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साल का पहला सपना

तभी सायरन बज गया। सारे स्टूडेंट पुलिस द्वारा पकड़-पकड़ कर हॉस्टल में बंद कर दिए। वहां उनकी वैसे ही गिनती हो रही थी जैसे जेल में कैदियों की होती है। सबसे बुरा ये था कि किसी भी स्टूडेंट में कोई विरोध का भाव नहीं था।

January 1, 2018 7:58 pm by: Category: साहित्य खास Leave a comment A+ / A-

साल का पहला सपना

             किसी महान आदमी का कथन है कि सपने वो नहीं होते जो हमें नींद में आते है बल्कि सपने वो होते है जो हमें सोने नहीं देते। पर सपने तो सपने होते है। हर रोज नींद में आ जाते है अच्छे या बुरे। उन्हें नए साल का भी नहीं पता होता। आज सुबह सपना आया बहुत अजीब। सुबह से उसी सपने के बारे में सोच रहा हूँ। जाने कहाँ कैसे इस तरह के सपने की बुनियाद पड़ी होगी।

 सपने में मैंने दोबारा कॉलेज में दाखिला ले लिया। मैं बहुत खुश कि पिछली बार तो ऐसे ही आवारागर्दी में कॉलेज वेस्ट कर दिया। इस बार अच्छे से पढूंगा। पर जैसे ही क्लास में जाता हूँ क्या देखता हूँ क्लास में क्लास टीचर के साथ चार पुलिस वाले भी खड़े है डंडे लेकर। सब स्टूडेंट सहमे हुए बैठे है। जैसे ही कोई स्टूडेंट कुछ पूछने के लिए खड़ा होता पुलिस वाला जोर से डंडा मार देता। सभी स्टूडेंट सांस भी मुश्किल से ही ले रहे थे।

मैं भी चुपचाप बैठा अपनी किस्मत को रो रहा था कि अब दोबारा पढ़ने का मौका मिला तो ये हाल हो गया। ये पुलिसवाले यहाँ क्या कर रहे है। क्लास ख़त्म होने के बाद लाइब्रेरी की तरफ जाने की सोची तो देखता हूँ लाइब्रेरी में से धुआँ उठ रहा है। मैं जब वहां पहुँचा तो देखा लाइब्रेरी में यज्ञ हो रहा है सारी किताबें एक-एक करके उस यज्ञ के हवन में स्वाह हो रही थी।

जहाँ पर बच्चे बैठकर पढ़ा करते थे वहाँ भी मंदिर बन गया है। यूनिवर्सिटी का वीसी खुद ही यज्ञ का पंडित बना हुआ है। मेरा रोने का मन हुआ। मेरा पूछने का मन हुआ कि ऐसी किताबों से क्या दिक्कत है। क्यों जला रहे हो इन्हे। तभी देखा वहां बड़े बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था।

पूछना मना है

सोचना मना है।

          मैं यूनिवर्सिटी के सारे परिसर में घूम आया हर जगह ” मना” ही ” मना ” लिखा हुआ था। एक स्ट्रीट लाइट के नीचे ” पढ़ना मना है ” लिखा हुआ था। जहाँ पर बैठकर विद्यार्थी डिस्कसन किया करते थे वहां गमले ही गमले रखे हुए है। जहाँ पहले गमले रखे हुए थे वहाँ गोबर ही गोबर रखा हुआ था। हर जगह इतनी पुलिस थी कि यूनिवर्सिटी से ज्यादा पुलिस स्टेशन लग रहा था।

मैंने डरते हुऐ एक लड़के से पूछा कि भाई ये क्या हो रहा है। उस लड़के ने बहुत धीमे से बताया कि ये सवाल पिछले महीने एक स्टूडेंट ने पूछा था वो आज तक मिला नहीं किसी को। इतना कहते ही वो लड़का भाग लिया। एक पुलिस वाला मेरे पास आकर पूछने लगा कि क्या बात है। मैंने कहा कुछ नहीं मैं नया हूँ आज ही आया हूँ।

तभी सायरन बज गया। सारे स्टूडेंट पुलिस द्वारा पकड़-पकड़ कर हॉस्टल में बंद कर दिए। वहां उनकी वैसे ही गिनती हो रही थी जैसे जेल में कैदियों की होती है। सबसे बुरा ये था कि किसी भी स्टूडेंट में कोई विरोध का भाव नहीं था।

मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आने लगे। कैसे बात बेबात पर हुड़दंग सब करते रहते थे। छोटी सी बात पर कॉलेज बंद करवा देते थे। सब कहते थे कि जवानी के जोश को काबू में करना सबसे मुश्किल है पर यहाँ तो कोई जवान दिख भी नहीं रहा था सब स्टूडेंट बूढ़े-बूढ़े थे कंधे झुके हुए थे।

सुबह उठा तो बहुत बैचेनी महसूस हुई। साल के शुरुवात ऐसे सपने से हुई है। मैं पॉजिटिव होने की सोच रहा था कल ही। 

अमोल सरोज

लेखक परिचय – अमोल सरोज हरियाणा के हिसार में रहते है। लेखन व सामाजिक कार्यो में रूची रखते है। 

नोट:- प्रस्तुत व्यंग में दिये गये विचार या जानकारियों की पुष्टि हरियाणा खास नहीं करता है। यह लेखक के अपने विचार हैं जिन्हें यहां ज्यों का त्यों प्रस्तुत किया गया है। व्यंग के किसी भी अंश के लिये हरियाणा खास उत्तरदायी नहीं है

साल का पहला सपना Reviewed by on . साल का पहला सपना              किसी महान आदमी का कथन है कि सपने वो नहीं होते जो हमें नींद में आते है बल्कि सपने वो होते है जो हमें सोने नहीं देते। पर सपने तो सपन साल का पहला सपना              किसी महान आदमी का कथन है कि सपने वो नहीं होते जो हमें नींद में आते है बल्कि सपने वो होते है जो हमें सोने नहीं देते। पर सपने तो सपन Rating: 0

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