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… तो क्या लश्कर ने करवाया था समझौता ब्लास्ट ?

August 21, 2016 1:15 pm by: Category: खबर खास Leave a comment A+ / A-

कहते हैं कानून अंधा होता है, कानून के आंख पर बंधी पट्टी शायद इस बात की इजाजत नहीं देती कि फैसला किसकी तरफ देखकर किसके पक्ष में फैसला लेना है। लेकिन कई बार कानून की प्रक्रिया इतनी लंबी हो जाती है कि आम जन… फिर सरकारों, पड़ौसी मुल्कों और सर्वोच्च सत्ताओं पर संदेह करने लगता है। बहुचर्चित समझौता ब्लास्ट नाम तो आपने सुना ही होगा, और सुना ये भी होगा कि इसकी जांच की प्रक्रिया काफी लंबी चल गई है, और कई रूप ले गई, मामला फिलहाल कोर्ट में है। दरअसल 19 फरवरी 2007 को होने वाली किसी घटना की जांच या कहें कि न्याय मिलने की प्रक्रिया इतनी लंबी चल जाए; आश्चर्यजनक तो है ही, बात चिंताजनक भी है।

क्या है समझौता ब्लास्ट

19 फ़रवरी 2007 को भारत और पाकिस्तान के बीच चलने वाली ट्रेन समझौता एक्सप्रेस में कुछ विस्फोट हुए, जिसे कि एक आतंकवादी घटना माना जाता है। बता दें कि यह ट्रेन दिल्ली से अटारी, पाकिस्तान जा रही थी, विस्फोट हरियाणा के पानीपत जिले में चांदनी बाग पुलिस स्टेशन के अंतर्गत शिवा गांव के नजदीक हुए। विस्फोट से लगी आग इतनी भयानक थी कि इससे 68 लोगों की मौत हो गई और 11 अन्य लोग घायल हो गए, मारे गए ज़्यादातर लोग पाकिस्तानी नागरिक थे। ये विस्फोट पाकिस्तान के तात्कालीन विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी की भारत यात्रा के ठीक एक दिन पहले हुआ।

samjhota blast

क्या हुआ इसके बाद      

विस्फोट के बाद हुई जांच के दौरान ट्रेन में और विस्फोटक साम्रगियाँ भी पाई गई। बाद मे बचे हुए आठ डिब्बों के साथ ट्रेन को पाकिस्तान के लाहौर शहर की ओर रवाना कर दिया गया और यहां पर हुए विस्फोटो की भारत और पाकिस्तान दोनों जगह कड़ी निंदा भी हुई। करीब चार साल की जांच प्रक्रिया चली जिसके बाद एजेंसियों ने इस धमाके का मास्टरमाइंड स्वामी असीमानंद को बताया था, जो कि एक आरएसएस कार्यकर्ता रहे हैं। जानकारी के लिए बता दें कि असीमानंद पर हैदराबाद की मक्का मस्जिद और अजमेर दरगाह में भी 2007 में हुए विस्फोट के संबंध में आरोप हैं। ब्लास्ट के कुछ महिनों बाद भी जांच एजेंसी को कोई अहम सुराग हाथ नहीं लग पाया। वहीं इस केस में अचानक तब तेजी आई जब धमाकों में इस्तेमाल सूटकेस का लिंक खोजते हुए जांच टीम इंदौर तक जा पहुंची। लेकिन पहली गिरफ्तारी धमाके के डेढ़ साल बाद नवंबर 2008 में हुई, जब सेना में काम कर रहे कर्नल श्रीकांत पुरोहित को मालेगांव धमाके के केस में धर दबोचा गया। आरोप लगाया गया कि धमाकों में इस्तेमाल आरडीएक्स कर्नल पुरोहित ने पहुंचाया था।

अभिनव भारत पर आरोप

आपको बता दें कि समझौता एक्सप्रैस में हुए इस धमाके की जांच के दौरान देश में काफी सियासत हुई, बाद में इस मामले को लेकर ले. कर्नल को गिरफ्तार किया गया, उसी के साथ संगठन ‘अभिनव भारत’ पर भी इन धमाकों के आरोप लगे, इसी सिलसिले से जुड़े असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार किया गया।  लेकिन बाद में एनआईए की जांच में आए एक मोड़ के बाद ये बात सामने आई कि समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट स्वामी असीमानंद ने नहीं बल्कि लश्कर ने करवाया था। इसकी पड़ताल के लिए खुद एनआईए प्रमुख ने अमेरिका दौरा किया, जिसके  दौरान वे एफबीआई और सीआईए के अधिकारियों से मिले। एनआईए की टीम ने ट्रेजरी और जस्टिस विभाग के अफसरों से भी बात करने की बात कही। विदित हो कि अमेरिका ने साल 2009 में ही ये दावा किया था कि समझौता धमाका लश्कर का काम है।

