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कबीर- धार्मिक आंडम्बरो के खिलाफ लङने वाले महान समाज सुधारक

June 27, 2018 11:00 am by: Category: खबर खास, साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

कबीर- धार्मिक आंडम्बरो के खिलाफ लङने वाले महान समाज सुधारक

विभिन्न साक्ष्यों और विद्वानों के मतानुसार यह ज्ञात होता है कि कबीर अनपढ़ थे, अतः उन्होंने स्वयं कोई भी रचना लिपिबद्ध नहीं की। इनके नाम से प्रसिद्ध रचना परिमाण में बहुत अधिक मिलती हैं. इनके प्रति अनन्य श्रद्धा एवं सम्मान प्रकट करने में अन्य संत-कवियों की रचनाएँ भी कबीर की रचनाओं में शामिल कर दी गई है। चूँकि कविता का रूप मुक्तक था, इसलिए घटाना-बढ़ाना आसान था। अतः कबीर के नाम से इनकी वास्तविक रचना पाना कठिन है. कबीर कृत रचनाओं की संख्या निर्धारण के लिए विद्वानों ने प्राय: अपना ध्यान तीन ग्रंथों-‘बीजक’, ‘आदिग्रंथ’ और ‘कबीर ग्रंथावली’ पर ही आधारित रखा है। इनकी रचनाओं को ‘साखी’, ‘सबद’, और ‘रमैनी’ – नामक तीन भागों में बाँटा गया है. विभिन्न ग्रंथों में साखी, सबद, रमैनी से सम्बंधित पदों की संख्याएँ भी अलग –अलग बताई गई है। बाबू श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर ग्रंथावली’ में 1134 साखियाँ, 403 पद और 21 रमैनियाँ संगृहित हैं ।

Jai Pal Nehra

                         कबीर जिस युग में पैदा हुए थे, वह मुस्लिम काल था। वे जिस जुलाहा जाति में पले-बढ़े थे, वह एक दो पीढ़ी पहले मुसलमान हो चुकी थी लेकिन न केवल कबीर की जुलाहा जाति बल्कि हिन्दू समाज की जो भी दलित जातियाँ इस्लाम स्वीकार कर चुकी थी, उनके पुराने संस्कारों, रीति रिवाजों और धार्मिक-विश्वासों में अधिक बदलाव नहीं आया था। वे जातियाँ न पूरी तरह हिन्दू थी और न पूरी तरह मुसलमान। स्वयं कबीर की जुलाहा जाति में, जो इस्लाम कबूल करने के पहले नाथपंथी जोगी (योगी) जाति थी, नाथ पंथ और हठयोग की बहुत सारी बाहें पहले की तरह सुरक्षित थी। हिन्दू-समाज में इस प्रकार की दलित जातियों का स्थान बहुत नीचा था और ये ऊची जातियों के भेद-भाव और अन्याय-अत्याचार का शिकार थी। इसलिए इनमें सामाजिक असमानता के प्रति विद्रोह का भाव होना स्वाभाविक था।

कबीर बचपन में ही सामाजिक भेद-भाव और छुआछूत से अच्छी तरह परिचित हो गये थे क्योंकि बालक कबीर का “खतना” करने से मौलवियों ने इनकार कर दिया था। मुसलमानों का एक वर्ग कहता था कि पहले कबीर को “कलमा” पढ़ाकर उसका ‘हरामीपन’ खत्म किया जाए, फिर ‘खतना’ किया जाए लेकिन दूसरा प्रभावशाली मुस्लिम वर्ग यह मानता था कि ‘नफइता’ (अवैध) बच्चा कभी सच्चा मुसलमान नहीं बन सकता। कबीर को न ही मुसलमान माना गया और न बनाया गया। हिन्दू उनसे मुसलमानों जैसा बरताव करते थे। इस दोहरे भेदभाव ने कबीर को एक ऐसा आदमी बनाया, जो सभी धर्मो से परे था।

बड़ा होने पर कबीर के मन में समाज के प्रति कड़वाहट पैदा होने लगी। उन्होंने देखा कि ज़मीन-जायदाद और जाति ने आदमी को ऊँचे-नीचे लोगों में बाँट दिया है। जो लोग ऊँची जाति के माने जाते थे वे लोग निम्न जातियों से ‘बेगार’ कराना (मुफ्त काम कराना) अपना अधिकार समझते थे और उनको मजदूरी देने में अपनी ऊचाई तथा उनकी नीचता का एहसास कराते थे। निम्न जातियों के बारे में मुल्ला-मौलवी और ब्राह्मणों का तर्क था कि ईश्वर ने नीची जातियों को ऊँचे लोगों की सेवा करने के लिए ही बनाया है।

