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ए! नए साल

December 31, 2017 8:47 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

ए! नए साल

 

– संदीप कुमार

 

ए! नए साल
कुडे के ढेर से खाना बटोरकर
खाने की चाह मेरी नहीं है

कड़कड़ाती ठंड में नंगे बदन
ठिठुरने की चाह मेरी नहीं है
नहीं है मेरी चाह
रात खुले आसमान नीचे गुजारूं

ए! नए साल
शराबी पति को झेलना मेरी इच्छा नहीं है
मुझे बात बात पर कमजोर बताया जाए
मैं नहीं सुनना पसंद करती
मेरी इच्छा के विरूद्द घसीट ले बिस्तर में
पसंद नहीं है मुझे

वह दोस्तों के साथ मटरगस्ती करे
मुझे प्रत्येक फोन पर सफाई देनी पड़े
स्वीकारीय नहीं है मुझे

ए! नए साल
कमरतोड़ मेहनत के बाद
मैं नहीं चहाता महिनों
मजदूरी के लिए भटकता रहूं
दो मिनट लेट होने पर
गालियां सुनना मुझे पसंद नहीं हैं

ए! नए साल
खेतों से मुझे नफरत नहीं है
नहीं चहाया मैंने फसल
सड़को पर बिखेरूं
फांसी पर झूलना मेरी इच्छा नहीं
सरकारी नीतियों का परिणाम है
ए! नए साल
दुश्मन को आगाह कर
हम सब लुटे पिटे लोग एक हो गए हैं
कभी नहीं चहाया हमने हथियार उठाएं
जब कोई गर्दन पर छुरी रख दे
तो बता ?
ए! नए साल
हम क्या करें ?
ए! नए साल
हम लड़ने का संकल्प लेंगे
और लड़ेगे
जबतक आखिरी आदमी को
रोटी,कपड़ा और मकान
मुहैया ना हो जाए

ए! नए साल
हमारी चाह नहीं रही
खाली बैठकर खाने की

– संदीप कुमार

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