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सपना चौधरी हरियाणवी डांसर रागनी मामले में नया खुलासा

मूल रागनी से छेड़छाड़ कर गायी गई रागनी - हरियाणा खास की खास रिपोर्ट

July 8, 2016 10:44 am by: Category: खबर खास, मनोरंजन खास, साहित्य खास 1 Comment A+ / A-

रविदास एक ही नूर ते जिमि उपज्यो संसार

ऊंच-नीच किह बिध भये बाह्मन अरु चमार

 

संत रविदास के इस दोहे में वर्ण और जाति व्यवस्था पर एक सवाल है कि समाज में ऊंच नीच या फिर जातियां किसने बनाई हैं इस दोहे का जिक्र दरअसल इसलिये भी कर रहा हूं क्योंकि हाल ही में हरियाणा के युवाओं को रागनियों और हरियाणवी में बन रहे आधुनिक गानों पर मंच पर थिरक कर अपनी और आकर्षित करने वाली गायिका और डांसर सपना चौधरी द्वारा गाये एक गीत से बवाल मचा हुआ है।

सपना चौधरी

 

दरअसल सोशल मीडिया पर फरवरी में हुए किसी कार्यक्रम की विडियो रिकोर्डिंग में सपना चौधरी द्वारा गाई एक रागनी के बीच की दो पंक्तियां इन दिनों फेसबुक से लेकर यू ट्यूब तक काफी देखी जा रही हैं। इन पंक्तियों में वह कह रही हैं

लोगो पढ़ लिख कै नै तरक्की करगी बावली (जाति का नाम) की

गधी बेच कै खच्चर ले ली होगी मौज (जाति का नाम) की

दोनों पंक्तियों में दो जातियों के नामों का उल्लेख है लेकिन विवाद उपरि पंक्ति में सूचित जाति के साथ लगे बावली शब्द पर है।

 

sapna chaudhry

सपना चौधरी के खिलाफ दर्ज हुआ केस

दलितों के एक संगठन बहुजन आजाद मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष संजय चौहान ने इसे एक जाति के अपमान का मामला मानते हुए हिसार के डोगरान मुहल्ला पुलिस चौकी में सपना चौधरी के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई है। इससे पहले फेसबुक पर दलित चिंतक कौशल पंवार ने इनके खिलाफ केस दर्ज करवाने की मंशा जताई थी जिन पर टिप्पणियों में भी उनके कुछ फेसबुक मित्रों ने इसका आश्वासन दिया था। पुलिस ने शिकायत मिलने की पुष्टि करते हुए कहा है कि शिकायत मिली है, मामले की जांच की जा रही है।

 

असली रागनी को छेड़छाड़ कर गाया सपना चौधरी ने

दरअसल यह मामला सुर्खियों में आने के बाद हरियाणा खास ने इसकी पड़ताल की तो पाया की असल में गायिक व डांसर सपना ने मूल रागनी में फेरबदल कर इसे अपने अनुसार गाया है मूल रागनी प्रतिष्ठित भजनी और लोक कवि रहे जगदीश चंद्र वत्स की है जिसमें उन्होंनें बदलते दौर की तस्वीर शब्दों के जरिये बयान करने की कोशिश की है इसमें हरियाणा में पायी जाने वाली विभिन्न जातियों में आजादी के बाद आये बदलाव अपने अनुसार बताया है उनसे इस मामले में असहमति हो सकती है लेकिन समाज के खाते पीते वर्गों की आम धारणा भी लगभग यही थी। विशेषकर अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों को मुख्य धारा में शामिल करने, राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ने और निम्न मानी जाने वाली जातियों के विकास करने के प्रति एक खिन्नता भी जगदीश चंद्र की इस रागनी में झलकती है। लेकिन मूल रागनी में जो बीच में पंक्ति आती है उसमें बावली शब्द का प्रयोग लेखक ने नहीं किया बल्कि उन्होंनें भोली यानि इनोसेंट अर्थात मासूम शब्द का प्रयोग किया है।

सपना चौधरी से पहले भी गाते रहे हैं यह रागनी

यू ट्यूब पर ही मूल रागनी रमेश कल्हावड़िया जो कि प्रसिद्ध लोक गायक की आवाज़ में अब भी है हालांकि उसमें भी कल्हावड़िया ने फेरबदल किया है और भोली शब्द को बावली ही कहा है लेकिन उन्होंनें रागनी के बीच में ही मंच पर कहा है कि यह उनके अपने शब्द नहीं है बल्कि पंडित जी के हैं। यू ट्यूब के इस लिंक पर क्लिक कर आप इस रागनी को सुन सकते हैं जिसमें उन्होंने टेक में भी फेरबदल किया हुआ है