उस समय का हिन्दू समाज अनेक जातियों और सम्प्रदायों में बंटा था। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र के अतिरिक्त वेदपाठी, उदासी, नागा(नंगा), भिक्षाटन करने वाले, मोरपंखधारण करने वाले, शराब पीकर अपने को सिद्ध मानने वाले, तन्त्र-मंत्र और भांग की साधना में लगे हुए, जोगी, संन्यासी, मौनी, जटाधारी, शैव-शाक्त वैष्णव आदि अपने को एक दूसरे से श्रेष्ठ मानते थे।

हिन्दुओं में इस जाति व्यवस्था का सबसे निंदनीय रूप था छुआछूत, ऊँची जाति के लोग निम्न जातियों से छुआछूत का व्यवहार करते थे। ब्राह्मण-वर्ग देवी-देवता के नाम पर जीव हत्या में लगा हुआ था। दूसरी ओर, देश का शासक मुस्लिम समाज था, जो हिन्दुओं को अपने से छोटा समझता था। इस समाज के प्रतिनिधि बादशाह, सरकारी कर्मचारी, काजी, मुल्ला और मौलवी अपने धर्म को एक मात्र सच्चा धर्म मानते थे और हिन्दुओं के धर्मांतरण में विश्वास रखते थे। वे यह मानने को तैयार नहीं थे कि अल्लाह और ईश्वर में कोई भेद नहीं है; नमाज़ और पूजा दोनों एक ही समान हैं। यह समझने को वह कतई तैयार नहीं थे कि हिन्दू और मुसलमान एक ही ईश्वर या अल्लाह की संतान हैं, इसलिए दोनों भाई है।

धर्म के मामले में, वे भी हिन्दुओं की तरह बाहरी आडम्बरों में विश्वास करते थे। वे रोज़ा, नमाज़, हज आदि की औपचारिकता को सच्ची ईश्वर भक्ति मानते थे, मस्जिद को खुदा का घर मानते थे लेकिन उसके दूसरे घर- ‘मंदिर’ को अपवित्र मानते थे। मुसलमानों में अपने धर्म और आदर्शो के प्रति कट्टरवादी दृष्टिकोण पहले से मौजूद था अतः वे क़ुरान में वर्णित तरीके से ही अपना जीवन-यापन करना उचित समझते थे। वे लकीर के फकीर बने हुए थे इसलिए सिद्धांतों में तनिक भी परिवर्तन लाने के पक्ष में नहीं थे। इस प्रकार मध्यकाल के हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों में धर्म की विकृति सम्मान रूप से व्याप्त थी। सामान्य जनता पर दोहरी मार पड़ रही थी। एक ओर, अपने ही हिन्दू धर्म के ठेकेदारों की संकीर्ण और अमानवीय प्रवृत्ति की तो दूसरी ओर, आततायी शासक वर्ग के दम्भ और अत्याचार की। ऐसे भारतीय समाज को व्यावहारिक ज्ञान देकर समय के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक था. इसी आवश्यकता की पूर्ति हेतु कबीर जैसे संतों ने आजीवन प्रयास किया।

कबीर ने लोगों को कर्मकांड, आडम्बरों और कुरीतियों के खिलाफ लड़ने की शिक्षा दी और सत्संग-मंडलियाँ स्थापित कीं, जो मंदिरों-मठों और मस्जिदों की काली करतूतों का पर्दाफाश कर सकें तथा आम जनता को बता सकें कि पुरोहित-मुल्ला किस प्रकार लोगों को लोक परलोक का भय दिखाकर ठगते रहते हैं। ये लोग खुद तो काम-चोर प्रवृत्ति और परजीवी मानसिकता के होते हैं, फिर भी अपने आप को महान और गरीब निम्न वर्ग को नीचा बताते हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि सताये हुए और मेहनतकश लोग कबीर के साथ हो लिए. धीरे धीरे लोगों ने मंदिर-मस्जिद का रुख करना छोड़ दिया। लोगों के आचरण में परिवर्तन आने लगा। मंदिर मस्जिद में चढावों की कमी से पंडों और मौलवियों की चिंता बढ़ने लगी। जो पुरोहित और मुल्ला एक दूसरे के विरोधी माने जाते थे, वे धीरे धीरे एक होने लगे क्योंकि दोनों की सत्ता छिन्न रही थी। इसलिए धर्म-भेद भूलकर उन लोगों ने कबीर के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल दिया। वे कबीर को ढोंगी बताकर, गरीबों को बहकाकर समाज में फूट डालने का आरोप लगाने लगे और उन्हें देश द्रोही साबित करने लगे। इंतना ही नहीं, वे उन्हें अनपढ़ और अज्ञानी बताकर उनका उपहास करने लगे। किन्तु कबीर समाज के कटु-अनुभवों और सत्संगति से ऐसी विलक्ष्ण शिक्षा प्राप्त कर चुके थे जो वेद पुराण और क़ुरान-हदीस से श्रेष्ठ थी।

