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पैरों से निकलने वाले

December 29, 2017 11:21 am by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

 

 

 

वर्ण-व्यवस्था

 

जो जांघ से निकले थे, वे थोड़ा करीब पहुंचे थे

सत्य तो वो भी नहीं थे,

 

मुख से निकलने वाले बचपन के दिनों के उस सफेद झूठ की तरह थे

जिसमें हमे बताया जाता था

कि हम ट्रेन से लाए गए है, हम हॉस्पीटल से लाए गए हैं

गाय के प्रसव के बाद जैसे हमारी माएं हमें बता रही है कि ये बच्चा मुंह से निकला है

और हम अभी तीन साल के हैं,

 

भुजाओं से जो निकले थे वो जादू की ट्रिप थी इक

थोड़ी देर जिसने

सबका मन बहलाया,

अभी अभी एक कागज जला और एक कबूतर उड़ गया

और हम देखते ही रह गए,

 

सब दर्शक बच्चों से व्यस्क में बदल गए हैं अब

और दर्शक से

सब के सब हो गए हैं बुद्धिजीवी,

 

पैरों से निकलने वालों को दुनियां ने माना

शताब्दी का सूरज कहा उन्हें,

अपनी शिक्षाओं के बल पर तमाम निराधार ग्रंथ झुठला दिए पैरों से निकलने वालों नें

अब पैरों से निकलने वालों को फ्रक है

कि मुंह से निकलने वाले भी

पैरों के विधान पर चल रहे हैं,  शायद कुदरत भी यही कहती है

 

प्रस्तुत कविता वेदों में आधारित वर्ण-व्यवस्था पर चोट करती है, जो नीचे लिखे श्लोक को मध्यनजर रखकर लिखी गई है।

 

ब्राह्मणोऽस्य मुखामासीद्वाहू राजन्यः कृतः।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥

-ऋग्वेद 10.90, यजुर्वेद 31वां अध्याय 

 

जिसका अर्थ है कि उस विराट पुरुष परमात्मा के मुख से ब्राह्मणों की उत्पत्ति हुई, बाहुओं से क्षत्रियों की, उदर से वैश्यों की और पदों (चरणों) से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। यह विराट पुरुष कोई और नहीं स्वयं भगवान विष्णु ही सनातन धर्म में प्रसिद्ध हैं।

लेखक एस.एस.पंवार हरियाणा के फतेहाबाद जिले के रहने वाले हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं और आलेख प्रकाशित होते रहे हैं। पहली कहानी  ‘अधुरी कहानी’ नाम से साल 2013 में हरियाणा ग्रंथ अकादमी की पत्रिका ‘कथा समय’ में प्रकाशित हुई व पहली कविता 2009 में हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘दस्तक’ में प्रकाशित हुई।

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