 

 

जगदीश चंद्र वत्स की मूल रागनी

जगदीश चंद्र

फोटो जगदीशचंद्रडॉटओआरजी से साभार

भाग दौड़ जमाने नै दी आंख खोल नर नारों की

उंच नीच का घमंड टूटग्या भग्गी पड़ गी सारों की

 

पुश्ति राज खत्म होगे इन आजादी की झोल्लां में

रानी होग्यी बांझ जन्मते राजे, बक्से ढोलां में

जिनकी कुढ़ी गिणी ना जां थी मंहगे होगे मोलां में

बणे फिरैं सरपंच एमएलए जो मांगैं थे सीत बरोल्यां मैं

चंडीगढ़ मैं कुर्सी बिछगी, अणपढ़ मूढ़ गंवारा की…

ऊंच नीच …………

 

जितने हक मर्दां के वाजिब उतने बणे लुगाईयां के

चले इसे कानून टूटगे, नेग जोग असनाईयां के

बाप पै बेटी दावे करती, झगड़े बहन और भाईयां के

किते बहनोई पाखी खोंदैं, हल चलैं जमाईयां के

घर के मालिक बणे बटेऊ, मां गुडग्यी हकदारां की

ऊंच नीच………..

 

बड़े बड़े विश्वेदारां पै ना लोभ के कारण टिक्या गया

लिया चौथाई फेर तिहाई आधे तै ना छिक्या गया

तीस सटैंर्ण्ड, एकड़ का बिल ऐसेम्बली मैं रख्या गया

जो हिस्यां पै बोया करते उनका कब्जा लिख्या गया

जमींदारों नै धक्के मिलगे बैठी तार मुजारां की

ऊंच नीच……..

 

देख तिजारत पै पाबंदी पूंजीपति पुकार रहै

रामकिसन डालमिया टाटा बिरला भी सिर मार रहै

चेकिंग रोज बही खातों की, पड़ टेक्सों के भार रहै

पर्चे हुण्डी माल फर्म का बेचण से लाचार रहै

मिल कंपनी च्यौड़ै खुशगी, दिन धौली साहुकारां की

ऊंच नीच……

 

इंडस्ट्री और दस्तकारी मैं हरिजन आगै बढ़ रे सैं

फीस मुआफ और मिलैं वजीफे, बच्चे मुफ्ती पढ़ रे सैं

पांचा मैं कुल एक सीट थी इब दोयां पै अड़ रे सैं

पक्के करो मकान म्हारे न्यू गारमेंट से लड़ रे सैं

पढ़ लिख कै आज तरक्की करगी या भोली जात चमारां की

ऊंच नीच………

 

बेकवर्ड मैं नाई बड़कै, आपणी चौधर कर बैठे

झीमर छिंबी लुहार खाती धोबी तेली घिर बैठे

मुसलमान ना रहैं कहीं के दोनूं राहे मर बैठे

गारया के दुखिया प्रजापत चाक चकोंडे कर बैठे

एक किला धरती का चाहवैं, इतनी मांग कुम्हारां की

ऊंच नीच…….

 

नायक, हेड़ी राजपूत बण बण कै शोर मचाण लगे

बचग्ये डूम भाट बणकै, अब सबनै लूटण खाण लगे

माली तै सैणी बणगे छत्री की प्योंद चढ़ाण लगे

साइकिल और समारैं होक्के, ढलगी हवा सुनारां की

ऊच नीच……..

 

कोए सीट कोए हक पै लड़ता यह ढंग जात तमामा का

कोए इज्जत का मारया बणता फिरै नौकर बिन दामां का

तोड़ दिया जगदीश चंद्र नै भी ताल्लुक घर के कामां का

ब्लाक समिति का मेंबर, सरपंच रह्या दो गामां का

बड़ सियासत मैं तजी कमाई भजन कथा प्रचारां की

ऊंच नीच………

(यह रागनी सिर्फ सपष्टता के लिये यहां दी जा रही है किसी जाति या समुदाय की भावनाओं को आहत करने के लिये नहीं। हरियाणा के कवि कमल सिंह जी द्वारा जगदीश चंद्र के रचना संग्रह ज्ञान सागर से शब्दश: यहां प्रस्तुत की जा रही है।)

 

