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नौटंकी के सहारे राजनीति कब तक?

January 2, 2017 3:18 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

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नव वर्ष का पहला दिन। घने कोहरे में शुरू। सूरज कहीं दिखता नहीं। अभी प्रधानमंत्री का न्यू ईयर गिफ्ट लोग संभाल रहे हैं कि अरूणाचल से पेमा खांडू ने कमल खिलाकर प्रधानमंत्री को ही रिटर्न गिफ्ट दे दिया। एक वर्ष में दो-दो बार पार्टियां बदलकर पेमा खांडू ने यह कारनामा कर दिखाया। पहले कांग्रेस की सरकार के मुख्यमंत्री बने। फिर पीपल्स पार्टी ऑफ अरूणाचल में पूरा मंत्रिमंडल लेकर शामिल हो गए। रातें-रात कांग्रेस की सरकार बदलकर पीपीए की सरकार बना दी, जैसे कांग्रेस की बनाई थी। हरियाणा के चौधरी भजनलाल का रिकार्ड तोड़ दिया। दो-दो बार पूरा मंत्रिमंडल लेकर दल-बदल कर गए। अब तीसरी बार भाजपा का कमल खिला दिया। पीपीए ने पेमा खांडू सहित सात सदस्यों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते निलंबित कर दिया था। पेमा खांडू फिर 32 विधायकों को लेकर भाजपा में शामिल हो गए और तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। ये कलाबाजियां दल-बदल के सहारे-कमाल हैं! कांग्रेस का एक ही विधायक बचा है। पीपीए का मुख्यमंत्री पद का विधायक देखता ही रह गया। यह है राजनीति की हिट पटकथा नंबर वन, इस ओर ध्यान इसलिए कम गया क्योंकि यूपी की समाजवादी पार्टी का दंगल चल रहा है। दूसरे प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का इंतजार था। एक बार तो समाजवादी पार्टी के पिता-पुत्र के बीच चलते दंगल ने यह भी भुला दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं करने वाले हैं। ऐसे में अरूणाचल जैसे छोटे राज्य की सत्ता की पटकथा में किसकी दिलचस्पी रह गई थी! फिर भी पेमा खांडू तो जैसे रिवॉलविंग कुर्सी पर बैठे हैं, जिस पार्टी का नाम लेते हैं, पार्टी उनकी ओर घूम जाती है, जैसे पार्टियां न होकर सूरजमुखी के फूल हों, पेमा खांडू सूर्य हों और पार्टियां उनको देखकर ही घूम रही हों। धन्य हो पेमा खांडू, वाह! कांग्रेस से पीपीए और पीपीए से भाजपा, क्या-क्या करिश्मे कर दिखाए।

अब जरा समाजवादी पार्टी के पिता-पुत्र के दंगल की बात करें। रामगोपाल यादव ने पहली जनवरी को पार्टी की बैठक क्या बुलाई कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नेताजी मुलायम सिंह यादव न केवल रामगोपाल बल्कि अपने बेटे अखिलेश से बुरी तरह खफा हो गए। मीडिया के सामने चचेरे भाई रामगोपाल और बेटे सीएम अखिलेश को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते छह-छह साल के लिए निकाल बाहर किया। अखिलेश ने भी विक्रमादित्य की तरह हठ न छोड़ा और विक्रमादित्य मार्ग पर अपने आवास पर विधायकों की बैठक बुला ली। विधायक नेताजी की बैठक में न जाकर अखिलेश की बैठक में चले गए। पार्टी टूटने के खतरे के साथ-साथ अपने बाहुबली होने पर मंडराते खतरे को देखकर नेताजी ने आजम खां का कहना मानना ही बेहतर समझा और आजम खां पुत्र अखिलेश को मनाकर पिता के पास लाए। फिर क्या था? बेटे ने बाप के पांव छुए। पिता भावुक हो गया और कहा कि मैं कभी तुम्हारे खिलाफ नहीं था और बेटे ने भी भावुक होकर कहा कि मैं आपको यूपी का चुनाव जीतकर तोहफा दूंगा। यह पिता-पुत्र का मिलन आजम खां ने देखा। चाचा शिवपाल ने बाहर आकर घोषणा की कि रामगोपाल और अखिलेश को पार्टी में वापस ले लिया है और चुनाव के लिए प्रत्याशियों की सूची फिर से बनाएंगे। लोजी दूसरी हिट पटकथा! भाजपा इसे समाजवादी नौटंकी करार दे रही है जबकि अरूणाचल में सत्ता परिवर्तन। ये दो-दो नीतियां कैसे? अरूणाचल में भी तो नौटंकी चल रही है। कब तक राजनीति में नौटंकी चलती रहेगी? क्या यूपी की जनता या अरूणाचल के लोग कठपुतलियां नचाने वालों को पहचानेंगे नहीं?

इन कलाबाजियों को देखकर यही कह सकते हैं:

नाचती हैं कठपुतलियां, नचाने वाला कोई और है,

बस दिखती नहीं डोर है.

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लेखक परिचय

लेखक कमलेश भारतीय हरियाणा ग्रंथ अकादमी के पूर्व उपाध्यक्ष रहे हैं। इससे पहले खटकड़ कलां में शहीद भगतसिंह की स्मृति में खोले सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ग्यारह साल तक हिंदी अध्यापन एवं कार्यकारी प्राचार्य।  फिर चंडीगढ से प्रकाशित दैनिक ट्रिब्यून समाचारपत्र में उपसंपादक,  इसके बाद हिसार में प्रिंसिपल रिपोर्टर । उसके बाद नवगठित हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष बने। कथा समय मासिक पत्रिका का संपादन। मूल रूप से पंजाब के नवांशहर दोआबा से, लेकिन फिलहाल रिहाइश हिसार में। हिंदी में स्वतंत्र लेखन । दस संकलन प्रकाशित एवं एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री पुरस्कार।

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