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तो क्या आरटीआई के तहत विस्तृत सूचना नहीं मांगी जा सकती !

September 24, 2016 3:02 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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क्या किसी अधिकार को लेकर कोई प्रशासन असमर्थता जता सकता है। क्या लोकतंत्र में जनता के किसी सवाल पर कोई प्रशासनिक अधिकारी बहाना बना सकता है। क्या सरकार कभी ये कह सकती है कि तुम्हारा सवाल बड़ा है इसलिए मैं जवाब नहीं दूंगी। खैर, अगर मसला मौखिक सवालों का हो फिर तो कोई असमर्थता जता भी दे मगर क्या लिखित सवालों को लेकर भी सरकार नुकर-टुकर कर सकती है। लेकिन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को लेकर तो कुछ ऐसा ही वाकया सामने आया है।

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दरअसल दिल्ली सरकार के संबंध में कुछ आरटीआई लगाई गई, आरटीआई के द्वारा पूछा गया कि दिल्ली सरकार द्वारा 14 फरवरी 2015 से 31 अगस्त 2016 तक मुख्यमत्री कार्यलय ने कितनी घोषणाएं की? कितनी घोषणाएं पूरी नही हो सकती? जो घोषणाएं पूरी होने लायक नही हैं या व्यवहारिक नहीं है, उनकी लिस्ट उपलब्ध करवाएं। मुख्यमत्री कार्यालय के जनसूचना अधिकारी ने इस जानकारी को विस्तृत बताते हुए खारिज कर दिया, जबकि कई राज्य इस तरह की जानकारी पहले भी दे चुके हैं। आपको बता दें कि आरटीआई एक्ट 2005 के तहत विस्तृत जानकारी के आधार पर कोई आरटीआई खारिज नही की जा सकती।

जींद निवासी अजय मलिक ने एक आरटीआई के जारिए दिल्ली के मुख्यमत्रीं कार्यालय से दो बिदुओं पर जानकारी मांगी थी। इसे लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अजय मलिक ने बताया कि बिन्दु के तहत जो सूचनाएं मांगी है उस तरह की सूचना कई राज्य पहले भी उपलब्ध करवा चुके हैं। जबकि बिदु दो की सूचना अगर चाहते तो सम्बधित पार्टी के अध्यक्ष जो दिल्ली के मुख्यमत्री भी हैं उनसे पत्र-व्यवहार करके उपल्बध करवाई जा सकती थी, मगर वो उपलब्ध नहीं हो पाई।

खैर, अजय मलिक तो आरटीआई कार्यकर्ता है तो उनकी नाराजगी दिल्ली सरकार से हो सकती है। लेकिन क्या उनकी नाराजगी का ये वाजिब कारण नहीं है कि आरटीआई लगाकर ही आए दिन मीडिया के सामने पोल खोलने के अभियान चलाकर, हर रोज नए-नए डॉक्यूमेंट पेश कर सुर्खियों में आए अरविंद केजरीवाल, जो कि आरटीआई को लोकतंत्र का मजबूत हथियार बताकर उसे और सशक्त करने के वादों से सरकार में आए, मगर उसके बावजूद भी क्या उनकी सरकार द्वारा इस तरह के जबाव देना जायज है, ये जरूर सोचने वाली बात है।

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