सपना चौधरी के चौधरी होने पर भी उठ रहे हैं सवाल

फेसबुक पर ही कुछ लोगों ने सपना चौधरी के चौधरी होने पर इस गीत के बाद सवाल उठाने शुरु कर दिये हैं। यहां तक कि उन्हें यह तक कहा गया है कि यदि आपको इस तरह के गीत गाने हैं तो आप अपने नाम के साथ चौधरी शब्द का इस्तेमाल न करें बल्कि आप ब्राह्मण की उपजाति कायस्थ से संबंधित है अपना असली उपनाम ही अपने नाम के साथ लगाएं। वहीं कुछ लोग चौधरी शब्द किसे इस्तेमाल करना चाहिये और क्यों करना चाहिये इस पर बहस करते नजर आये। युनियनिस्ट मिशन से जुड़े और फेसबुक पर सक्रिय फूल कुमार मलिक की पोस्ट पर उनके नाम के साथ चौधरी शब्द के इस्तेमाल करने पर यह सवाल उठाया गया। इनकी इसी पोस्ट पर एक मित्र ने प्रतिक्रिया में जवाब दिया कि वे चौधरी शब्द को अपने नाम के पिछे लगा रही हैं आगे नहीं जो कि उनका अधिकार है। इससे चौधरी शब्द के इस्तेमाल पर भी एक नई बहस छिड़ गई है।

sapna chaudhry 2

 

सपना चौधरी के बारे में उनकी जाति से संबंधित जानकारी फेसबुक पोस्ट पर आधारित है हरियाणा खास इसकी पुष्टि नहीं करता है। नाम के साथ चौधरी शब्द वे लगायें या न लगायें ये उनका निजी मामला है लेकिन अगर सार्वजनिक मंच पर वे अपनी प्रस्तुतियों के जरिये किसी जाति या समुदाय की भावना को आहत करती हैं तो यह एक गंभीर मामला हो जाता है। हालांकि इस मामले में एक मात्र सपना चौधरी को टारगेट करना भी सही नहीं लगता क्योंकि इस गीत के लेखक से लेकर, जिस म्यूजिक कंपनी के बैनर तले यह कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसने इसे प्रचारित किया क्या उन पर कोई कार्रवाई नहीं बनती।

पुराने लोक साहित्य की भी करनी चाहिये समीक्षा

इस गीत के बहाने पूर्व के सम्मानित लोक गायकों एवं कवियों पंडित लख्मीचंद, पंडित मांगेराम, बाजे भगत, धनपत, जगदीश चंद्र वत्स आदि से होते हुए फौजी (जाट) मेहर सिंह, दयाचंद मायना से लेकर वर्तमान के लोक कवियों द्वारा लिखे और लोक गायकों द्वारा गाये जाने वाले साहित्य पर भी समीक्षा करनी चाहिये। यह समय है कि जिसमें हम समझ सकते हैं कि हमारी विरासत में क्या अच्छा है क्या बुरा। पुराने समय से लेकर अब तक परिस्थितियों और सामाजिक ताने-बाने में बहुत बदलाव आया है तब शोषित तबकों के सामने चुप्पी खिंचने अलावा कोई चारा नहीं होता था। लेकिन अब संविधान ने सबको समानता का अधिकार दिया है। हालांकि सामाजिक रुप से यह भेदभाव दिमागों से निकलने में अभी वक्त लगेगा। लेकिन रविदास के सामने उनके अपने दौर में जो परेशानियां थी वह आज भी ज्यों की त्यों है भले ही वे कहकर गए हों

सब मंहि एकु रामह जोति एकहि सिरजनहारा

रविदास रामहि सबन में बाह्मन हुई के चमारा

लेकिन उनके दोहे आज भी सिर्फ सुनने के लिये हैं उनके इन उपदेशों को आत्मसात करने का साहस शायद अभी भी समाज में पैदा होना बाकि है।

 

सपना चौधरी हरियाणवी डांसर रागनी मामले में नया खुलासा Reviewed by on . रविदास एक ही नूर ते जिमि उपज्यो संसार ऊंच-नीच किह बिध भये बाह्मन अरु चमार   संत रविदास के इस दोहे में वर्ण और जाति व्यवस्था पर एक सवाल है कि समाज में ऊंच नीच या रविदास एक ही नूर ते जिमि उपज्यो संसार ऊंच-नीच किह बिध भये बाह्मन अरु चमार   संत रविदास के इस दोहे में वर्ण और जाति व्यवस्था पर एक सवाल है कि समाज में ऊंच नीच या Rating: 0

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