कबीर के लिए वह पोथी अर्थात धार्मिक पुस्तक, जिसमे मानव-प्रेम का सन्देश न हो, व्यर्थ एवं हेय थी। इस मानवीय प्रेम को पढ़ने के लिए त्याग की योग्यता होनी चाहिए और पढ़ाने के लिए खांटी व्यवहार का सबक। कबीर के पास प्रेम का बल और ज्ञान की तलवार थी, जिससे वे धीरे धीरे पूरे समाज के होते चले गए। समाज को ठगने वाले पुरोहितों और मौलवियों की कलई खुल रही थी, इसलिए वे तिलमिलाकर पूरी शक्ति से कबीर के खिलाफ प्रचार में जुट गए और अनेक प्रकार के षड्यंत्र रचने लगे परन्तु अपने समय के सच्चे प्रहरी कबीर के झंझावातों के सामने टिक न सके।

कबीर ने तत्कालीन सामाजिक बुराइयों के सुधार का प्रयत्न किया किन्तु इसके लिए कोई विकल्प अथवा नई व्याख्या प्रस्तुत नहीं की बल्कि ईश्वर में विश्वास रखते हुए, मन और आचरण के परिष्कार द्वारा समाज का सुधार करना चाहते थे। उन्होंने व्यक्ति को समाज-व्यवस्था की प्राथमिक इकाई माना और व्यक्ति-सुधार के माध्यम से समाज सुधार का आदर्श अपनाया। वे दूसरों का सुधार करने से पहले अपना सुधार करना चाहते थे उनका मानना था कि जहाँ समाज के व्यक्ति आदर्श बन जाएँगे वहां सम्पूर्ण समाज आदर्श बन जाना स्वाभविक ही है। उनके आदर्श समाज में जो व्यक्ति अपने ज्ञान से समाज की सेवा करता वह ब्राह्मण है; जो अपने पराक्रम से देश व धर्म की रक्षा करता है, वह क्षत्रिय है, जो देश के उत्पादन को सर्वत्र हर समय उपलब्ध करा कर समाज की सेवा करता है वह वैश्य है और जो अपनी क्षमता, कौशल या योग्यता से समाजोपयोगी वस्तुओं का निर्माण करता है अथवा अन्य रूप से समाज की सेवा करता है, वह शूद्र है । अपनी अपनी योग्यता, क्षमता, कौशल, रुचि, स्वभाव आदि के अनुरूप सभी वर्गों वर्णों जातियों और व्यक्तियों का प्रमुख धर्म या कर्तव्य समाज सेवा है। केवल जन्म के आधार पर ब्राह्मण शूद्र अथवा हिन्दू मुसलमान आदि का भेद करना न केवल प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध है बल्कि मानव समाज के हितों के लिए हानिकरक भी है। इसलिए सामान्य हितों की रक्षा करने वाले नियमों का पालन किसी दबाव, दंड या भय से नहीं बल्कि अपने मन में त्याग की भावना, परहित की कामना और ईश्वरीय न्याय को ध्यान में रखकर करना चाहिए ऐसे कर्तव्य पालन से जहाँ स्वयं को संतुष्टि प्राप्त होगी वहीँ यह सर्वग्राह्य भी होगा। 

ऐसे कर्तव्य पालन से जहाँ स्वयं को संतुष्टि प्राप्त होगी वहीँ यह सर्वग्राह्य भी होगा। क्योंकि इसमें सामाजिक भलाई की भावना निहित होगी। उन्होंने ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की है, जिसमें किसी का किसी से, किसी प्रकार का भेद भाव न हो और सबकी उन्नति के लिए समान अवसर उपलब्ध हो सके।

