण, अहंकार, अत्याचार तथा साम्राज्यवाद और एक प्रश्न भी – क्या हमारी कथाओं में ये बुराइयां मात्र रावण में ही विद्यमान हैं ? यहाँ मेरा उद्देश्य  रावण के गुणों का बखान कर उसकी बुराइयों को निरस्त करना नही है, न ही ब्राह्मणवाद पर चोट करना है,  अपितु  मैं एक संक्षिप्त तुलनात्मक विवरण भर देना चाहता हूँ I

उपर्युक्त वर्णित बुराइयों के सन्दर्भ में रावण का प्रतिद्वंदी देवराज इंद्र संभवत: रावण से एक कदम आगे ही है I रावण ने दो स्त्रियों – कुंजिकस्थला और रम्फा- के बलात्कार का प्रयास किया जबकि इंद्र ने देवी अहिल्या का बलात्कार किया और उस पुण्यात्मा निर्दोष स्त्री को सभ्य समाज से बहिष्कृत पाषाणतुल्य जीवनयापन करना पड़ा I रावण ने सीता का अपहरण किया और इंद्र ने हरिण्यकस्यपु की गर्भवती पत्नी कयाधु का अपहरण किया I रावण ने ऋषियों को प्रताड़ित किया और उनके यज्ञो को नष्ट किया, तो इंद्र ने भी भय एवं घोर ईर्ष्या के वशीभूत स्त्रियों को गलत दिशा में प्रवृत कर (जिसे वेश्यावृति का ही प्रकार कहा जा सकता है) ऋषियों की तपस्या में व्यवधान उत्पन्न किये I अहंकारी इंद्र ने वृन्दावन को भी डूबाने का प्रयास किया अर्थात निर्दोष वृन्दावन वासियों की हत्या का प्रयास किया जोकि अत्यंत क्रूर कर्म था I देव होने के बावजूद इंद्र के कर्म राक्षसी हैं I रावण प्रत्यक्ष और इंद्र परोक्ष अपराध एवं अनाचारों का प्रतीक है और इस रूप में इंद्र रावण की तुलना में कहीं अधिक भयंकर सिद्ध होता है I वर्तमान भारत में अच्छाई का मुखोटा लगाए सम्मान प्राप्त कुकर्मियों की पौराणिक प्रेरणा इंद्र ही तो है I अतः ऐसे क्रूर, अहंकारी, अत्याचारी, अधर्मी, लम्पट, बलात्कारी, ईर्ष्यालु और अहर्निश मदिरा के नशे में डूबे रहने वाले दुश्चरित्र इंद्र का पुतला क्यों नहीं जलाया जाता ?  क्या इस कारण कि सनातन धर्म के प्रथम ग्रन्थ ऋग्वेद में सर्वाधिक स्तुतियाँ इंद्र को समर्पित हैं ?

क्या साम्राज्यवाद रावण का दोष है?  किन्तु राम के पिता दशरथ एक चक्रवर्ती सम्राट थे तथा चक्रवर्ती की उपाधि साम्राज्यवादी  नीति का ही प्राप्य है और स्वयं राम में ही अयोध्या के राज सिंहासन पर बैठने के पश्चात साम्राज्यवादी नीति के लक्षण स्पष्ट परिलक्षित हैं – राम के अश्वमेध यज्ञ के रूप में I साम्राज्यवाद अथवा अश्वमेध अर्थात शक्ति के बल पर अन्य राजाओं में अपना भय स्थापित करना और अन्य राज्यों  की स्वतंत्रता को लील जाना I राजत्व साम्राज्यवाद का स्वप्न देता है और निर्बाध शक्ति एवं अहंकार साम्राज्यवाद का प्रेरक है I शक्तिशाली राजा राम एवं उनके  अनुज  भी इससे  बच  नहीं पाए I यदि साम्राज्यवाद एक अक्षम्य अपराध है तो महाभारत के महाराज पाण्डु अथवा पांडव और कौरव,  जिनकी दिग्विजय कितने ही राज्यों की स्वतंत्रता लील गयी,  रावण के ही समान  अपराधी हैं I अब ऐसा तो नहीं है कि रावण का साम्राज्यवाद अत्याचार और दशरथ, राम, पाण्डु, पांडव व कौरवों का राज्य विस्तार प्रेम पर आधारित था I साम्राज्यवाद का परिणाम स्वतंत्रता का हनन है, फिर चाहे उसकी रीति कुछ भी हो I यदि पुराणों से निकालकर इतिहास में आ जाये तो सिकंदर, अशोक, समुद्रगुप्त, चोल वंश,  गजनवी, गोरी, अलाउद्दीन खिलजी,  औरंगजेब और अंग्रेजइस अपराध में रावण से कहीं आगे निकल जाते हैं क्योंकि रावण के साम्राज्यवाद में प्रजा की किसी हानि की सूचना रामायण नहीं देती, जबकि इन शासकों के साम्राज्यवाद में लाखों निर्दोष लोग जान से गए I अहंकार राजाओं का अलंकार हुआ  करता था और कोई भी राजा इसे धारण किये बिना नहीं रहा I

