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रेड सेल्यूट ! कॉमरेड अजीत सिंह ज्याणी

January 13, 2018 9:44 am by: Category: खबर खास, शख्सियत खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

 

पंडित जसराज पार्क की साल 2012 की तस्वीर में कॉमरेड अजित सिंह ज्याणी और पत्रकार एस.एस.पंवार

आदमी की महानता बाजार और भीड़ ही तय करे ये जरूरी नहीं, बुद्धिमता या व्यक्तित्व तौर पर कुछ आदर्श हमारे आसपास भी हो सकते हैं। हमारे पास किसी की कितनी भी यादें हो, जिए हुए पल हो, कोई तस्वीर हो, साक्षात्कार लेख हो, रिकॉर्डिंग्स हो, मगर जब किसी के बगैर हम रोने लग जाएँ, बिखरने लग जाएँ, भटकनें लग जाएँ, तब शायद किसी की असली कीमत मालूम पड़ती है हमें… और सच कहता हूं, किसी से तो हमारा इतना लगावा होना ही चाहिए कि हम पागल हो जाएं…

कोई भगवां किसी को संघ से जोड़ दे या कोई शब्द किसी के वामपंथी होने की घोषणा कर दे; ऐसा जरूरी नहीं। कामरेड अजीत सिंह शायद ऐसा ही नाम था। कॉमरेड अक्सर बताया करते थे कि उन्हें कुछ लोग कहते हैं कि असली कॉमरेड वे ही हैं। क्योंकि कौनसी चीज किस श्रेणी में आती है, ये उऩ्हें अच्छे से पता था। खैर ये बताने पूछने की बात नहीं जिनका पूरा जीवन तथ्यपरक सच्चाईयों, प्रमाणों और प्रयोग आधारित वैज्ञानिक सत्यों की राह चलने लगे या जो एक रूके हुए समाज को समाजवादी बदलाव की ओर ले जाने का संघर्ष करे, उन्हें शायद कॉमरेड कहा जा सकता है। लेकिन इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं, कोई सीपीएम सीपीआई का कार्यकर्ता जरूर शायद इसे अच्छे से परिभाषित कर पाए।

साल 2015 में आज ही का दिन था, 13 जनवरी। जब कॉमरेड अजित सिंह ज्याणी इस भौतिक दुनियां से विदा हो गए थे। कॉमरेड बीमार थे। उन्हें हृदय संबंधी बीमारी थी। उनके निधन के एक दिन पूर्व मैं उनसे मिला था। जाने क्यों उन्हें अपने संबंध में हर तरह की बातों का पहले से ही भान होता था कि उनके साथ कब क्या हो सकता है। उनके बेटे अनिल कुमार ज्याणी बताते हैं कि वे करीब एक महीने पहले ही कहने लग गए थे कि ये उनके आखिरी दिन हैं। 12 जनवरी 2015 को जब मैं उनके घर पर मिलने पहुंचा, और कुछ बातचीत हुई तो कहने लगे ‘अब ज्यादा दिन नहीं जिउंगा…

मैने कहा, क्यों कॉमरेड, ऐसी क्या बात है। आप तो ठीक हो, आप ठीक हो जाओगे जल्द। ( शायद उन्होनें हल्के बुखार की शिकायत होने का भी जिक्र किया था, जहां तक मुझे याद है )

कॉमरेड: बस… ऐसी ही बात है…

( वो चित्र मुझे अच्छे से याद है। वे मेरे सामने मुंह किए बैठे हैं। उन्होनें अपने कोट की जेबों में हाथ डाल रखे हैं। टोपी पहने हुए हैं और गहरी चिंतन मुद्रा में खोए से मुझसे बातें कर रहे हैं। मैं सामने की कुर्सी पर बैठा हूं, जिसके रबर की नालियों सरीखे कुछ तार निकले हुए से है… यूं लगता है जैसे कल की ही तो बात है। ) कॉमरेड उसके अगले दिन चल बसे…

उस बात को तीन बरस बीत गए हैं। कॉमरेड की यादों के रूप में बहुत कुछ संजोया हुआ है मेरे पास। वे अपने से जुड़ी हर बात मुझसे साझा करते थे, जिन्हें मैं रिकोर्ड कर लेता या लिख लेता था। आज उनकी याद (13 जनवरी) में सिर्फ आउटलाईन-भर श्रद्धांजलिपरक लिख रहा हूं।

जिस बरस कॉमरेड का निधन हुआ उससे अगले बरस मई में उनकी जन्म तारीख पर मैंने फेसबुक पर कुछ लिखा। उस पोस्ट को हूबहू पेस्ट कर रहा हूं…  कुछ पंक्तियों के दोहराव के क्षमा चाहूंगा… जो भूमिका में भी वांछनीय लगी। जिसे लिखते वक्त भर्रा गया था मैं।

“आदमी की महानता बाजार और भीड़ ही तय करे ये जरूरी नहीं, बुद्धिमता या व्यक्तित्व तौर पर कुछ आदर्श हमारे आसपास भी हो सकते हैं। हमारे पास किसी की कितनी भी यादें हो, जिए हुए पल हो, कोई तस्वीर हो, साक्षात्कार लेख हो, रिकॉर्डिंग्स हो, मगर जब किसी के बगैर हम रोने लग जाएँ, बिखरने लग जाएँ,भटकनें लग जाएँ, तब शायद किसी की असली कीमत मालूम पड़ती है… कोई भगवां किसी को संघ से जोड़ दे या कोई शब्द किसी के वामपंथी होने की घोषणा कर दे; ऐसा जरूरी नहीं। कामरेड अजीत सिंह शायद ऐसा ही नाम था।