वास्तव में, पथभ्रष्ट समाज को उचित मार्ग पर लाना ही कबीर का मुख्य उद्देश्य था, जिसके लिए वे अपने समय के समाज के सच्चे प्रहरी बनकर समाज को जगाने का आजीवन प्रयास करते रहे। वे मुख्यतः एक आध्यात्मिक व्यक्ति थे, इसलिए उनका किसी से न कोई विरोध था और न लगाव ही, किन्तु मानवता की भलाई के लिए, समस्त सामाजिक विरोध समाप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहे। जिसके लिए, व्यक्तिगत सुधार एवं आत्मपरिष्कार पर बल दिया क्योंकि इसी से समाज का परिष्कार संभव हो सकता है। समाज में रहने वाले व्यक्तियों के लिए किन्ही आदर्शों का पालन आवश्यक होता है. आदर्शों के पालन से मानव का दृष्टिकोण उदार बन जाता है और वह विश्व कल्याण में अपना कल्याण मानने लगता है। कबीर अपने हाथों अपना उद्धार करने के प्रबल समर्थक थे अतः उन्होंने इसके लिए चरित्र निर्माण और सदाचरण के आदर्शों को प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि जैसे शरीर के किसी एक अंग के रोग-पीड़ित होने पर सम्पूर्ण शरीर व्यथित हो उठता है, वैसे ही यदि कोई व्यक्ति पथ भ्रष्ट हो जाये तो समूचा समाज कलंकित हो जाता है। संक्रामक रोग के कीटाणु की भांति वह कलंक व्याप्त हो जाता है और धीरे-धीरे समाज का स्वरूप घृणित बन जाता है। कबीर के समय, समाज ऐसे ही रोगों से पीड़ित था, उसके अंग-प्रत्यंग में बुराइयाँ घुस चुकी थीं, जिसके लिए उन्होंने अमोघ औषधि परिष्कार की निकाली, जिसको व्यक्तिगत सुधार के माध्यम से लागू करने का प्रयत्न किया।

विभिन्न साक्ष्यों और विद्वानों के मतानुसार यह ज्ञात होता है कि कबीर अनपढ़ थे, अतः उन्होंने स्वयं कोई भी रचना लिपिबद्ध नहीं की। इनके नाम से प्रसिद्ध रचना परिमाण में बहुत अधिक मिलती हैं. इनके प्रति अनन्य श्रद्धा एवं सम्मान प्रकट करने में अन्य संत-कवियों की रचनाएँ भी कबीर की रचनाओं में शामिल कर दी गई है। चूँकि कविता का रूप मुक्तक था, इसलिए घटाना-बढ़ाना आसान था। अतः कबीर के नाम से इनकी वास्तविक रचना पाना कठिन है. कबीर कृत रचनाओं की संख्या निर्धारण के लिए विद्वानों ने प्राय: अपना ध्यान तीन ग्रंथों-‘बीजक’, ‘आदिग्रंथ’ और ‘कबीर ग्रंथावली’ पर ही आधारित रखा है। इनकी रचनाओं को ‘साखी’, ‘सबद’, और ‘रमैनी’ – नामक तीन भागों में बाँटा गया है. विभिन्न ग्रंथों में साखी, सबद, रमैनी से सम्बंधित पदों की संख्याएँ भी अलग –अलग बताई गई है। बाबू श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर ग्रंथावली’ में 1134 साखियाँ, 403 पद और 21 रमैनियाँ संगृहित हैं ।

कबीर ने ब्रह्म, माया, जीव, जीवन-जगत की क्षण-भंगुरता, सत्संग, धार्मिक-सामाजिक कुरीतियों की आलोचना, नीति-उपदेश सम्बन्धी अनेक विषयों का समावेश अपने पदों में किया है।
सामाजिक विषमताओं, धार्मिक- विडम्बनों, बाह्याडम्बरों पर प्रहार के साथ साथ मानवीय गुणों की प्रतिष्ठा पर बल दिया है. इस प्रकार, कबीर की सामाजिक दृष्टि को निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है ।

बस्ती जिले को काटकर बने नए जिले संत कबीर नगर के मगहर नामक स्थान पर कबीरदास जी की मज़ार आज भी है जो की गोरखपुर से 30 किमी. की दूरी पर है।

Jai Pal Nehra कि फेसबुक वाल से…..

 

नोट:- प्रस्तुत लेख में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। लेख के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है।

 

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