अमेरिका द्वारा जारी प्रस्ताव

लश्कर-ए-तैय्यबा के एक बड़े आतंकी पर प्रतिबंध लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर भी पढ़ा जा सकता है, जिस पर 29 जून 2009 की तारीख लिखी हुई है। लश्कर के जिस आतंकी पर प्रतिबंध लगाया गया था, उसका नाम था आरिफ कसमानी।

अहम सवाल

यहां पर ये सवाल उठना लाजिम है कि क्या बीते समय में हुई समझौता ब्लास्ट की जांच गलत दिशा में हो रही थी, क्या इस समयावधि में जो जिन लोगों पर आरोप लगाए गए वो मात्र मिथ्या आरोप थे, क्या इस ब्लास्ट में पाकिस्तान का ही  हाथ था ! दरअसल, समझौता एक्सप्रेस की जांच पिछले काफी वक्त से सबूतों के अभाव में अटकी हुई थी। ऐसे में कुछ समय पहले ये तय किया गया कि लश्कर एंगल से तहकीकात को आगे बढ़ाया जाए।

जांच की क्रमिकता

वहीं इस मामले में चल रही सुनवाई भी देर-सबेर चलती रही। शुक्रवार को एनआईए को उस दौरान करारा झटका लग गया जब इसे लेकर चल रहे मामले में दो और गवाह अपने बयानों से मुकर गए। बता दें कि मामले की सुनवाई पंचकूला स्थित एनआईए कोर्ट में एडिशनल जिला एवं सत्र न्यायाधीश गुलाब सिंह की  कोर्ट में हुई। सुनवाई के दौरान ब्लास्ट के मुख्य आरोपी स्वामी असीमानंद, लोकेश शर्मा, कमल चौहान एवं राजेंद्र चौधरी को पेश किया गया।

बयानों से पलट गए गवाह

उधर कोर्ट में मध्य प्रदेश से गवाही देने के लिए कैलाश शर्मा और राकेश नागी पेश हुए, जो अपने पहले दिए गए बयानों से पलट गए। इन दोनों ने पहले एनआइए को बताया कि मध्य प्रदेश के देवास बागली गांव में आरएसएस के कैंपों में आरोपी आपस में मिलते थे और वहां पर फूड पैकेट पहुंचाते थे, लेकिन अब इन्होंने इस बात से इंकार कर दिया।

अब इतनी उठापटक के बाद आखिर गवाहों के मुकरने के मायने क्या हो सकते हैं? क्या अब भी इस केस में कोई बड़ी सियासत जारी है? अमेरिका की बातों पर आखिर इतने सालों बाद क्यों गौर की गई, क्यो पूर्व के आरोपी मौन होते जा रहे हैं? ध्यान देने लायक बात ये भी है कि जहां एक ओर भारत में अभिनव भारत से जुड़े लोगों की गिरफ्तारियां हो रही थीं वहीं सुरक्षा परिषद समझौता धमाके के लिए लश्कर के आतंकी आरिफ कसमानी को जिम्मेदार ठहराने का दावा कर रही थी। क्या अमेरिकी सुरक्षा परिषद से उस वक्त कोई चूक हुई थी या फिर उसके पास इस धमाके के बारे में कोई पुख्ता सबूत थे।

आखिर कब मिलेगा पीड़ितों को न्याय

आखिर समझौता एक्सप्रेस धमाके में मुख्य हाथ किसका है; ये अब भी जांच और प्रमाणित होने का विषय है? अमेरिका द्वारा किए दावे की जांच ने पाकिस्तान के सामने हमेशा भारत को बैकफुट तो रखा ही है वहीं इधर अभिनव भारत, साध्वी प्रज्ञा और असीमानंद पर लगे आरोपों का रूपान्तरित होना भी एक बड़ा सवाल छोड़ता है। इन सबसे तो यही लगता है कि क्या सच में भगवा आतंकवाद नाम जो चर्चाओं में था, उसे एक बड़ी सांठ-गांठ के द्वारा दबाया जा रहा है ? क्या सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा अपने लोगों को बचाने के लिए कोई खेल तो नहीं खेला जा रहा ? इस तरह के तमाम सवाल आज भी सवाल बने हुए हैं। जरूरत है इन सबके पारदर्शी होने और दोषियों को सजा मिलने की। देखना ये भी अहम है कि ये जांच कितनी लंबी और चलती है और दोषियों को कब सजा व पीड़ितों को न्याय कब मिल पाता है।

एस.एस. पंवार (लेखक हरियाणा खास के कंटेंट एडिटर हैं)

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