यदि स्त्री सम्मान के हनन के लिए रावण का पुतला जलाया जाता है तो वानरराज वाली का पुतला भी रावण के साथ जलाया जाना चाहिए जिसने अनुज सुग्रीव की पत्नी रूमा को बलात अपने पास रखा और भोगा जो निश्चित रूप से अधिक गंभीर एवं घिनोना अपराध है I इसी आधार पर शांतनु पुत्र देवव्रत अथवा भीष्म भी अक्षम्य अपराधी सिद्ध होता है जिसने काशिराज की तीन पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का बलात हरण किया और उनमे से दो पर उनकी इच्छाविरुद्ध अपने बीमार भाइयों को थोप दिया तथा निर्दोष अम्बा की आत्महत्या का कारन बना I क्या भीष्म का ये कृत्य बलात्कार नहीं है? और इस सन्दर्भ में दुर्योधन, दुशासन एवं पांडवों को क्यों भूलते हैं ? पांडवों ने पत्नी को जुए में दांव पर लगाया और इस प्रकार स्त्री सम्मान पर सर्वाधिक गंभीर आघात किया तथा एक गलत परंपरा का सूत्रपात  किया I वर्तमान भारत में पत्नी की दुर्गति करने वाले पतियों के अवचेतन में पांडव ही तो आदर्श रूप में अवस्थित हैं I दुर्योधन एवं दुशासन ने द्रौपदी पर हिंसा की तथा उसके वस्त्रहरण का प्रयास किया और पत्नी की दुर्गति होते देखकर भी पांडवों ने धर्म की आड़ में अपनी कायरता छिपाते हुए उसकी रक्षा का प्रयास नहीं किया I क्या स्त्री सम्मान के प्रति ये समस्त अपराध रावण के अपराध से काम गंभीर अपराध हैं  जिसने अपहृत सीता को महिलाओं की सुरक्षा में अशोक वाटिका में रखा और स्पर्श तक नहीं किया ?

यहाँ मैं पति रूप में राम की चर्चा से बच रहा हूँ I किन्तु वर्तमान भारत की उच्च शिक्षा प्राप्त लड़कियां ये कहने लगी हैं कि भारत में  दीपावली मात्र पुरुषों का त्यौहार है क्योंकि सीता को तो अयोध्या लौटने से पहले भी १४ वर्षो का वनवास भोगना पड़ा और अयोध्या लौटने के पश्चात् एक व्यक्ति के अनर्गल प्रलाप पर निर्दोष चरित्र होकर भी पुनः वनवास में जाना पड़ा I

 रावण की तुलना में प्रजा पर नृशंस अमानवीय अत्याचार करने तथा बहन को कारावास में रखकर उसके छः नवजातों को दीवार पर पटककर मार देने वाले क्रूर राजा कंश का कुछ बड़ा वर्णन भी नहीं कर रहा हूँ I किन्तु न जाने किस कौशल से अपने उत्तरवर्ती धार्मिक इतिहास में कंश रावण की अपेक्षा स्वयं को बचा गया !

निष्कर्षतः धार्मिक कथाओं की पुनर्समीक्षा और अनैतिकता के प्रतीकों की पुनर्स्थापना की गंभीर आवश्यकता है I एक प्रश्न यह भी कि दशहरे के अवसर पर रावण के साथ कुम्भकर्ण और मेघनाद के स्थान पर (जिनका दोष मात्र भ्रातृभक्ति, पितृभक्ति तथा राष्ट्रभक्ति था, जो रावण के कृत्यों मैं सहभागी नहीं थे और जिन्होंने रावण को समझाने का प्रयास किया और उसके न समझने पर पराजय एवं मृत्यु का भान होने पर भी लड़े!) इंद्र, वाली, कंश, भीष्म, पांडव, दुर्योधन और पांडव के पुतले क्यों न जलाये जाएं?

लेखक परिचय

prshant

लेखक प्रशांत कुमार मूल रूप से हिसार के रहने वाले हैं और शिमला के लेखाकार विभाग में हिंदी अनुवादक के तौर पर कार्यरत हैं। उम्मीद बाकि है नाम से उनका कविता संग्रह प्रकाशित हो चुका है और हरियाणा साहित्य अकादमी के माध्यम से एक कहानी संग्रह क्षितिज पर वो जो रेखा है भी प्रकाशित हुआ है।

नोट:इस लेख के सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित हैं लेखक कि अनुमति के बिना लेख का कोई भी हिस्सा प्रयोग न करें।

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