Saturday , 25 November 2017

Home » साहित्य खास » सीढियों पर

सीढियों पर

November 14, 2017 11:19 am by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

तब प्रिंट पत्रकारिता के प्रशिक्षण पर था मैं। शहर के बस स्टैंड से टाउन पार्क के पास बने ऑफिस तक रोज पैदल चलना होता था। बीच में रेलवे लाईन के उपर पुल बना हुआ था जिसे पार करना पड़ता था। एक दिन सदा की तरह मैं पुल पार कर रहा था कि छोटा सा बालक उन सीढियों पर बैठा हुआ था।

फटे पुराने कपड़े। पैंट का एक घुटना फटा हुआ। चेहरे पर आते-जाते वाहनों की जमीं धूल। पानी या पसीने के लगने से बने कुछ धब्बे भी।

उसने कुछ ककंर इकट्ठे किए हुए थे। करीब पांच-छह कदम चढने के बाद वो बिलकुल सीढियों के बीचोबीच बैठा उन्हें एक-एक कर नीचे फेंक रहा था। जब एक कंकर दूसरे पर सही लग जाता तो बालक खिलखिला उठता। बस इतनी सी खुशी थी उसकी। जब मैं करीब से गुजरा तो वो धीमी सी आवाज में बोला अंकल पांच रूपये दे दो भोत जोर की भूख लगी है।

मुझे उसकी इस मधुर, पुकारभरी, मासूम और करूणादायक आवाज में रूचि पैदा हुई। मैं उसके पास कुछ देर खड़ा रहकर बैठ गया और बिलकुल शांत स्वर में पूछा, “क्या नाम है मुन्ना?”

“अंकल मेरा नाम गुलाल है, पांच रूपये दे दो जोर की भूख लगी है।“ उसने सब एक साथ लंबे स्वर में कहा। जवाब में वही पीड़ादायक दोहराव था उसके शब्दों में। यूं लगा जैसे पूरे मुल्क की गरीबी और लाचारी उसके मुख से बोल रही हो।

“क्या करता है बेटे !”

“कुछ नहीं अंकल खेलता हूं यहां।“

“तुम्हारे पापा क्या काम करते हैं?”

“रिक्सा चलाते हैं और शराब पीते हैं।“

“कितने बहन भाई हो तुम !”

“तीन”

“पढता है क्या !”

“नहीं, मेरे पापा ने मुझे स्कूल नहीं भिजवाया” और इतना कहकर उसने अपना मुंह एक तरफ कर मोड़ते हुए नीचे कर लिया और अपने पैर के पास पड़ी ठीकरी से अपने पैर पर जमीं मैल की परत कुरेदने लगा। अब उसकी आंखों में अपेक्षाकृत नमीं दिखाई दी मुझे। शरीर पर जमीं मैल, आंखों में लाचारी, चेहरे पर रेत के दाग, मैल से टूटते वस्त्र, आधी बाजू की पुरानी टी-शर्ट; जिसकी एक तरफ की बाजू बिलकुल मैली, जो शायद बार-बार मुंह पोंछने से हुई हो और कई दिन तेल नसीब न होनें पर उसके बालों में आया रूखापन उसके हालातों को सही दृशित कर रहा  था।

मैने पूछा, “ तेरे दूसरे  भाई-बहन पढते हैं !”

“हां”

“कहां?”

“वो हमारे गाम पढते हैं।”

“कौनसा गांव है तुम्हारा!”

“भाईरूपा”

“तू क्यों नहीं पढता?”

“मैं पहले हमारे गाम पढता था मेरे अंकल के पास। मैं रोज स्कूल जाता था, तीन महीने तक, फिर मेरे पापा मुझे यहां ले आए। उन्होनें मुझे स्कूल नहीं भिजवाया।“

“तुम्हारी मम्मी क्या करती है?”

“मेरी मम्मी नहीं है। मर गई मेरी मम्मी।“

“क्या हुआ उनको?”

“अंकल दो साल पहले मेरी मम्मी को लड़का हुआ था तब मेरी मम्मी अस्पताल में थी। डॉक्टर ने  मेरी मम्मी को बचाने के लिए  मेरे पापा से तेरह हजार रूपये मांगे थे। लेकिन मेरे पापा के पास के पास केवल सत्रह सो पचास रूपये ही थे। मेरे पास को और रूपये नहीं दिए किसी ने। तब मेरी मम्मी की मौत हो गई।“

लेखक एस.एस. पंवार हरियाणा के फतेहाबाद जिले से संबंध रखते हैॆं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में  इनकी कविताएं कहानियां व आलेख  प्रकाशित होते रहे हैं। इनकी पहली कहानी  ‘अधुरी कहानी’ नाम से साल 2013 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी की पत्रिका ‘कथा समय’ में प्रकाशित हुई व पहली कविता 2009 में हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘दस्तक’ में छपी। 

सीढियों पर Reviewed by on . तब प्रिंट पत्रकारिता के प्रशिक्षण पर था मैं। शहर के बस स्टैंड से टाउन पार्क के पास बने ऑफिस तक रोज पैदल चलना होता था। बीच में रेलवे लाईन के उपर पुल बना हुआ था ज तब प्रिंट पत्रकारिता के प्रशिक्षण पर था मैं। शहर के बस स्टैंड से टाउन पार्क के पास बने ऑफिस तक रोज पैदल चलना होता था। बीच में रेलवे लाईन के उपर पुल बना हुआ था ज Rating: 0

Leave a Comment

scroll to top