आज ही के दिन यानि 8 मई 1947 को फतेहाबाद के पिली मन्दोरी गाँव में जन्में अजीत सिंह एक समाजसेवी, नेता, सुलझे हुए वक्ता और दार्शनिक भी थे। भारतीय और पश्चिमी दर्शन को आम बोलचाल में लोगों को बताना, समझाना और सम्यक बहस से किसी को सन्तुष्ठ कर देना, लोगों को जीने का एक वैज्ञानिक रास्ता देना, इत्यादि पर उनकी अच्छी पकड़ थी। जब से उन्हें जानने लगा; उनके साथ खूब टाइम बीता। बातें हुई। तर्क हुए। साहित्य को एक दिशा मिली। जाने कितने संस्मरण लिखे गए, साक्षात्कार दर्ज किए, किताब पर भी काम चला। चल ही रहा है। आज भी गाँव आता हूँ तो उनके सम्बन्ध में स्मृतियाँ ढूंढ ही लेता हूँ, आदरणीय खट्टर साहब को छोड़कर हरियाणा का कोई ऐसा सीएम नहीं रहा जो उन्हें प्रत्यक्ष न मिला हो या न जानता हो। उनके राजनीति, संघर्ष और जेल यात्राओं का जिक्र यहाँ नहीं करूँगा।

पिछली 13 जनवरी को 67 साल की उम्र में कामरेड इस दुनियां से चले गए। तब चंडीगढ़ था मैं। व्यस्तताओं के चलते 7 दिन बाद मौत की खबर पहुंची। खूब रोया… एक के बाद एक सारे पल याद आए, सारे साक्षात्कार याद आए… पूरा जीवन याद आया… केस स्टडी और लगाव के चलते आत्मिक रिश्ता जो बन गया था… रिश्ते में ताऊ तो थे ही… पर मैं कामरेड ही कहता था… दोस्त थे हम… हाँ गुरु भी कहूँगा, राजनीतिक दशा-दिशा का ज्ञान, मेरे हर सवाल हर मुसीबत का जवाब था कामरेड के पास…

आज 8 मई है… तुम्हारे जन्म की तारीख… तुम्हें यहीं कहीं गलियों से, पार्क से निकलते देख रहा हूं… किसी मंच से बोलते देख रहा हूँ… मुझे खुद को समझाते महसूस कर रहा हूँ… किसी तहरीर चौक का जिक्र सुन रहा हूँ… किसी रशियन क्रांति की बात सुन रहा हूं… तुम्हारी बहुत याद आ रही है कामरेड, कहीं नहीं गए तुम… तुम जिन्दा हो… हमेशा जिन्दा रहोगे… मेरी स्मृतियों में… यादों में… डायरियों में… तुम्हारे साथ बिताए दिनों में…”  ( 5 मई 2016 )

वे राजनीति के अच्छे जानकार थे। वे वामपंथ के केंद्रिय और अंतरराष्ट्रीय नेताओं से संवाद रखते थे। साल 1977 के आसपास एसयूसीआई पार्टी के बेनर तले उन्होनें विधानसभा का चुनाव भी लड़ा, लेकिन विजयी नहीं हो सके। वे राजनैतिक विचारधाराओं के संबंध एक चुटकी लेते हुए दर्शन अंदाज में अक्सर कहा करते थे, “आ धरती गोल ई कोनी… दो सिरा है इंगा। एक पासै खाणआरा लोग है, अर दूसरै पासै कमाणा रा लोग। अर दो ई राजनीतिक बिच्यारधारा है एक बामपंथी अर दूसरी दक्षिणपंथी… आ बामपंथी विच्यारधारा ई है जकी गरीब, दलित, मजदूर अर किसान ग हक गी बात करै, विग्यान गी बात करै। अर विग्यान प्रमाणित बातां न ई मानै… विज्ञान सच्चाई गै सागै खड़यो है। अगर थे विग्यान गै सागै न हो तो थे झूठ पर खड़या हो।

( अर्थात ये धरती सिर्फ गोल ही नहीं है, इसके दो सिरे हैं। एक तरफ खाने वाले लोग हैं, दूसरी तरफ कमाने वाले लोग। और दो ही राजनैतिक विचारधारा है, एक वामपंथी और दूसरी दक्षिणपंथी। इनमें केवल वामपंथी विचारधारा ही है जो गरीब, दलित, मजदूर और किसानों के हक की बात करती है, विज्ञान की बात करती है। और विज्ञान प्रमाणित बातों को ही मानता है, वो सच्चाई के साथ खड़ा है। अगर तुम विज्ञान के साथ नहीं हो तो तुम झूठ पर खड़े हो। )

 

( आज उनकी याद में चेस क्लब पीलीमंदोरी और जिला चेस एसोसिएशन फतेहाबाद शतरंज प्रतियोगिता करवा रहा है। जिन्हें मेरी ओर से सादर शुभकामनाएं। जानकारी के लिए बता दूं कि गांव पीली मंदोरी में सबसे पहले चेस को लेकर आने वाले कॉमरेड अजित सिंह ज्याणी ही थे। )

लेखक एस.एस.पंवार स्वतंत्र पत्रकार हैं और फतेहाबाद के गांव पीली मंदोरी से संबंध रखते हैं। लेखक के पास कॉमरेड अजित सिंह ज्याणी के साथ बिताए दिनों की कई स्मृतियां है, वे उनके जीवन पर ‘अपने साथ बीते दिनों’ को एक किताब की शक्ल दे रहे हैं। उनका व्यक्तिगत अध्ययन अब भी जारी है।

 

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