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रविदास जयंती 2017 – बेगमपुरा शहर का नाउ

February 10, 2017 1:47 am by: Category: शख्सियत खास Leave a comment A+ / A-

रविदास  जयंती 2017 (10 फरवरी) – रैदास हिंदी साहित्य के स्वर्णयुग माने जाने वाले भक्तिकाल की एक ऐसी आवाज़ जिसमें कबीर का साहस भी है और तुलसी की नम्रता भी। जो दुत्कार भी पुचकार के साथ लगाते हैं। जाति आधारित जिस पहचान का दर्द रैदास ने अपने दौर में झेला आज तलक बरकरार है। हालांकि कबीर रैदास से लेकर ज्योति बा फुले से होते हुए गांधी, भगत सिंह और बाबा साहेब अंबेडकर के प्रयासों के बावजूद जाति आधारित सामाजिक संरचना बरकरार है। जाति को लेकर छुआ-छूत, अस्पृश्यता के मामले में भले ही कमी आई हो वो भी सांविधानिक और कानूनी मजबूरियों के चलते लेकिन दिमागों से ऊंच-नीच का फर्क निकलने में बहुत समय और प्रयास लगेंगे लेकिन जात-पात के इस रोग पर रैदास का यह दोहा आज भी जस का तस प्रासंगिक बना हुआ है।

जात पात के फेर में उरझत हैं सब लोग

मानवता को खात है रैदास जात का रोग

कबीर के समकालीन और गुरुभाई संत रैदास का जन्म भी काशी में हुआ। कबीर जहां खुद को जुलाहा कहते हैं तो रैदास अपने को चमार कहते हैं। साहित्येतिहासकार संत रविदास के पिता नाम रग्घू और माता का नाम घूरविनिया बताते हैं। कुछ पिता का नाम संतोख दास तो माता का नाम कर्मा देवी, कालसा देवी भी लेते हैं। उनकी पत्नी का नाम लोना देवी बताया जाता है उनका एक लड़का भी हुआ जिसका नाम था विजयदास। काशी आरंभ से ही धर्म नगरी मानी जाती है एक और यहां सच्ची श्रद्धा से भक्ति करने वालों की कमी नहीं थी तो दूसरी और धर्म को धंधा बनाकर इसे अपनी बपौति समझने वाले भी बहुत थे। रैदास निर्गुण धारा के संत थे। वे मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रखते थे। ये अलग बात है कि आज कुछ लोग उन्हीं की मूर्ति बनाकर उन्हें पूजते हैं। कबीर के निशाने पर जहां धार्मिक पाखंडी (हिंदू और मुस्लिम दोनों में) होते थे वहीं रैदास जाति व्यवस्था पर करारी चोट करते थे।

जन्म जात मत पूछिये , का जात अरू पात।

रविदास पूत सभ प्रभ के कोउ नहि जात कुजात॥

महानों संतो के जीवन के विषय में विवाद तो हमेशा होते ही हैं। गुरु रविदास का जन्म भी विवादों से अछूता नहीं है लेकिन बावजूद उसके यह माना जाता है कि रविदास की उपस्थिति 16वीं शताब्दी के अंत तक रही है। कुछ विद्वान उनकी उम्र 120 वर्षों की बताते हैं। ख़ैर जन्म की तिथि इतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितने संत रविदास जी के विचार। लेकिन यह भी सच है कि प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव के कारण ही ऐसे महापुरुषों के जीवन से छेड़छाड़ की जाती है। जिस विचार के वे विरोधी रहे हों उसी विचार की मूर्त उन्हें बना दिया जाता है।

ओएमजी यानि ओह माई गॉड फिल्म तो देखी होगी आपने, नहीं देखी है तो देखियेगा बड़ी अच्छी फिल्म है। उसमें एक डायलॉग है कि यदि आप लोगों से उनका धर्म छीनोगो तो लोग आपको ही अपना धर्म मानने लगेंगे। कबीर, रविदास के साथ-साथ न जाने कितने ही संतों के साथ, महापुरुषों के साथ ऐसा हुआ है। रविदास के जीवन को तो इतना चमत्कारिक बना कर पेश किया जाता है कि कहने ही क्या हैं। कलात्मक छूट के नाम पर रविदास के जीवन पर बनी एक फिल्म में रविदास, रैदास जो निर्गुण भगवान को मानने वाले संत थे, को पूरा उपासक बनाने की कोशिश की गई है। फिल्म के अंत तक उन्हें ब्राह्मण घोषित कर दिया जाता है और उनके तन से जनेऊ निकलता है।

एक ओर जहां रविदास कर्म करने पर जोर देते हैं। वे कहते हैं मन चंगा हो तो कठौति में भी गंगा होती है। लेकिन उनके इन्हीं प्रसंगों को जादुई दर्शा दिया जाता है और कठौति में से गंगा की धारा प्रवाहित करवाई जाती है।

उनके जीवन से छेड़छाड़ कर पैदा किये इन चमत्कारों का असल मकसद यही रहा है कि रविदास जिस मार्ग पर चलने की कहते हैं अनुयायियों को दिग्भ्रमित कर उसके विपरीत चलाया जाये। रविदास के विरोधी अपने इस मकसद में काफी हद तक आज कामयाब भी हैं। यकीन न आये तो एक नज़र इस रविदास जयंती पर होने वाले कार्यक्रमों में दौड़ाना। कहीं भी रविदास के विचार नज़र आयें तो…. दिखाई देंगे तो मंदिरों में पूजन, राजनीतिक पार्टियों के एक विशेष समुदाय के कार्यक्रम, हालांकि ऐसा नहीं है कि हर तरफ अंधेरा ही है कहीं कहीं कभी-कभी कोई चिराग रोशन हो उठता है। आज वाकई में जरूरत है कि भक्तिकाल के इस संत को सच्चे मायनों में याद किया जाये और उनके शब्दों को दोहराया जाये। आकलन किया जाये कि आखिर क्यों हम जात के मामले में आज भी 16वीं सदी में खड़े हैं। आज भी हम वैसा ही कुछ चाहते हैं जैसा रविदास उस समय चाहते थे

ऐसा चाहूं राज मैं जहां मिलै सबन को अन्न

छोट बड़ो सब सम बसैं रैदास रह प्रसन्न

इसलिये उन्होंने यह पद लगभग 16वीं शताब्दी में लिखा जिसकी कल्पना आगे चलकर एक युटोपिया के तौर पर साम्यवाद के रूप में हुई। साम्यवादी व्यवस्था और रविदास के बेगमपुरा में कुछ ऐसा ही साम्य है

बेगम पुरा सहर को नाउ ।
दूखु अंदोहु नही तिहि ठाउ।।

नां तसवीस खिराजु न मालु ।
खउफु न खता न तरसु जवालु।।

अब मोहि खूब वतन गह पाई ।
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ।।

काइमु दाइमु सदा पातिसाही ।
दोम न सेम एक सो आही ।।

आबादानु सदा मसहूर ।
ऊहां गनी बसहि मामूर ।।

तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ।
महरम महल न को अटकावै ।।

कहि रविदास खलास चमारा ।
जो हम सहरी सु मीतु हमारा।।

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