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रूचिका सुसाईड केसः घर बैठे ही सजा काटेंगे पूर्व डीजीपी !

September 23, 2016 5:02 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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कुछ मामलों को लेकर कोर्ट सख्त होते हैं तो कुछ को लेकर कानून का नरम रूख भी देखने को मिल जाता है। जेल जाने से राहत मिलना कोई बड़ी बात तो नहीं मगर कुछ मामले इतने पेचिदा हो जाते हैं जिनको लेकर न्याय की अपेक्षा अक्सर रहती है या यूं कहें कि जिसमें पीड़ित पक्ष जान तक से हाथ धो बैठता है ऐसे में पूरी जनता को यही उम्मीद होती है कि कानून जो भी दिशा-निर्देश जारी करेगा वो सही ही होगा। कानून ने पता नहीं न्याय किया है या कुछ और; रूचिका गिरहोत्रा छेड़छाड़ मामले को लेकर हरियाणा के पूर्व डीजीपी शंभू प्रताप सिंह राठौड़ को सर्वोच्च न्यायालय से राहत जरूर मिल गई है।

आपको बता दें कि कोर्ट ने हरियाणा के पूर्व डीजीपी शंभू प्रताप सिंह की सजा को तो बनाए रखा है लेकिन ये भी कहा है कि अब उन्हें जेल नहीं जाना होगा। उन्होंने जितनी सजा काटी है वह काफी है। प्राप्त जानकारी के अनुसार 22 दिसंबर 2009 के दिन घटना को पूरे 19 वर्ष हो चुके थे और मामला कोर्ट में था। इस मामले में डीजीपी शंभू प्रताप सिंह को छेड़छाड़ का दोषी करार दिया गया था, जिसके बाद उन्हें 6 महीने की कैद की सजा और 1000 रूपए जुर्माने की सजा दी गई थी। बता दें कि मामले में हाईकोर्ट ने सजा को 18 महिने किया था लेकिन जब राठौड़ ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की तो न्यायालय ने सुनवाई करते हुए कहा कि उनकी सजा तो जारी रहेगी लेकिन अब उन्हें जेल नहीं जाना होगा।

विदित हो कि साल 1990 में पंचकूला से उभरती हुई टेनिस खिलाड़ी रूचिका गिरहोत्रा (14 वर्षीय) के साथ तत्कालीन आईजी शंभू प्रताप सिंह राठौड़ द्वारा छेड़खानी किए जाने का मामला सामने आया था जिसके बाद कोर्ट द्वारा भी उन्हें दोषी करार दिया गया। वहीं रूचिका द्वारा घटना के तीन साल बाद सुसाईड कर लिया गया था। इसके बाद मामले में सीबीआई जांच भी हुई। जिसमें राठौर को सीबीआई की विशेष अदालत ने दिसंबर 2009 में 6 महिनों की सजा और एक हजार रूपये का जुर्माना लगाया था। जिसके उपरांत उन्होनें इस फैसले को चुनौति देकर हाईकोर्ट से अपनी सजा और अपील बढाने की गुजारिश की थी।

घटना के 26 साल बीत जाने के बाद भी किसी पेचिदा मामले में अगर कोर्ट द्वारा कोई अटके हुए फैसले को इस तरह पूरा किया जाता है तो वो कहीं न कहीं पीड़ित पक्ष तो अखरता ही है। भले ही रूचिका आज जिंदा न हो। भले भारत की वो बेटी आज जिंदा न हो जिंन्होनें किसी क्रूर हाथों का दंश झेलकर लाज और शर्म से शायद अपने आपको खत्म कर लिया। लेकिन क्या किसी भी कोर्ट द्वारा इस तरह के मामलों में इतने देरी से फैसले आना जायज है? क्या किसी की सजा माफ होना या और कम किया जाना उचित है, या ये जायज है कि कोई अपने घर बैठकर सजा पूरी करे? क्या हाल फिलहाल आया फैसला रूचिका की आत्मा के लिए सुकूं का फैसला है? ये तो रूचिका ही बता पाती मगर जनता इसे लेकर कैसा न्याय चाहती है उन्हें जरूर अपनी मांग को लेकर मीडिया के सामने आना चाहिए।

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